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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  मार्च 2014

त्याग की भावना कैसे बनाए रखें

त्याग की भावना कैसे बनाए रखें

“अगर कोई मेरे पीछे आना चाहता है, तो वह खुद से इनकार करे।”—मत्ती 16:24.

1. यीशु ने किस तरह त्याग की भावना दिखाने में सबसे उम्दा मिसाल रखी?

जब यीशु धरती पर था, तब उसने त्याग की भावना दिखाने में सबसे उम्दा मिसाल रखी। उसने परमेश्वर की इच्छा को अपनी ख्वाहिशों और अपने सुख-चैन से ज़्यादा अहमियत दी। (यूह. 5:30) यातना की सूली पर अपनी मौत तक वफादार बने रहकर उसने साबित किया कि दूसरों की खातिर त्याग करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता था।—फिलि. 2:8.

2. (क) हम त्याग की भावना कैसे दिखा सकते हैं? (ख) हममें त्याग की भावना क्यों होनी चाहिए?

2 यीशु के चेले होने के नाते, हमें भी त्याग की भावना दिखाने की ज़रूरत है। त्याग की भावना दिखाने का मतलब क्या है? इसका मतलब है, दूसरों की मदद करने के लिए अपनी इच्छाओं को त्याग देना। एक तरह से, यह स्वार्थ के बिलकुल उलट है। (मत्ती 16:24 पढ़िए।) अगर हममें स्वार्थ नहीं होगा, तो हम दूसरों की भावनाओं और पसंद-नापसंद को खुद की भावनाओं और पसंद-नापसंद से ज़्यादा अहमियत देंगे। (फिलि. 2:3,4) यीशु ने सिखाया कि निस्वार्थ भावना दिखाना हमारी उपासना की बुनियाद है। वह कैसे? मसीही प्यार हमें त्याग की भावना दिखाने के लिए उभारता है। और यीशु के सच्चे चेले इसी प्यार के लिए जाने जाते हैं। (यूह. 13:34,35) ज़रा सोचिए, त्याग की भावना दिखानेवाले भाइयों की पूरी बिरादरी का हिस्सा होने की वजह से हमें कितनी आशीषें मिली हैं!

3. क्या बात हमारी त्याग की भावना को कमज़ोर कर सकती है?

3 लेकिन एक दुश्मन है, जो धीरे-धीरे हमारी इस त्याग की भावना को कमज़ोर कर सकता है। और वह है, हमारी स्वार्थी फितरत। आदम और हव्वा के बारे में सोचिए।  हव्वा परमेश्वर की तरह बनना चाहती थी और आदम परमेश्वर के बजाय अपनी पत्नी को खुश करना चाहता था। इस तरह, उन दोनों ने स्वार्थी रवैया दिखाया। (उत्प. 3:5,6) आदम और हव्वा को सच्ची उपासना से बहकाने के बाद, इब्लीस लगातार लोगों को स्वार्थी बनने के लिए लुभाता रहा। यह चाल उसने यीशु पर भी चलने की कोशिश की। (मत्ती 4:1-9) हमारे दिनों में भी शैतान ज़्यादातर लोगों को बहकाने में कामयाब रहा है और वह उन्हें कई तरीकों से अपनी स्वार्थी इच्छा पूरी करने के लिए फुसला रहा है। अगर हम सावधान न रहें, तो इस दुनिया की स्वार्थी फितरत हम पर भी असर कर सकती है।—इफि. 2:2.

4. (क) क्या फिलहाल हम अपनी स्वार्थी फितरत को निकाल सकते हैं? समझाइए। (ख) हम किन सवालों पर चर्चा करेंगे?

4 स्वार्थ की तुलना ज़ंग लगने के साथ की जा सकती है। अगर लोहे से बनी किसी चीज़ को हवा और पानी लग जाए, तो उस पर ज़ंग लग सकता है। ज़ंग को नज़रअंदाज़ करना बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि अगर उसे निकाला न जाए, तो वह पूरी-की-पूरी चीज़ को खा सकता है। उसी तरह, हालाँकि हम फिलहाल अपनी असिद्धता और स्वार्थी फितरत को निकाल नहीं सकते, लेकिन हमें इनके खिलाफ लड़ते रहना चाहिए। अगर हम सावधानी न बरतें, तो हमारी त्याग की भावना पूरी तरह खत्म हो जाएगी। (1 कुरिं. 9:26,27) हम कैसे भाँप सकते हैं कि हमारे अंदर स्वार्थ है? साथ ही, हम कैसे और भी बढ़कर त्याग की भावना दिखा सकते हैं?

