इस जानकारी को छोड़ दें

सैकेंडरी मैन्यू को छोड़ दें

विषय-सूची को छोड़ दें

यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  मार्च 2014

अपने बीच बुज़ुर्गों का आदर कीजिए

अपने बीच बुज़ुर्गों का आदर कीजिए

“बूढ़े का आदरमान करना।”—लैव्य. 19:32.

1. आज बहुत-से बुज़ुर्ग किस दुख-भरे हालात का सामना करते हैं?

यहोवा कभी नहीं चाहता था कि इंसान बुढ़ापे का और बुढ़ापे की वजह से आनेवाली परेशानियों का सामना करे। उसका मकसद था कि इंसान फिरदौस में बढ़िया सेहत का लुत्फ उठाए। मगर आज, “सारी सृष्टि . . . एक-साथ कराहती और दर्द से तड़पती रहती है।” (रोमि. 8:22) आपको क्या लगता है, इंसानों को पाप के दर्दनाक अंजामों को भुगतते देख परमेश्वर को कैसा लगता होगा? यह कितने दुख की बात है कि आज बहुत-से बुज़ुर्ग लोगों को नज़रअंदाज़ किया जाता है, वह भी उनकी ज़िंदगी के उस मोड़ पर, जब उन्हें पहले से कहीं ज़्यादा सहारे की ज़रूरत होती है।—भज. 39:5; 2 तीमु. 3:3.

2. यहोवा के सेवक क्यों शुक्रगुज़ार हैं कि मंडलियों में बुज़ुर्ग भाई-बहन भी हैं?

2 यहोवा के सेवक इस बात के लिए शुक्रगुज़ार हैं कि मंडलियों में बुज़ुर्ग भाई-बहन भी हैं। क्यों? क्योंकि हम उनकी बुद्धि-भरी बातों से बहुत कुछ सीखते हैं, और हम उनके विश्वास की मिसाल पर भी चलना चाहते हैं। हममें से कई, इन अज़ीज़ बुज़ुर्ग मसीहियों के रिश्तेदार हैं। पर चाहे हम उनके रिश्तेदार हों या न हों, हम इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहते हैं कि उनकी अच्छी देखभाल हो। (गला. 6:10; 1 पत. 1:22) हम सभी को इस बात पर गौर करने से फायदा होगा कि परमेश्वर बुज़ुर्गों के बारे में कैसा नज़रिया रखता है। हम इस बात पर भी चर्चा करेंगे कि हमारे अज़ीज़ बुज़ुर्ग मसीहियों की देखभाल करने में परिवार के सदस्यों और मंडली की क्या ज़िम्मेदारी बनती है।

 “मुझ को छोड़ न दे”

3, 4. (क) भजन 71 के रचयिता ने किस बात के लिए यहोवा से सच्चे दिल से गुहार लगायी? (ख) मंडली के बुज़ुर्ग जन परमेश्वर से क्या गुहार लगा सकते हैं?

3 भजन 71:9 के प्रेरित रचयिता ने परमेश्वर से गुहार लगायी: “बुढ़ापे के समय मेरा त्याग न कर; जब मेरा बल घटे तब मुझ को छोड़ न दे।” ऐसा लगता है कि यह भजन, भजन 70 की ही अगली कड़ी है जिसका उपरिलेख बताता है कि ये दाविद के भजन हैं। तो हो सकता है कि भजन 71:9 में दर्ज़ शब्द भी दाविद ने लिखे थे। उसने अपनी जवानी से लेकर बुढ़ापे तक यहोवा की सेवा की और यहोवा ने उसे बड़े-बड़े कामों के लिए इस्तेमाल किया। (1 शमू. 17:33-37,50; 1 राजा 2:1-3,10) फिर भी, उसे यहोवा से यह गुज़ारिश करने की ज़रूरत महसूस हुई कि वह उसकी देखभाल करे।—भजन 71:17,18 पढ़िए।

