चुनौती

“मैं जो कह रही हूँ, क्या आप सुन भी रहे हैं?” आपकी पत्नी आपसे ऐसा कहती है। “हाँ, मैं सुन तो रहा था” आप खुद से कहते हैं। सच तो यह है कि आपने जो सुना और आपकी पत्नी ने जो कहा, दोनों में बहुत फर्क है। इसका नतीजा, एक और बहस छिड़ जाती है। *

आप इस तरह की बहस टाल सकते हैं। कैसे? सबसे पहले आपको यह समझना होगा कि पत्नी की बात सुनते हुए भी, आप उसकी कही कुछ ज़रूरी बातों को ध्यान से सुनने में चूक सकते हैं।

ऐसा क्यों होता है

आपका ध्यान कहीं और है, आप थके हैं या दोनों वजह हो सकती हैं। बच्चे शोर मचा रहे हैं, टी.वी की आवाज़ बहुत तेज़ है और आप काम की जगह पर हुई किसी बात को लेकर परेशान हैं। तभी आपकी पत्नी आपसे कुछ कहती, शायद शाम को घर आनेवाले मेहमानों के बारे में। आप “हाँ” में सिर हिला देते हैं। लेकिन क्या वाकई आप अपनी पत्नी की बात ध्यान से सुन रहे थे? शायद नहीं!

आप अटकलें लगाते हैं। आपकी पत्नी जो कहती है, उसके पीछे छिपी वजह को जानने के लिए आप अटकलें लगाते हैं। ऐसा करते वक्‍त, आप हालात के बारे में ज़रूरत-से-ज़्यादा ही सोचने लगते हैं। मान लीजिए कि आपकी पत्नी आपसे कहती है: “इस हफ्ते आपने कुछ ज़्यादा ही घंटे काम किया।” मगर आपको लगता है कि आप पर ताना कसा जा रहा है। इसलिए आप कहते हैं: “तो और क्या करूँ? तुम्हारे खर्चे इतने बढ़ते जा रहे हैं।” आपकी पत्नी कहती है: “मैं आप पर इलज़ाम नहीं लगा रही थी।” आपकी पत्नी के कहने का मतलब था, कम-से-कम हफ्ते के आखिर में आप दोनों साथ मिलकर कुछ वक्‍त बिताएँ।

पूरी बात सुने बगैर आप हल ढूँढ़ने लगते हैं। मानसी * कहती है, “कभी-कभी मैं बस अपनी दिल की बात बताना चाहती हूँ कि मैं कैसा महसूस कर रही हूँ। लेकिन गौरव तो हमेशा समस्या का हल ढूँढ़ने में लगे रहते हैं। मगर मुझे हल नहीं चाहिए, मैं बस इतना चाहती हूँ कि गौरव मेरी बात सुनें और समझने की कोशिश करें कि मैं क्या चाहती हूँ।” यहाँ पर समस्या की जड़ क्या है? गौरव हमेशा इस उधेड़-बुन में लगा रहता है कि किस तरह समस्या का हल ढूँढ़ा जाए। नतीजा, वह मानसी की आधी-अधूरी बात सुनता है या फिर बिलकुल ही नहीं सुनता।

समस्या की वजह चाहे जो भी हो, आप एक अच्छा सुननेवाला कैसे बन सकते हैं?

 आप क्या कर सकते हैं

ध्यान से सुनिए। आपकी पत्नी आपसे कुछ ज़रूरी बात कहना चाहती है, लेकिन क्या आप सुनने के लिए तैयार हैं? शायद नहीं। हो सकता है, उस वक्‍त आप कुछ सोच रहे हों या कुछ काम कर रहे हों, अगर ऐसा है तो सुनने का दिखावा मत कीजिए। हो सके तो, आप जो काम कर रहे हैं उसे छोड़कर, अपनी पत्नी की बात ध्यान से सुनिए। या फिर आप अपनी पत्नी से कह सकते हैं कि ‘क्या हम थोड़ी देर बाद बात कर सकते हैं?’—बाइबल सिद्धांत: याकूब 1:19.

जब आपका साथी बोलता है, तो सुनिए। जब आपका साथी बोल रहा है, तो बीच में बोलने या सफाई पेश करने से दूर रहिए। आपको अपनी बात कहने का मौका मिलेगा, तब तक शांत रहकर अपने साथी की बात सुनिए।—बाइबल सिद्धांत: नीतिवचन 18:13.

सवाल पूछिए। सवाल पूछने से आप अपने साथी की बात अच्छी तरह समझ सकते हैं। मानसी जिसका पहले भी ज़िक्र किया गया है, वह कहती है: “बातचीत के दौरान जब गौरव मुझसे सवाल पूछते हैं, तो मुझे अच्छा लगता है। इससे मैं जान पाती हूँ कि वे मेरी बात ध्यान से सुन रहे हैं और उसमें दिलचस्पी ले रहे हैं।”

सिर्फ शब्द ही नहीं, उसका मतलब भी समझिए। ध्यान दीजिए कि बात करने के लहज़े, हाव-भाव और आँखों से क्या पता चलता है। उदाहरण के लिए, अगर साथी कहे “ठीक है” तो इसका मतलब असल में “ठीक नहीं भी” हो सकता है। या अगर साथी कहे “आप कभी मेरी मदद नहीं करते” तो इसका मतलब हो सकता है “मैं आपके लिए कोई मायने नहीं रखती।” इसलिए सिर्फ बोले गए शब्दों का ही नहीं बल्कि अनकहे शब्दों का मतलब भी समझने की कोशिश कीजिए। नहीं तो हो सकता है, कहे गए शब्दों के असल मतलब को समझने के बजाय, आप बहस करने बैठ जाएँ।

अपने साथी की सुनिए। जो बातें आपसे कही जा रही हैं शायद आपको पसंद न आएँ, तब भी साथी की बात बीच में मत काटिए और न ही वहाँ से उठकर चले जाइए। मिसाल के लिए, तब क्या जब आपका साथी आपकी गलती बता रहा हो? इसका जवाब देते हुए गौतम जिसकी शादी को 60 साल हो चुके हैं, कहता है कि ऐसे में भी “अपने साथी की सुनिए”, आपका साथी जो कह रहा है, उसे गंभीरता से लीजिए। ऐसा करने के लिए आपको समझ से काम लेने की ज़रूरत है। यकीन रखिए आपकी कोशिश बेकार नहीं जाएगी।”—बाइबल सिद्धांत नीतिवचन 18:15.

साथी की बातों में सच्ची दिलचस्पी लीजिए। ध्यान से सुनना सिर्फ एक काम नहीं बल्कि प्यार ज़ाहिर करने का एक तरीका है। अगर आप अपने साथी की बातों में सच्ची दिलचस्पी लेते हैं, तो उसकी बातें सुनना आपको बोझ नहीं लगेगा। इस तरह आप बाइबल की यह सलाह मान रहे होंगे: ‘सिर्फ अपने भले की फिक्र में न रहें, बल्कि दूसरे के भले की भी फिक्र करें।’—फिलिप्पियों 2:4. ▪ (g13-E 12)

^ पैरा. 4 हालाँकि इस लेख में पति को ध्यान में रखकर बात कही गयी है। लेकिन यहाँ दिए सिद्धांत पति और पत्नी दोनों पर लागू होते हैं।

^ पैरा. 9 इस लेख में नाम बदल दिए गए हैं।