बाइबल की मदद से खुद में स्वार्थी फितरत की जाँच कीजिए

5. (क) बाइबल कैसे एक आइने की तरह है? (लेख की शुरूआत में दी तसवीर देखिए।) (ख) खुद में स्वार्थ जैसी खामियों का पता लगाते वक्‍त, हमें किस बात से दूर रहना चाहिए?

5 जिस तरह हम एक आइने का इस्तेमाल करके जाँच करते हैं कि हम कैसे दिख रहे हैं, उसी तरह हम बाइबल का इस्तेमाल करके अपनी शख्सियत की जाँच कर सकते हैं, और अगर हमें खुद में कोई कमी नज़र आए, तो उसमें सुधार कर सकते हैं। (याकूब 1:22-25 पढ़िए।) लेकिन एक आइने की मदद से हम खुद को तभी सँवार सकेंगे, जब हम उसका सही तरह से इस्तेमाल करेंगे। मिसाल के लिए, अगर हम जल्दबाज़ी में आइने में अपनी झलक देखकर निकल जाएँ, तो शायद हमें छोटी खामियाँ दिखायी न दें, जिन पर हमें शायद ज़्यादा ध्यान देना चाहिए था। या फिर अगर हम आइने की एक तरफ खड़े होकर देखें, तो शायद हमें आइने में कोई और व्यक्‍ति दिखायी दे। ठीक उसी तरह, अगर हम खुद में गंभीर खामियों का पता लगाना चाहते हैं, जैसे हममें स्वार्थ है या नहीं, तो ज़रूरी है कि हम जल्दबाज़ी में बाइबल न पढ़ें या उसका इस्तेमाल करके किसी दूसरे व्यक्‍ति की खामियाँ न ढूँढ़ें।

6. सिद्ध कानून की बहुत करीब से जाँच करने के अलावा हमें और क्या करना चाहिए?

6 मिसाल के लिए, ऐसा हो सकता है कि हम हर दिन परमेश्वर का वचन पढ़ते हों, और फिर भी हमें अपने अंदर धीरे-धीरे बढ़ती स्वार्थी फितरत नज़र न आए। यह कैसे मुमकिन है? ज़रा इस बारे में सोचिए: याकूब की मिसाल में बताया गया है कि एक आदमी आइने में “अपनी सूरत देखता है।” यहाँ पर याकूब ने जिस यूनानी शब्द का इस्तेमाल किया है, उसका मतलब है ध्यान से देखना। इससे पता चलता है कि वह आदमी ध्यान से आइने में अपनी सूरत देख ज़रूर रहा था, लेकिन फिर भी एक समस्या थी। याकूब बताता है: “वह . . . चला जाता है, और फौरन भूल जाता है कि वह किस किस्म का इंसान है।” जी हाँ, उसने आइने में जो देखा, उस बारे में बिना कोई कदम उठाए, वह वहाँ से चला गया। लेकिन इसके उलट, एक कामयाब इंसान न सिर्फ “सिद्ध कानून की बहुत करीब से जाँच करता है,” बल्कि “इसमें खोजबीन [भी] करता रहता है।” परमेश्वर के वचन के सिद्ध कानून को भूलने के बजाय, वह उसमें खोजबीन करता रहता है, यानी उसका अध्ययन करता रहता है और सीखी बातों पर अमल करता रहता है। यीशु ने भी इसी बात पर ज़ोर दिया था, जब उसने कहा: “अगर तुम मेरी शिक्षा में बने रहते हो, तो तुम सचमुच मेरे चेले हो।”—यूह. 8:31.

7. अपनी स्वार्थी फितरत से लड़ने के लिए हम बाइबल का कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं?