4 आज हमारे बीच भी कई बुज़ुर्ग मसीही दाविद की तरह हैं। हालाँकि उनकी उम्र ढलती जा रही है और वे ‘विपत्ति के दिनों’ का सामना कर रहे हैं, फिर भी वे परमेश्वर को खुश करने की अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं। (सभो. 12:1-7) इनमें से कई बुज़ुर्ग ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं में शायद अब उतना न कर पाते हों, जितना वे पहले करते थे, जैसे प्रचार में। लेकिन वे भी यहोवा से गुहार लगा सकते हैं कि वह उन्हें आशीष देता रहे और उनकी देखभाल करता रहे। ये वफादार बुज़ुर्ग जन यकीन रख सकते हैं कि परमेश्वर उनकी प्रार्थनाओं का जवाब ज़रूर देगा। यह हम कैसे कह सकते हैं? खुद यहोवा ने दाविद को प्रेरित किया था कि वह अपनी देखभाल से जुड़ी चिंताओं के लिए प्रार्थना करे, तो ज़ाहिर है वह उसकी प्रार्थनाओं का जवाब ज़रूर देता। उसी तरह, जब वफादार बुज़ुर्ग जन अपनी देखभाल से जुड़ी चिंताओं के लिए प्रार्थना करते हैं, तो इसमें कोई शक नहीं कि यहोवा उनकी प्रार्थनाओं का भी जवाब देगा।

5. यहोवा वफादार बुज़ुर्ग मसीहियों के बारे में कैसा महसूस करता है?

5 बाइबल साफ बताती है कि यहोवा वफादार बुज़ुर्ग मसीहियों को बहुत अनमोल समझता है और वह अपने सेवकों से यह उम्मीद करता है कि वे उनका आदर करें। (भज. 22:24-26; नीति. 16:31; 20:29) लैव्यव्यवस्था 19:32 कहता है: “पक्के बालवाले के साम्हने उठ खड़े होना, और बूढ़े का आदरमान करना, और अपने परमेश्वर का भय निरन्तर मानना; मैं यहोवा हूं।” जी हाँ, जब ये शब्द लिखे गए थे, तब मंडली के बुज़ुर्ग भाई-बहनों का आदर करना एक गंभीर ज़िम्मेदारी थी, और आज भी है। लेकिन उनकी देखभाल करने की ज़िम्मेदारी किसकी है?

परिवार की ज़िम्मेदारी

6. अपनी माँ की देखभाल करने में यीशु ने कैसे एक बेहतरीन मिसाल रखी?

6 परमेश्वर का वचन हमसे कहता है: “तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना।” (निर्ग. 20:12; इफि. 6:2) यीशु ने इस आज्ञा की अहमियत बतायी, जब उसने उन फरीसियों और शास्त्रियों को फटकारा, जिन्होंने अपने माता-पिता की देखभाल करने से इनकार कर दिया था। (मर. 7:5,10-13) यीशु ने खुद इस मामले में एक बेहतरीन मिसाल कायम की। जब वह यातना की सूली पर था, तब भी उसे अपनी माँ की चिंता थी, जो शायद तब एक विधवा थी। उसने अपने अज़ीज़ दोस्त और चेले, यूहन्ना को यह ज़िम्मेदारी दी कि वह उसकी माँ की देखभाल करे।—यूह. 19:26,27.

7. (क) परिवार की ज़रूरतें पूरी करने के मामले में प्रेषित पौलुस ने किस सिद्धांत का ज़िक्र किया? (ख) इस सिद्धांत का ज़िक्र पौलुस ने कब किया?

7 पौलुस ने परमेश्वर की प्रेरणा से लिखे अपने खत में कहा कि मसीहियों को अपने घर के लोगों की देखभाल करनी चाहिए। (1 तीमुथियुस 5:4,8,16 पढ़िए।) उसने इस सिद्धांत का ज़िक्र तब किया जब वह इस बारे में समझा रहा था कि कौन मंडली से आर्थिक मदद पाने के योग्य है और कौन नहीं। पौलुस ने कहा कि बुज़ुर्ग विधवाओं की देखभाल करना खासकर उनके मसीही बच्चों, नाती-पोतों और दूसरे रिश्तेदारों की ज़िम्मेदारी थी। अगर वे अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभाते, तो मंडली को उनकी देखभाल करने का खर्च नहीं उठाना पड़ता। उसी तरह आज, एक तरीका जिससे मसीही “परमेश्वर की भक्‍ति” करते हैं, वह है अपने रिश्तेदारों की ज़रूरतें पूरी करके।

8. बुज़ुर्ग माँ-बाप की देखभाल कैसे की जानी चाहिए इस मामले में बाइबल में साफ-साफ हिदायतें क्यों नहीं दी गयी हैं?

