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यहोवा के साक्षी

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सजग होइए‍!  |  जुलाई 2014

 बातचीत | गीयेरमो पेरेज़

एक जाना-माना डॉक्टर अपने विश्वास के बारे में बताता है

एक जाना-माना डॉक्टर अपने विश्वास के बारे में बताता है

डॉक्टर गीयेरमो पेरेज़, दक्षिण अफ्रीका के एक अस्पताल में काम करते थे, जहाँ 700 मरीज़ों को रखने की सुविधा थी। हाल ही में वे एक सीनियर डॉक्टर (हेड ऑफ सर्जरी) से रिटायर हुए। सालों से वे विकासवाद में विश्वास करते थे। मगर बाद में उन्हें यकीन हो गया कि इंसान का शरीर परमेश्वर ने रचा है। सजग होइए! ने उनसे उनके विश्वास के बारे में कुछ सवाल पूछे।

क्या आप बता सकते हैं, पहले आप क्यों विकासवाद में विश्वास करते थे?

हालाँकि मैं कैथोलिक परिवार में पला-बढ़ा, मगर परमेश्वर को लेकर मेरे मन में सवाल थे। जैसे, मैं एक ऐसे परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता था जो लोगों को नरक की आग में तड़पाता है। इसलिए जब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सिखाते थे कि धरती पर जीवन विकासवाद से आया है, न कि परमेश्वर ने उसकी सृष्टि की, तो मैंने वह बात मान ली। और मुझे लगा सबूत भी यही पुख्ता करते हैं। रही बात चर्च की, तो मैं जिस चर्च में जाता था वह विकासवाद को नहीं ठुकराता था, बल्कि वहाँ माना जाता था कि यह परमेश्वर की शिक्षा है।

किस बात से बाइबल में आपकी दिलचस्पी जागी?

मेरी पत्नी सुज़ाना यहोवा के साक्षियों के साथ बाइबल अध्ययन करने लगी। उन्होंने उसे बाइबल से दिखाया कि परमेश्वर लोगों को नरक की आग में नहीं तड़पाता। * और परमेश्वर वादा करता है कि वह इस धरती को फिरदौस में बदल देगा। * आखिरकार हमें ऐसी शिक्षाएँ सीखने को मिलीं जिनमें तुक बनता था। सन्‌ 1989 में निक नाम का एक यहोवा का साक्षी मेरे पास आने लगा। एक बार हम इंसान के शरीर और उसकी शुरूआत के बारे में बात कर रहे थे, तब उस साक्षी ने बाइबल से इब्रानियों 3:4 में लिखा आसान-सा तर्क दिखाया। वह मेरे दिल को छू गया। वहाँ लिखा है, “हर घर का कोई न कोई बनानेवाला होता है, मगर जिसने सबकुछ बनाया वह परमेश्वर है।”

क्या इंसान के शरीर पर अध्ययन करने से आपको यह कबूल करने में मदद मिली कि दुनिया की सृष्टि की गयी है?

हाँ। मिसाल के लिए, हमारा शरीर जिस तरह चोट को खुद-ब-खुद सही कर लेता है, वह दिखाता है कि इसे बड़ी सावधानी से रचा गया है। घाव ठीक होने को ही ले लीजिए जो चार चरणों में होता है। इस बात से मुझे यह एहसास हुआ कि एक सर्जन होकर भी मैं तो बस शरीर में खुद से ठीक होनेवाली काबिलीयत में थोड़ा योगदान देता हूँ।

अच्छा, यह बताइए, जब हमारे शरीर में चोट लगती है तो क्या होता है?

कुछ ही सेकंड में, खून बहने से रोकने के लिए पहला चरण शुरू हो जाता है, जिसमें कई सारे काम शामिल हैं। ये काम बहुत पेचीदा हैं, पर बड़ी कुशलता से होते हैं। इससे भी बढ़कर हमारे शरीर में खून के बहाव की जो व्यवस्था है, उसमें करीब 1,00,000 किलोमीटर (60,000 मील) की  लंबाई की रक्‍त-धमनियाँ (ब्लड वेसेल्स) होती हैं। ज़रूर इससे प्लम्बिंग इंजीनियर हैरत में पड़ जाते होंगे, क्योंकि इसमें ऐसी काबिलीयत है कि चोट लगने पर जब कोई रक्‍त-धमनी फट जाती है, तो खून बहना खुद-ब-खुद बंद हो जाता है और वह धमनी फिर से जुड़ जाती है।

दूसरे चरण में क्या होता है?

कुछ ही घंटों में खून बहना बंद हो जाता है और उस जगह पर सूजन-सी आने लगती है। इसमें एक-के-बाद-एक कई हैरान कर देनेवाली घटनाएँ शामिल हैं। सबसे पहले, जो रक्‍त-धमनियाँ खून को बहने से रोकने के लिए पहले सिकुड़ गयी थीं, अब फैलने लगती हैं, ताकि घाव वाली जगह में खून का बहाव ज़्यादा हो। इसके बाद, एक तरल पदार्थ जिसमें प्रोटीन ज़्यादा होता है, चोट वाली पूरी जगह में सूजन पैदा करता है। यह तरल पदार्थ, संक्रमण से लड़ने, ज़हर को बेअसर करने और घायल ऊतक (टिशु) को निकालने के लिए बहुत ज़रूरी है। इस तरह की सारी घटनाओं में होनेवाली हर प्रक्रिया के लिए खास किस्म के लाखों अणुओं और कोशिकाओं की ज़रूरत होती है। इनमें से कुछ घटनाएँ अगला चरण शुरू करने के लिए होती हैं, उसके बाद इनका काम खत्म हो जाता है।

घाव भरने के अगले चरण में क्या-क्या होता है?