7 अपनी स्वार्थी फितरत से लड़ने के लिए, पहले आपको परमेश्वर का वचन ध्यान से पढ़ना होगा। ऐसा करने से आपको यह जानने में मदद मिल सकती है कि आपको कहाँ सुधार करना है। पर सिर्फ इतना काफी नहीं। खोजबीन भी कीजिए। बाइबल का कोई वाकया पढ़ते वक्‍त, कल्पना कीजिए कि आप वहाँ मौजूद हैं। खुद से कुछ ऐसे  सवाल पूछिए: ‘अगर मैं उस हालात में होता, तो क्या करता? क्या मैं सही कदम उठाता?’ और सबसे ज़रूरी बात, जो आपने पढ़ा है उस पर मनन करने के बाद, उसे लागू करने की पूरी कोशिश कीजिए। (मत्ती 7:24,25) आइए देखें कि राजा शाऊल और प्रेषित पतरस की मिसालों से हमें कैसे त्याग की भावना बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

राजा शाऊल की चेतावनी देनेवाली मिसाल

8. (क) जब शाऊल ने राज करना शुरू किया, तब उसका रवैया कैसा था? (ख) उसने यह रवैया कैसे दिखाया?

8 राजा शाऊल की मिसाल हमारे लिए एक चेतावनी है कि कैसे हमारा स्वार्थी रवैया, हमारी त्याग की भावना को खत्म कर सकता है। जब शाऊल ने राज करना शुरू किया, तब वह नम्र था और खुद को हद-से-ज़्यादा अहमियत नहीं देता था। (1 शमू. 9:21) उसने नम्र होकर यह फैसला किया कि वह उन इसराएलियों को सज़ा नहीं देगा, जो उसके राज के बारे में बुरी-बुरी बातें कर रहे थे, हालाँकि ऐसा करके वे दरअसल उस अधिकार पर उँगली उठा रहे थे, जो परमेश्वर ने उसे दिया था। (1 शमू. 10:27) इसराएलियों को अम्मोनियों के खिलाफ जंग में जीत दिलाकर, राजा शाऊल ने परमेश्वर की पवित्र शक्‍ति के मार्गदर्शन को कबूल किया। इसके बाद, शाऊल ने नम्रता दिखाते हुए इस जीत का सारा श्रेय यहोवा को दिया।—1 शमू. 11:6,11-13.

9. शाऊल के दिल में स्वार्थ कैसे पनपने लगा?

9 आगे चलकर, शाऊल ने अपने दिल में स्वार्थी रवैया और घमंड पनपने दिया। जिस तरह ज़ंग को अगर निकाला न जाए, तो वह पूरे लोहे में फैलता चला जाता है, उसी तरह स्वार्थ और घमंड शाऊल के दिल में बढ़ने लगा। जब शाऊल ने अमालेकियों को युद्ध में हरा दिया, तो वह यहोवा की बात मानने के बजाए, अपनी इच्छा पूरी करने के बारे में ज़्यादा ध्यान देने लगा। परमेश्वर ने शाऊल को आज्ञा दी थी कि वह अमालेकियों और उनकी सभी चीज़ों को नष्ट कर दे। मगर शाऊल ने लालच में आकर उनकी चीज़ें रख लीं। शाऊल को खुद पर इतना गुमान था कि उसने अपने लिए एक स्मारक भी बनवाया। (1 शमू. 15:3,9,12) जब शमूएल नबी ने उसे बताया कि यहोवा उससे नाखुश है, तो शाऊल बहाने बनाने लगा और यहोवा की आज्ञा के उस हिस्से पर ज़्यादा ज़ोर देने लगा, जो उसने मानी थी। उसने अपनी गलती के लिए दूसरों पर भी इलज़ाम लगाया। (1 शमू. 15:16-21) घमंड ने शाऊल को इस कदर अंधा कर दिया कि परमेश्वर के साथ अपनी दोस्ती के बारे में चिंता करने के बजाय, वह लोगों के सामने अपनी इज़्ज़त बचाने के बारे में ज़्यादा चिंता करने लगा। (1 शमू. 15:30) हम शाऊल के उदाहरण को आइने की तरह कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं, ताकि हम त्याग की भावना बनाए रख सकें?