 8 जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वे अपने माता-पिता की ज़रूरतें पूरी करें। हालाँकि पौलुस यहाँ विश्वासी रिश्तेदारों की मदद करने की बात कर रहा था, लेकिन जो माँ-बाप सच्चाई में नहीं हैं, उन्हें भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। हर परिवार के हालात एक-जैसे नहीं होते, इसलिए हर परिवार को अपने फैसले खुद करने चाहिए कि वे अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल कैसे करेंगे। हर इंसान की सेहत, ज़रूरतें और शख्सियत अलग-अलग होती है। कुछ बुज़ुर्ग भाई-बहनों के कई बच्चे हैं, जबकि कुछ के सिर्फ एक। कुछ को सरकार की तरफ से मदद मिल सकती है, लेकिन कुछ को नहीं। इसके अलावा, जिन्हें देखभाल की ज़रूरत है, उनमें से हर किसी की पसंद-नापसंद भी अलग-अलग होती है। इसलिए जिस तरह भाई-बहन बुज़ुर्ग रिश्तेदारों की देखभाल करने की कोशिश करते हैं, उसमें नुक्स निकालना सही नहीं होगा। वे बाइबल के सिद्धांतों के आधार पर जो भी फैसले लेते हैं, यहोवा उन पर आशीष दे सकता है। वह हमारे फैसलों को कामयाब बना सकता है, ठीक जैसे उसने पुराने ज़माने में अपने लोगों के मामले में किया था।—गिन. 11:23.

9-11. (क) कुछ पूरे समय के सेवकों को कौन-से मुश्किल फैसले लेने पड़ते हैं? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।) (ख) बुज़ुर्ग माता-पिताओं के बच्चों को पूरे समय की सेवा छोड़ने में जल्दबाज़ी क्यों नहीं करनी चाहिए? एक मिसाल दीजिए।

9 जब बच्चे अपने बुज़ुर्ग माता-पिता से दूर रहते हैं, तो उनके लिए माता-पिता की देखभाल करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में अगर माता-पिता की अचानक तबियत खराब हो जाए, उन्हें कोई गंभीर बीमारी हो जाए, या फिर वे फिसलकर गिर जाएँ और उनकी हड्डी टूट जाए, तो हो सकता है बच्चों को अचानक उनसे मिलने आना पड़े। और हो सकता है इसके बाद माता-पिता को कुछ वक्‍त के लिए या फिर लंबे समय तक देखभाल की ज़रूरत पड़े। *

10 पूरे समय के सेवक, जो घर से काफी दूर रहकर सेवा करते हैं और जो खुद को ऐसे हालात में पाते हैं, हो सकता है उन्हें काफी मुश्किल फैसले लेने पड़ें। बेथेल में सेवा करनेवाले, मिशनरी और सफरी निगरान अपनी सेवा को यहोवा की तरफ से मिली एक अनमोल आशीष मानते हैं। लेकिन अगर उनके माता-पिता बीमार हो जाते हैं, तो उनके मन में शायद सबसे पहले यह खयाल आए, ‘अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए अब हमें अपनी सेवा छोड़कर घर लौटना होगा।’ लेकिन बुद्धिमानी इसी में होगी कि हम पहले इस बारे में प्रार्थना करें और सोचें कि हमारे माता-पिता की असल में ज़रूरतें क्या हैं और वे क्या चाहते हैं। किसी को भी जल्दबाज़ी में आकर यहोवा की तरफ से मिली ज़िम्मेदारी त्याग नहीं देनी चाहिए और हो सकता है ऐसा करने की ज़रूरत ही न पड़े। क्या उनकी बीमारी कुछ समय बाद ठीक हो जाएगी? क्या आपके माता-पिता की मंडली में कुछ ऐसे भाई-बहन हैं, जिन्हें उनकी मदद करने में खुशी होगी, ताकि आप पूरे समय की सेवा में लगे रह सकें?—नीति. 21:5.

