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यहोवा के साक्षी

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सजग होइए‍!  |  अप्रैल 2015

 परिवार के लिए मदद | शादी का बंधन

कैसे बनाएँ सास-ससुर के साथ अच्छा रिश्ता

कैसे बनाएँ सास-ससुर के साथ अच्छा रिश्ता

चुनौती

“जब हम एक मुश्किल हालात से गुज़र रहे थे, तो मेरी पत्नी ने अपने माता-पिता को जाकर इस बारे में बता दिया। फिर उसके पापा ने मुझे उस मामले पर सलाह देने के लिए बुलाया। मुझे यह बिलकुल अच्छा नहीं लगा!”—जेम्स। *

“मेरी सास अकसर कहा करती हैं, ‘मुझे अपने बेटे की बहुत याद आती है!’ फिर वे बताती हैं कि वे दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब हुआ करते थे। जब मेरी सास ऐसा कहती हैं, तो मुझे लगता है कि सारा कसूर मेरा ही है, अगर हमारी शादी न हुई होती, तो वे इतनी दुखी नहीं होतीं।”—नताशा।

अगर हमारी अपने सास-ससुर के साथ न बन रही हो, तो हम क्या कर सकते हैं जिससे कि यह बात हमारी शादीशुदा ज़िंदगी में दरार पैदा न कर दे?

आपको क्या मालूम होना चाहिए

शादी के बाद आपका अपना एक परिवार बन जाता है। पवित्र किताब बाइबल में लिखा है कि शादी करने के बाद एक पुरुष “अपनी पत्नी से जुड़ा रहेगा।” उसी तरह शादी के बाद एक पत्नी भी अपने माता-पिता को छोड़कर अपने पति के साथ रहती है। बाइबल कहती है कि शादी के बाद वे दोनों “एक तन” हो जाते हैं। उनका अपना एक परिवार बन जाता है।—मत्ती 19:5.

आपके साथी के साथ आपका रिश्ता आपके माता-पिता के साथ आपके रिश्ते से ज़्यादा अहमियत रखता है। शादी के सलाहकार, जॉन एम. गॉटमन अपनी किताब में लिखते हैं कि शादीशुदा ज़िंदगी को कामयाब बनाने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि पति-पत्नी मिलकर फैसले लें। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पति-पत्नी चाहते हैं कि उनके बीच एकता बनी रहे, तो हो सकता है उन्हें अपने माता-पिता और भाई-बहनों से कुछ हद तक दूरियाँ बनानी पड़ें। *

कुछ माता-पिताओं को फेरबदल करना मुश्किल लग सकता है। एक पति कहता है, “शादी से पहले मेरी पत्नी सबसे पहले वही करती थी, जो उसके मम्मी-पापा चाहते थे। लेकिन हमारी शादी के बाद, उसकी मम्मी ने देखा कि अब उनकी बेटी की ज़िंदगी में उसका पति सबसे ज़्यादा अहमियत रखता है। इस बात को कबूल करना उनके लिए बहुत मुश्किल था।”

जिनकी नयी-नयी शादी हुई है, उन्हें भी फेरबदल करना मुश्किल लग सकता है। जेम्स, जिसका ज़िक्र लेख की शुरूआत में किया गया है, कहता है, “आप अपने दोस्त खुद चुनते हैं, लेकिन सास-ससुर के मामले में ऐसा नहीं होता।” वह सास-ससुर के बारे में कहता है कि शादी होने पर आपको दो नए दोस्त मिल जाते हैं, फिर चाहे वे आपको पसंद हों या न हों। उसने यह भी कहा, “भले ही वे आपको चिढ़ दिलाएँ, लेकिन आपको उनसे साथ दोस्ती निभानी पड़ती है, क्योंकि अब वह आपका परिवार बन चुके हैं।”

 आप क्या कर सकते हैं

अगर आपकी अपने सास-ससुर के साथ न बन रही हो, और उस मामले में आपकी और आपके साथी की राय अलग-अलग हो, तो आप दोनों मिलकर इस समस्या को सुलझा सकते हैं। बाइबल में दी इस सलाह पर अमल कीजिए, जहाँ बताया गया है कि “मेल को ढूँढ़ और उसी का पीछा कर।”—भजन 34:14.