10, 11. (क) त्याग की भावना बनाए रखने के मामले में हम शाऊल के अनुभव से क्या सीख सकते हैं? (ख) हम शाऊल की बुरी मिसाल पर चलने से कैसे दूर रह सकते हैं?

10 पहला, शाऊल का अनुभव हमें सिखाता है कि हमें खुद पर हद-से-ज़्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए। अगर एक वक्‍त पर हममें त्याग की भावना थी, तो इसका यह मतलब नहीं कि यह हममें हमेशा रहेगी। इसे दिखाने के लिए हमें लगातार कड़ी मेहनत करनी होगी। (1 तीमु. 4:10) याद रखिए कि शुरू-शुरू में शाऊल अच्छा इंसान था और कुछ वक्‍त तक उस पर परमेश्वर की मंज़ूरी थी। लेकिन फिर जब उसमें स्वार्थी फितरत पनपने लगी, तो उसने उसे ठुकराने के लिए कड़ी मेहनत नहीं की। आखिरकार, शाऊल के आज्ञा न मानने की वजह से यहोवा ने उसे ठुकरा दिया।

11 दूसरा, हमें सिर्फ उन बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए जिनमें हम अच्छा कर रहे हैं, और न ही उन बातों को नज़रअंदाज़ करना चाहिए जिन पर हमें काम करने की ज़रूरत है। नहीं तो यह ऐसा होगा मानो हम सिर्फ अपने नए कपड़ों को निहारने के लिए आइने का इस्तेमाल करें, मगर अपने चेहरे पर लगे धब्बे को नज़रअंदाज़ कर दें। भले ही हम शाऊल की तरह घमंडी न हों या खुद पर हद-से-ज़्यादा भरोसा न करें, लेकिन हमें खुद में इस तरह के रवैए को पनपने भी नहीं देना चाहिए, जो आगे चलकर हमें शाऊल की तरह बरबादी की राह पर ले जा सकता है। अगर हमें सलाह दी जाती है, तो आइए हम बहाने न बनाएँ या दूसरों पर दोष न मढ़ें। शाऊल की तरह बनने के बजाए, कितना अच्छा होगा अगर हम सलाह कबूल करने के लिए हमेशा तैयार रहें।—भजन 141:5 पढ़िए।

12. अगर हम कोई गंभीर पाप कर बैठें, तो त्याग की भावना हमें क्या करने के लिए उभारेगी?

12 लेकिन तब क्या अगर हम कोई गंभीर पाप कर बैठें?  शाऊल लोगों की नज़रों में अच्छा नाम बनाए रखना चाहता था, इसलिए उसने यहोवा के साथ अपना रिश्ता दोबारा कायम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। लेकिन अगर हममें त्याग की भावना होगी, तो यह हमें उभारेगी कि हम मदद माँगें, फिर चाहे हमें कितनी भी शर्मिंदगी क्यों न उठानी पड़े। (नीति. 28:13; याकू. 5:14-16) मिसाल के लिए, एक भाई 12 साल की उम्र से ही पोर्नोग्राफी देखने लगा और अगले दस से भी ज़्यादा सालों तक चोरी-छिपे ऐसा करता रहा। वह बताता है: “अपनी पत्नी और प्राचीनों को इस बारे में बताना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। मगर अब जब मैंने अपनी गलती कबूल कर ली है, तो ऐसा लगता है मानो मेरे कंधे से एक भारी बोझ उतर गया है। जब मुझसे सहायक सेवक की ज़िम्मेदारी ले ली गयी, तब मेरे कुछ दोस्तों को दुख हुआ, क्योंकि उन्होंने कभी मुझसे यह उम्मीद नहीं की थी। लेकिन मेरे लिए इस मामले में यहोवा का नज़रिया सबसे ज़्यादा मायने रखता है। और मैं जानता हूँ कि जब मैं पोर्नोग्राफी देखता था, उस समय के मुकाबले यहोवा आज मेरी सेवा से कहीं ज़्यादा खुश है।”

पतरस की हौसला बढ़ानेवाली मिसाल

13, 14. पतरस ने कैसे दिखाया कि उसमें स्वार्थी फितरत थी?