11 मिसाल के लिए, जापान में रहनेवाले एक बुज़ुर्ग जोड़े के दो बेटे थे, जो घर से काफी दूर सेवा कर रहे थे। एक बेटा दक्षिण अमरीका में मिशनरी सेवा कर रहा था और दूसरा, न्यू यॉर्क के ब्रुकलिन शहर में विश्व मुख्यालय में सेवा कर रहा था। जब इस बुज़ुर्ग जोड़े को मदद की ज़रूरत पड़ी, तो दोनों बेटे अपनी पत्नियों के साथ अपने माता-पिता से मिलने घर आए, ताकि वे तय कर सकें कि वे किस तरह उनकी मदद कर सकते हैं। जो बेटा और उसकी पत्नी मिशनरी सेवा कर रहे थे, वे सोच रहे थे कि वे अपनी सेवा छोड़कर घर लौट जाएँगे और अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप की देखभाल करेंगे। फिर उन्हें अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की मंडली से प्राचीनों का फोन आया। प्राचीनों ने इस मामले पर चर्चा की थी और वे चाहते थे कि यह मिशनरी जोड़ा ज़्यादा-से-ज़्यादा समय तक अपनी सेवा में बना रहे। वे इस जोड़े की सेवा की बहुत कदर करते थे और उन्होंने कहा कि उन्हें इस जोड़े के माता-पिता की देखभाल करने में खुशी होगी। उनकी इस प्यार-भरी मदद के लिए इस परिवार के सभी लोग कितने एहसानमंद थे!

12. बुज़ुर्ग माँ-बाप की देखभाल के बारे में फैसले लेते वक्‍त, एक मसीही परिवार को किस बात का ध्यान रखना चाहिए?

12 एक मसीही परिवार अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप की देखभाल करने के सिलसिले में जो भी फैसले लेता है, उस परिवार में सभी को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके फैसलों  से परमेश्वर के नाम का आदर हो। हम कभी-भी यीशु के दिनों में मौजूद धर्म-गुरुओं की तरह नहीं बनना चाहते। (मत्ती 15:3-6) इसके बजाए, हम यहोवा का और मंडली का आदर करना चाहते हैं।—2 कुरिं. 6:3.

मंडली की ज़िम्मेदारी

13, 14. बाइबल कैसे दिखाती है कि मंडलियों को बुज़ुर्ग जनों की देखभाल करने में मदद करनी चाहिए?

13 ऊपर जिस मंडली का ज़िक्र किया गया था, उस मंडली की तरह हर कोई पूरे समय के सेवकों की मदद नहीं कर सकता। लेकिन बाइबल दिखाती है कि मंडलियों को वफादार बुज़ुर्ग जनों की मदद करने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश करनी चाहिए। पहली सदी में, यरूशलेम की मंडली में “ऐसा कोई भी न था जो तंगी में हो।” लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उस मंडली में सभी पैसेवाले थे। ऐसा लगता है कि कुछ भाई-बहनों के पास बहुत कम चीज़ें थीं। मगर “जिसकी जैसी ज़रूरत होती, उसके मुताबिक उनके बीच बाँट दिया जाता था।” (प्रेषि. 4:34,35) लेकिन बाद में उस मंडली में एक गंभीर समस्या उठ खड़ी हुई। प्रेषितों को खबर दी गयी कि “रोज़ के खाने के बँटवारे में [कुछ] विधवाओं को नज़रअंदाज़ किया जा रहा” है। तो फिर प्रेषितों ने क्या किया? उन्होंने कुछ काबिल पुरुषों को ठहराया, ताकि विधवाओं के साथ कोई भेदभाव न किया जाए और उन्हें ज़रूरत के हिसाब से खाना मिल सके। (प्रेषि. 6:1-5) यह इसलिए ज़रूरी था क्योंकि सन्‌ 33 के पिन्तेकुस्त के समय, विदेश से यरूशलेम आए कई लोग मसीही बन गए थे और वे अपना विश्वास मज़बूत करने के लिए कुछ समय वहीं रुक गए थे। तो हालाँकि खाने के बँटवारे का इंतज़ाम बस कुछ वक्‍त के लिए ही था, लेकिन प्रेषितों के फैसले से साबित होता है कि मंडलियाँ वफादार बुज़ुर्ग भाई-बहनों की ज़रूरतें पूरी करने में मदद दे सकती हैं।

