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यहोवा के साक्षी

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सजग होइए‍!  |  अक्टूबर 2014

 परिवार के लिए मदद | बच्चों की परवरिश

बच्चों को ‘ना’ कैसे कहें

बच्चों को ‘ना’ कैसे कहें

चुनौती

आपका बच्चा जिस बात के लिए ज़िद्द करता है, उसके लिए ‘ना’ कहने से वह आसानी से नहीं मानता। जब भी आप किसी बात के लिए उसे ‘ना’ कहते हैं, आपका सब्र परखा जाता है। आप चाहे जो भी कहें, पर वह नहीं मानता। आखिरकार आपको लगता है, अब हार मानने के सिवाय आपके पास कोई चारा नहीं। एक बार फिर आपका इरादा कमज़ोर पड़ जाता है और उसकी ज़िद्द से तंग आकर आप ‘हाँ’ कह देते हैं।

आप इस तरह हार मानने से बच सकते हैं। लेकिन सबसे पहले ‘ना’ कहने के बारे में कुछ बातों पर गौर कीजिए।

आपको क्या मालूम होना चाहिए

‘ना’ कहना बेरहमी से पेश आना नहीं है। कुछ माता-पिता इस बात से सहमत नहीं होंगे। वे शायद कहें कि आपको अपने बच्चे को सीधे-सीधे ना कहने के बजाय, उसे वजह बतानी चाहिए, उसे समझाना चाहिए और जैसे-तैसे बात मनवाने की कोशिश करनी चाहिए। पर जहाँ तक हो सके ‘ना’ कहने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे बच्चा आपसे नाराज़ हो जाएगा।

माना कि ‘ना’ कहने से शुरू-शुरू में आपका बच्चा निराश हो सकता है, मगर इससे वह एक ज़रूरी सबक सीखता है। असल ज़िंदगी में हर किसी के आगे कुछ हदें हैं, जिन्हें उसे मानना ही है। लेकिन अगर आप बच्चे की ज़िद्द के आगे घुटने टेक देंगे, तो आप अपने अधिकार की ताकत कम कर रहे होंगे। आप बच्चे को सिखा रहे होंगे कि उसे जब भी कुछ चाहिए उसके लिए वह रो-धोकर आपको राज़ी करवा सकता है। मगर समय के चलते, आपके ऐसे व्यवहार से वह आपसे नाराज़ रहने लगेगा। और ज़रा सोचिए, जिन माता-पिता को बच्चे रो-धोकर आसानी से राज़ी कर लेते हैं, उनकी बच्चे कितनी इज़्ज़त करेंगे?

‘ना’ कहकर आप बच्चे को तैयार कर रहे होंगे कि किशोर या बड़े होने पर उसे कैसे पेश आना चाहिए। इससे आप बच्चे को सिखाते हैं कि अपनी इच्छाओं को ‘ना’ कहना फायदेमंद है। जो बच्चा यह ज़रूरी सबक सीख लेता है, उस पर किशोर होने पर अगर ड्रग्स लेने या शादी से पहले लैंगिक संबंध रखने का दबाव आता है, तो मुमकिन है वह आसानी से समझौता नहीं करेगा।

ना कहकर आप बच्चे को इस बात के लिए भी तैयार करते हैं कि बड़े होने पर उसे कैसे पेश आना चाहिए। डॉक्टर डेविड वोल्श कहते हैं, ‘सच्चाई यह है कि हम बड़ों को हर वह चीज़ नहीं मिलती, जो हम चाहते हैं। इसलिए अगर हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि यह दुनिया उन्हें मुँह-माँगी चीज़ देगी, तो हम उन्हें समझदार इंसान बनने में मदद नहीं दे रहे होंगे।’ *