13 जब प्रेषित पतरस यीशु से तालीम पा रहा था, तब उसमें त्याग की भावना थी। (लूका 5:3-11) लेकिन उसे तब भी अपनी स्वार्थी इच्छाओं से लड़ना था। उदाहरण के लिए, जब प्रेषित याकूब और यूहन्ना ने यीशु से परमेश्वर के राज में अपने लिए ऊँचे पद की सिफारिश की, तो पतरस नाराज़ हो गया। हो सकता है पतरस ने सोचा हो कि यह खास पद उसे मिलना चाहिए, क्योंकि यीशु पहले ही उससे कह चुका था कि उसकी एक खास भूमिका होगी। (मत्ती 16:18,19) यीशु ने याकूब, यूहन्ना, पतरस और बाकी सभी प्रेषितों को खबरदार किया कि वे खुदगर्ज़ न बनें और ऐसे पेश न आएँ, मानो वे अपने भाइयों से बेहतर हों।—मर. 10:35-45.

14 हालाँकि यीशु ने पतरस की सोच सुधारने की कोशिश की, लेकिन उसके बाद भी पतरस में स्वार्थी फितरत नज़र आयी। जब यीशु ने प्रेषितों को बताया कि वे कुछ वक्‍त के लिए उसे छोड़कर चले जाएँगे, तब पतरस ने दूसरों को नीचा दिखाते हुए कहा कि सिर्फ वही यीशु का वफादार रहेगा। (मत्ती 26:31-33) उसे खुद पर इतना भरोसा नहीं करना चाहिए था, क्योंकि उसी रात वह त्याग की भावना दिखाने से चूक गया। उसने खुद को बचाने की कोशिश में तीन बार यीशु को जानने से इनकार कर दिया।—मत्ती 26:69-75.

15. पतरस की मिसाल से हमें हौसला क्यों मिलता है?

15 हालाँकि कई बार पतरस को अपनी कमज़ोरियों से  जद्दोजेहद करनी पड़ी और वह चूक गया, लेकिन फिर भी उसकी मिसाल से हमें हौसला मिलता है। अपनी मेहनत और परमेश्वर की पवित्र शक्‍ति की मदद से पतरस अपनी स्वार्थी फितरत पर काबू पा सका। आगे चलकर उसने संयम और ऐसा प्यार दिखाया, जो दूसरों की खातिर त्याग करने के लिए तैयार रहता है। (गला. 5:22,23) उसने ऐसी कई परीक्षाओं का धीरज से सामना किया, जिनका शायद वह पहले सामना नहीं कर पाता। मिसाल के लिए, जब पौलुस ने पतरस को दूसरों के सामने कड़ी ताड़ना दी, तब पतरस ने नम्रता दिखायी। (गला. 2:11-14) और ताड़ना मिलने के बाद भी पतरस पौलुस से नाराज़ नहीं रहा। उसने ऐसा नहीं सोचा कि उसका नाम खराब हो गया है। इसके बजाय, पौलुस के बारे में बात करते वक्‍त वह उसे “प्यारे भाई” कहकर बुलाता रहा। (2 पत. 3:15) पतरस की मिसाल से हमें अपने अंदर त्याग की भावना बढ़ाते जाने में मदद मिलती है।

ताड़ना दिए जाने पर पतरस ने कैसा रवैया दिखाया? क्या हम भी वैसा ही रवैया दिखाएँगे? (पैराग्राफ 15 देखिए)

16. मुश्किल हालात में हम कैसे त्याग की भावना दिखा सकते हैं?

16 ज़रा सोचिए आप मुश्किल हालात में कैसा रवैया दिखाते हैं? जब पतरस और दूसरे प्रेषितों को प्रचार करने की वजह से जेल में डाला गया और मारा-पिटा गया, तो वे खुश थे कि उन्हें यीशु के चेलों के नाते “बेइज़्ज़त” किया गया। (प्रेषि. 5:41) आप भी ज़ुल्मों की तरफ ऐसा नज़रिया रख सकते हैं, मानो यह पतरस की मिसाल पर चलने और यीशु की तरह त्याग की भावना दिखाने का मौका हो। (1 पतरस 2:20,21 पढ़िए।) और अगर आपको प्राचीनों से ताड़ना मिलती है, तो यह नज़रिया तब भी आपकी मदद कर सकता है। बुरा मानने के बजाए, पतरस के उदाहरण पर चलिए।—सभो. 7:9.