14 जैसा कि पहले बताया गया था, पौलुस ने तीमुथियुस को समझाया कि किन हालात में एक विधवा मंडली से आर्थिक मदद पा सकती है। (1 तीमु. 5:3-16) परमेश्वर की प्रेरणा से याकूब ने लिखा कि मसीहियों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वे अनाथों, विधवाओं और मुश्किल हालात का सामना करनेवालों की देखभाल करें। (याकू. 1:27; 2:15-17) प्रेषित यूहन्ना ने भी समझाया: “अगर किसी के पास गुज़र-बसर करने के लिए दुनिया के साधन हों और वह देखे कि उसका भाई ज़रूरत में है और फिर भी वह उसकी तरफ अपनी दया के दरवाज़े बंद कर लेता है, तो ऐसे इंसान में परमेश्वर के लिए प्यार कैसे बना रह सकता है?” (1 यूह. 3:17) तो जब हरेक मसीही की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह ज़रूरतमंदों की देखभाल करे, तो क्या यह मंडलियों की भी ज़िम्मेदारी नहीं बनती?

अगर कोई हादसा हो जाता है, तो मंडली के भाई-बहन कैसे मदद कर सकते हैं? (पैराग्राफ 15,16 देखिए)

15. बुज़ुर्ग भाई-बहनों को किस हद तक देखभाल की ज़रूरत होगी, यह किन बातों पर निर्भर करता है?

15 कुछ देशों में, सरकार बुज़ुर्गों की मदद करने के लिए पेंशन और कुछ दूसरे इंतज़ाम करती है। (रोमि. 13:6) लेकिन कुछ देशों में इस तरह की सेवाएँ उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए रिश्तेदारों और मंडलियों को किस हद तक बुज़ुर्गों को मदद मुहैया करानी होगी, यह हालात पर निर्भर करता  है। अगर मसीही बच्चे अपने बुज़ुर्ग माता-पिता से काफी दूर रहते हैं, तो इसका भी इस बात पर असर पड़ेगा कि वे अपने माता-पिता का किस हद तक खयाल रख पाएँगे। यह ज़रूरी है कि बच्चे अपने माता-पिता की मंडली के प्राचीनों से बात करें, ताकि सभी परिवार के हालात से वाकिफ हों। मिसाल के लिए, प्राचीन शायद बुज़ुर्गों को यह जानने में मदद दे सकते हैं कि सरकार या दूसरे संगठनों की तरफ से क्या-क्या सेवाएँ उपलब्ध हैं। प्राचीनों ने शायद कुछ ऐसी बातें भी गौर की हों, जिन्हें जानना बच्चों के लिए ज़रूरी है, जैसे हो सकता है उन्होंने ज़रूरी खत न खोले हों या फिर ठीक से दवाइयाँ न ली हों। अगर बच्चे और प्राचीन आपस में खुलकर बात करें, तो हालात बिगड़ने से पहले उसे रोका जा सकता है और कुछ कारगर कदम उठाए जा सकते हैं। वाकई, जब भाई-बहन इस तरह बुज़ुर्गों की देखभाल करने में दूर रह रहे बच्चों की मदद करते हैं, और उन्हें देखभाल से जुड़े सुझाव देते हैं, तो इससे परिवार की चिंता काफी हद तक कम हो सकती है।

16. मंडली में बुज़ुर्ग भाई-बहनों की मदद करने के लिए कुछ मसीही क्या करते हैं?