एक-दो दिन में ही हमारा शरीर घाव भरनेवाली चीज़ें तैयार करने लगता है, यानी वह प्रक्रिया होने लगती है, जो तीसरे चरण की शुरूआत होती है। यह चरण करीब दो हफ्ते में अपने आखिरी मुकाम पर पहुँचता है। जो कोशिकाएँ घाव के आस-पास तंतु या रेशे (फाइबर) बनाती हैं, वे चोट वाली जगह में जाती हैं और दूसरी अनगिनत कोशिकाओं को जन्म देती हैं। इसके अलावा, छोटी-छोटी नयी रक्‍त-धमनियाँ निकलती हैं और चोट वाली जगह की तरफ बढ़ती हैं। ये रक्‍त-धमनियाँ घाव ठीक होने के दौरान उस जगह से खराब पदार्थ निकालती हैं और ज़्यादा मात्रा में पोषक तत्व वहाँ पहुँचाती हैं। फिर कुछ और पेचीदा घटनाएँ होती हैं, जिनमें खास कोशिकाएँ पैदा होती हैं। ये कोशिकाएँ घाव के किनारों को एक साथ जोड़ती हैं।

बाप रे! इतने सारे काम होते हैं! घाव पूरी तरह भरने में और कितना समय लगता है?

आखिरी चरण में, जिसमें शरीर पहले जैसा आकार लेता है, महीने लग जाते हैं। जो हड्डियाँ टूट गयी थीं, उनमें पहले जैसी ताकत आती है और घाव वाली जगह पर एक नाज़ुक ऊतक (सॉफ्ट-टिशु) के आस-पास जो तंतु या रेशे थे, उनकी जगह मज़बूत तंतु या रेशे आ जाते हैं। सचमुच, घाव ठीक होना हैरान कर देनेवाला एक ऐसा प्रोग्राम है, जिसमें हर काम आपसी तालमेल से होता है।

क्या आप एक ऐसी घटना बता सकते हैं, जिसका आप पर गहरा असर हुआ?

जब मैं देखता हूँ कि कैसे शरीर अपने आप चोट ठीक कर लेता है, तो मैं हैरान रह जाता हूँ

हाँ। एक बार मैंने एक 16 साल की लड़की का इलाज किया, जिसका बड़ा खतरनाक कार एक्सीडेंट हुआ था। लड़की की हालत बहुत गंभीर थी, उसकी तिल्ली (खून को साफ करने और संचित करनेवाला पेट के पास का एक अंग) फट गयी थी, जिसकी वजह से शरीर के अंदर खून बहने लगा था। सालों पहले की बात होती, तो हम तिल्ली को ठीक करने के लिए उसका ऑपरेशन करते या उसे निकालकर फेंक देते। आज डॉक्टर ज़्यादातर इस बात पर भरोसा करते हैं कि शरीर में खुद चोट को ठीक करने की काबिलीयत है। इसलिए मैंने बस संक्रमण रोकने, खून बहने से रोकने, एनीमिया (खून की कमी) और दर्द का इलाज किया। कुछ ही हफ्तों बाद, एक जाँच से पता चला कि उसकी तिल्ली ठीक हो गयी है! जब मैं देखता हूँ कि कैसे शरीर अपने आप चोट ठीक कर लेता है, तो मैं हैरान रह जाता हूँ। इससे मुझे और भी यकीन हो गया कि हमें परमेश्वर ने रचा है।

क्या बात आपको यहोवा के साक्षियों की तरफ खींच लायी?

मैंने देखा कि वे बहुत दोस्ताना स्वभाव के हैं और उन्होंने मेरे हर सवाल का जवाब बाइबल से दिया। वे जिस तरह हिम्मत से अपने विश्वास के बारे में दूसरों को बताते हैं और परमेश्वर के बारे में सीखने में उनकी मदद करते हैं, वह मुझे बहुत अच्छा लगता है।

क्या यहोवा का साक्षी बनने से आपको अपने काम में कोई मदद मिली है?

बेशक। दरअसल, मुझमें धीरे-धीरे करुणा या तरस की भावना कम होती जा रही थी। यह अकसर उन डॉक्टरों और नर्सों के साथ होता है, जो लगातार गंभीर रूप से बीमार या घायल लोगों का इलाज करते हैं। साक्षी बनने से मुझे अपनी इस कमज़ोरी से लड़ने में मदद मिली। इसके अलावा, जब मरीज़ कुछ बातचीत करना चाहता था, तो मैं उसे समझाता था कि हमारे सृष्टिकर्ता ने वादा किया है कि एक दिन बीमारी और दुख-तकलीफें * खत्म हो जाएँगी और वह एक ऐसी दुनिया लाएगा जिसमें कोई न कहेगा, “मैं रोगी हूं।” * ▪ (g14-E 05)