17, 18. (क) हम अपने लक्ष्यों के बारे में खुद से क्या सवाल पूछ सकते हैं? (ख) अगर हम पाते हैं कि हममें स्वार्थ की भावना जड़ पकड़ रही है, तो हम क्या कर सकते हैं?

17 पतरस की मिसाल हमें यहोवा की उपासना में लक्ष्य रखने के मामले में भी मदद दे सकती है। इन लक्ष्यों को हासिल करते वक्‍त त्याग की भावना दिखाइए। लेकिन ध्यान रहे कि आप ये लक्ष्य इसलिए न रखें कि आप लोगों की नज़रों में छाना चाहते हैं। खुद से पूछिए: ‘मैं खुद में सुधार क्यों लाना चाहता हूँ या यहोवा की सेवा में और ज़्यादा क्यों करना चाहता हूँ? क्या इसलिए कि मैं दूसरों से तारीफ पाना चाहता हूँ या ज़्यादा अधिकार पाना चाहता हूँ, जैसा याकूब और यूहन्ना चाहते थे?’

18 अगर आप पाते हैं कि आपमें स्वार्थ की भावना जड़ पकड़ रही है, तो यहोवा से प्रार्थना कीजिए कि वह आपकी गलत सोच और भावनाओं को सुधारने में आपकी मदद करे। फिर यहोवा की महिमा करने के लिए कड़ी मेहनत कीजिए, न की अपनी महिमा करने के लिए। (भज. 86:11) आप ऐसे कुछ लक्ष्य भी रख सकते हैं जिनसे दूसरों का ध्यान आप पर न जाए। उदाहरण के लिए, पवित्र शक्‍ति के फल के किसी ऐसे पहलू को अपने अंदर बढ़ाने की कोशिश कीजिए, जिसे दिखाना आपको मुश्किल लगता है। या अगर आप सभाओं में मिला अपना भाग मन लगाकर तैयार करते हैं, लेकिन आपको राज-घर की सफाई करना पसंद नहीं, तो आप रोमियों 12:16 में दी सलाह को लागू करने का लक्ष्य रख सकते हैं।—पढ़िए।

19. परमेश्वर के वचन के आइने में खुद की जाँच करने पर हम निराश न हों, इसके लिए हम क्या कर सकते हैं?

19 जब हम ध्यान से खुद को परमेश्वर के वचन के आइने में देखते हैं, और हमें अपने अंदर खामियाँ या स्वार्थी फितरत नज़र आती है, तो हो सकता है हम निराश हो जाएँ। अगर आपके साथ कभी ऐसा होता है, तो याकूब के दृष्टांत में बताए कामयाब व्यक्‍ति को याद कीजिए। याकूब ने इस बारे में कुछ नहीं बताया कि उस व्यक्‍ति ने कितनी जल्दी उन खामियों को सुधारा जो उसने खुद में देखी थीं, या वह अपनी सभी खामियों को सुधार पाया भी या नहीं। लेकिन याकूब ने इतना ज़रूर कहा कि वह व्यक्‍ति “सिद्ध कानून” में खोजबीन करता रहा। (याकू. 1:25) उस व्यक्‍ति ने आइने में जो देखा, वह उसे याद रहा और वह खुद में सुधार लाने के लिए मेहनत करता रहा। इसलिए अपने बारे में सही नज़रिया बनाए रखिए और याद रखिए कि हम सभी असिद्ध हैं। (सभोपदेशक 7:20 पढ़िए।) यहोवा ने जिस तरह अब तक आपके दूसरे असिद्ध भाई-बहनों की मदद की है, उसी तरह वह आपकी भी मदद करने के लिए तैयार है। अगर आप सिद्ध कानून, यानी बाइबल में दी शिक्षाओं को मानते रहें और त्याग की भावना दिखाते रहें, तो आप पर परमेश्वर की मंज़ूरी और आशीष बनी रहेगी।