16 मंडली के भाई-बहन इन अज़ीज़ बुज़ुर्ग मसीहियों से बहुत प्यार करते हैं। इसलिए उनमें से कइयों ने जितना हो सके, इनकी मदद करने के लिए खुशी-खुशी अपना समय और अपनी ताकत लगायी है। वे उन्हें अपने ही परिवार का सदस्य मानते हैं। कुछ भाई-बहन बारी-बारी से बुज़ुर्गों की देखभाल करते हैं। हालाँकि ये परवाह करनेवाले भाई-बहन खुद पूरे समय की सेवा नहीं कर सकते, लेकिन इस तरह बुज़ुर्गों की मदद करके वे उनके बच्चों को पूरे समय की सेवा में लगे रहने में मदद देते हैं। वाकई ये भाई-बहन क्या ही बढ़िया रवैया दिखाते हैं! बेशक, दूसरे चाहे कितनी भी मदद क्यों न करें, लेकिन इससे बच्चे अपने माँ-बाप की देखभाल करने की अपनी ज़िम्मेदारी से फारिग नहीं हो जाते।

हौसला बढ़ानेवाले शब्दों से बुज़ुर्गों का आदर कीजिए

17, 18. किस तरह का रवैया मदद देना और मदद पाना आसान बना देता है?

17 बुज़ुर्ग जन और उनकी देखभाल करनेवाले, सही रवैया बनाए रखकर मुश्किल हालात को काफी हद तक बेहतर बना सकते हैं। कभी-कभार उम्र ढलने की वजह से एक इंसान निराश या हताश हो जाता है। इसलिए बुज़ुर्ग भाई-बहनों का आदर करने और उनका हौसला बढ़ाने के लिए, हो सकता है आपको अपनी तरफ से और भी कोशिश करनी पड़े। यह आप कैसे कर सकते हैं? उनके साथ अच्छी बातों के बारे में बात कीजिए। ये अज़ीज़ भाई-बहन सालों से यहोवा के वफादार रहे हैं और इसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए। उन्होंने यहोवा की सेवा में जो कुछ किया है, उसे यहोवा कभी नहीं भूलता और हमें भी नहीं भूलना चाहिए।—मलाकी 3:16; इब्रानियों 6:10 पढ़िए।

18 रोज़मर्रा के काम करना तब ज़्यादा आसान हो जाता है, जब सभी का मज़ाकिया स्वभाव हो। (सभो. 3:1,4) साथ ही, बहुत-से बुज़ुर्ग जन अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं कि वे दूसरों से हद-से-ज़्यादा की माँग न करें। वे जानते हैं कि अगर वे दूसरों के साथ अच्छी तरह पेश आएँगे, तो उन पर ज़्यादा ध्यान दिया जाएगा और लोग उनसे ज़्यादा मिलने आएँगे। बुज़ुर्ग जनों से मिलने जानेवाले अकसर कहते हैं: “मैं गया तो था एक बुज़ुर्ग भाई का हौसला बढ़ाने, पर उनसे मिलने के बाद मेरा खुद का हौसला बढ़ गया।”—नीति. 15:13; 17:22.

19. क्या बात जवानों और बुज़ुर्गों को मुश्किल समय के दौरान डटे रहने में मदद दे सकती है?

19 हम उस दिन की आस लगाए हुए हैं जब बुढ़ापा, तकलीफें और असिद्धता का नामो-निशान नहीं रहेगा। लेकिन तब तक, परमेश्वर के सेवकों को अपना ध्यान भविष्य में पूरी होनेवाली उन आशीषों पर लगाए रखना चाहिए, जो हमेशा तक बनी रहेंगी। परमेश्वर के वादों पर हमारा विश्वास एक लंगर की तरह है, जो हमें मुश्किल समय के दौरान डटे रहने में मदद देता है। क्योंकि हममें विश्वास है, इसलिए “हम हार नहीं मानते, चाहे हमारा बाहर का इंसान मिटता जा रहा है, मगर हमारा अंदर का इंसान दिन-ब-दिन नया होता जा रहा है।” (2 कुरिं. 4:16-18; इब्रा. 6:18,19) परमेश्वर के वादों पर मज़बूत विश्वास के अलावा, और क्या बात आपको बुज़ुर्गों की देखभाल करने में मदद दे सकती है? अगले लेख में कुछ कारगर सुझावों पर चर्चा की जाएगी।

^ पैरा. 9 अगले लेख में हम बुज़ुर्ग माता-पिताओं की देखभाल से जुड़े कुछ तरीकों पर गौर करेंगे।