 आप क्या कर सकते हैं

लक्ष्य पर निशाना साधिए। आप चाहते हैं कि आपका बच्चा होनहार, जज़्बातों पर काबू रखनेवाला और एक कामयाब इंसान बने। लेकिन अगर आप उसे हर वह चीज़ देंगे जो वह माँगता है, तो आप अपने लक्ष्य से हटकर निशाना लगा रहे होंगे। बाइबल कहती है, अगर किसी का “पालन-पोषण उसके बचपन से लाड़-प्यार से किया जाए, तो वह बाद में एहसान-फरामोश हो जाएगा।” (नीतिवचन 29:21, एन.डब्ल्यू.) इसलिए ‘ना’ कहना बच्चों को बेहतर अनुशासन देने का एक तरीका है। ऐसी तालीम से आपके बच्चे को नुकसान नहीं, फायदा ही होगा।—बाइबल सिद्धांत: नीतिवचन 19:18.

‘ना’ कहने का अपना इरादा पक्का रखिए। आपका बच्चा आपके बराबर नहीं है। इसलिए यह ज़रूरी नहीं कि आपने जिस बात के लिए ‘ना’ कहा है, उस बारे में बच्चे से बहस करें, मानो आपको यह साबित करना है कि आपका ‘ना’ कहना सही है। हाँ, यह सच है कि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसे “अपनी सोचने-समझने की शक्‍ति का इस्तेमाल करते-करते, सही-गलत में फर्क करने के लिए इसे प्रशिक्षित” करने की ज़रूरत है। (इब्रानियों 5:14) इसलिए बच्चे के साथ तर्क करने में कोई बुराई नहीं है। मगर छोटे बच्चे के साथ इस बारे में लंबी-चौड़ी बहस मत कीजिए कि आपने ‘ना’ क्यों कहा। अगर आप उसके साथ ज़्यादा बहस करेंगे, तो आपका फैसला, फैसला नहीं बल्कि ऐसा लगेगा जैसे आप बच्चे से राय ले रहे हों।—बाइबल सिद्धांत: इफिसियों 6:1.

अपने फैसले पर अटल बने रहिए। आपका बच्चा रो-धोकर या गिड़गिड़ाकर शायद यह परखे कि आप अपने फैसले पर अटल रहते हैं या नहीं। अगर ऐसा घर पर होता है, तो आप क्या कर सकते हैं? बिना नुकसान पहुँचाए प्यार कीजिए (अँग्रेज़ी) किताब सुझाव देती है, “बच्चे से थोड़ा दूर हो जाइए। उससे कहिए, ‘अगर तुम्हारा रोने का मन कर रहा है, तो रोते रहो। पर मैं तुम्हारा रोना नहीं सुनना चाहता। जाओ अपने कमरे में जाओ, वहाँ तुम्हें जितना रोना हो, रो लो।’” शुरू-शुरू में ऐसा करना शायद आपको मुश्किल लगे और बच्चे को भी शायद ऐसा अनुशासन कबूल करना आसान न हो। लेकिन जब उसे एहसास हो जाएगा कि आप अपनी बात से मुकरेंगे नहीं, तो मुमकिन है वह आपके ‘ना’ का विरोध करना कम कर देगा।—बाइबल सिद्धांत: याकूब 5:12.

सिर्फ माता-पिता होने का हक जताने के लिए ‘ना’ मत कहिए

लिहाज़ दिखाइए। सिर्फ माता-पिता होने का हक जताने के लिए ‘ना’ मत कहिए। इसके बजाय, आपके व्यवहार से बच्चे को एहसास होना चाहिए कि आप “लिहाज़ करनेवाले इंसान” हैं। (फिलिप्पियों 4:5) कई बार ऐसे मौके भी होते हैं, जब आप अपने बच्चे से ‘हाँ’ कह सकते हैं। बस इतना ध्यान रखें, आप बच्चे का रोना-धोना सुनकर ‘हाँ’ न कहें, न ही उसकी किसी गलत गुज़ारिश के लिए ‘हाँ’ कहें।—बाइबल सिद्धांत: कुलुस्सियों 3:21. ▪ (g14-E 08)

^ पैरा. 10 ‘ना’: हर उम्र के बच्चों को क्यों सुनने की ज़रूरत है और माता-पिता यह कैसे कह सकते हैं (अँग्रेज़ी) किताब से।