आप यह कैसे कर सकते हैं? इसके लिए ज़रा इन उदाहरणों पर ध्यान दीजिए। हर उदाहरण में या तो पति का नज़रिया बताया गया है या फिर पत्नी का। लेकिन ये उदाहरण पति-पत्नी दोनों पर लागू हो सकते हैं। और इनमें शास्त्र में लिखी जिन बातों पर चर्चा की गयी है, वे सास-ससुर को लेकर होनेवाली कई समस्याओं को सुलझाने में आपकी मदद कर सकती हैं।

आपकी पत्नी चाहती है कि आपका उसकी मम्मी के साथ अच्छा रिश्ता हो। लेकिन आपको उसकी मम्मी के साथ शांति बनाए रखना मुश्किल लगता है।

इसे आज़माइए: इस बारे में अपनी पत्नी से बात कीजिए, और अपनी ज़िद्द पर अड़े मत रहिए, बल्कि उसका लिहाज़ कीजिए। आप अपनी सास के बारे में कैसा महसूस करते हैं, इससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि आप अपने साथी के बारे में कैसा महसूस करते हैं, जिसका साथ निभाने की आपने कसम खायी थी। इसलिए अपनी पत्नी के साथ मिलकर ऐसी एक या दो बातों के बारे में सोचिए जिससे कि आप अपनी सास के साथ अपने रिश्ते को सुधार सकते हैं और फिर उन बातों पर अमल कीजिए। जब आपकी पत्नी यह देखेगी कि आप अपनी सास के साथ शांति बनाए रखने के लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं, तो उसकी नज़र में आपकी इज़्ज़त बढ़ जाएगी।—बाइबल सिद्धांत: 1 कुरिंथियों 10:24.

आपका पति कहता है कि आप उसे खुश करने के बजाय अपने मम्मी-पापा को खुश करने में लगी रहती हैं।

इसे आज़माइए: अपने पति से इस बारे में बात कीजिए और मामले को उसके नज़रिए से देखने की कोशिश कीजिए। अगर आप सिर्फ अपने मम्मी-पापा की मदद करके अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर रही हैं, तो इससे आपके पति को कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए। (नीतिवचन 23:22) मगर हाँ, आपको अपने पति को इस बात का यकीन दिलाना होगा कि आप अपने मम्मी-पापा से ज़्यादा उसकी परवाह करती हैं। आप यह कैसे कर सकती हैं? अपनी बातों से और अपने कामों से। अगर आपके पति को इस बात का यकीन हो जाए, तो उसे ऐसा नहीं लगेगा कि आप उससे ज़्यादा अपने मम्मी-पापा पर ध्यान दे रही हैं।—बाइबल सिद्धांत: इफिसियों 5:33.

आपसे सलाह लेने के बजाय आपकी पत्नी अपने मम्मी-पापा से सलाह लेती है।

इसे आज़माइए: अपनी पत्नी के साथ इस बारे में बात कीजिए और मिलकर तय कीजिए कि किन मामलों में वह अपने मम्मी-पापा से सलाह-मशविरा कर सकती है, और किन मामलों में उसे आपसे बात करनी चाहिए। लेकिन ऐसा करते वक्‍त लकीर के फकीर मत बनिए। ज़रा सोचिए, क्या किसी समस्या के बारे में मम्मी-पापा से बात करना हमेशा गलत होता है? उनसे बात करना कब सही होगा? अगर आप दोनों मिलकर इस बारे में एक नतीजे पर पहुँचें, तो जब आपकी पत्नी अपने मम्मी-पापा से सलाह लेती है, तो इससे आपके रिश्ते में दरार नहीं आएगी।—बाइबल सिद्धांत: फिलिप्पियों 4:5. ▪ (g15-E 03)

^ पैरा. 4 इस लेख में कुछ नाम बदल दिए गए हैं।

^ पैरा. 9 यह जानकारी शादी को कामयाब बनाने के सात तरीके (अँग्रेज़ी) नाम की किताब से ली गयी है।