इस जानकारी को छोड़ दें

सैकेंडरी मैन्यू को छोड़ दें

विषय-सूची को छोड़ दें

यहोवा के साक्षी

हिंदी

सजग होइए‍!  |  जनवरी 2013

 परिवार के लिए मदद | बच्चों की परवरिश

अपने किशोर बच्चे से कैसे बात करें

अपने किशोर बच्चे से कैसे बात करें

चुनौती

जब आपका बच्चा छोटा था, तो वह आपको हर बात बताता था। लेकिन जब से वह किशोर उम्र का हो गया है, तो मानो उसने अपने होंठ सी लिए हों। और जब आप उससे बात करने की कोशिश करते हैं, तो वह दो टूक जवाब देता है या फिर बहसबाज़ी पर उतर आता है। देखते-ही-देखते घर, लड़ाई का अखाड़ा बन जाता है।

अपने किशोर बच्चे से बात करना एक हुनर है, जो आप सीख सकते हैं। लेकिन इससे पहले आइए ऐसी दो वजहों पर गौर करें जो किशोर बच्चों से बात करना एक चुनौती बनाती हैं।

ऐसा क्यों होता है

आज़ादी पाने की चाहत। आपका किशोर रातों-रात ज़िम्मेदार इंसान नहीं बनता। इसमें वक्‍त लगता है। आपको धीरे-धीरे उसे आज़ादी देने की ज़रूरत है ताकि वह ज़िंदगी में आनेवाली चुनौतियों का सामना करना सीख सके। बेशक कुछ किशोर हैं जो ज़रूरत से ज़्यादा आज़ादी पाना चाहते हैं। दूसरी तरफ, कुछ माँ-बाप ऐसे हैं जो अपने बच्चों को कम छूट देते हैं। इस खींचा-तानी की वजह से माँ-बाप और बच्चों, दोनों को काफी तनाव से गुज़रना पड़ता है। सौलह साल का भरत * शिकायत करता है: “मेरे माँ-बाप मेरी हर हरकत पर पैनी नज़र रखते हैं। मैंने फैसला किया है कि जब मैं 18 साल का हो जाऊँगा तो उन्हें मुझे और आज़ादी देनी होगी, अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो मैं घर छोड़कर चला जाऊँगा।”

जाँच-परख करने की काबिलीयत। छोटे बच्चों को लगता है कि हर बात या तो गलत है या सही। लेकिन किशोर उम्र के बच्चे समझते हैं कि ज़िंदगी की हर बात सही-गलत तक सीमित नहीं होती, बल्कि बहुत पेचीदा होती है। यह दिखाता है कि उनकी जाँच-परख करने की काबिलीयत बढ़ रही है। इससे एक किशोर को सही फैसले लेने में मदद मिलती है। एक मिसाल लीजिए: एक छोटे बच्चे के लिए इंसाफ का मतलब है, ‘माँ ने लड्डू को दो हिस्सों में बाँटा, आधा हिस्सा मुझे दिया और आधा मेरे भाई को।’ लेकिन किशोर जानते हैं कि इंसाफ करने में बहुत कुछ शामिल है। इंसाफ का हमेशा यह मतलब नहीं कि दो लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए। इस तरह जब एक किशोर जाँच-परख करने की अपनी काबिलीयत बढ़ाता है तो वह समस्याओं को सुलझाना सीखता है और अपनी राय कायम करने लगता है। इस वजह से उसकी सोच अकसर उसके माँ-बाप की सोच से मेल नहीं खाती।

 आप क्या कर सकते हैं

जब भी मौका मिले, बात कीजिए। हर मौके का फायदा उठाइए, जैसे घर का काम-काज करते वक्‍त या गाड़ी में सफर करते वक्‍त। कुछ माँ-बाप ने पाया है कि ऐसे मौकों पर वे अपने किशोर के बगल में होते हैं और इससे बच्चे खुलकर अपनी बात कह पाते हैं, वरना अगर वे उनके आमने-सामने बैठकर बात करें तो बच्चों को झिझक महसूस होती है।​—बाइबल सिद्धांत: व्यवस्थाविवरण 6:6, 7.

बातचीत छोटी रखिए। हर मसले पर इस हद तक बहस मत कीजिए कि आप एक-दूसरे से रूठ जाएँ। इसके बजाय अपनी बात कहिए . . . और फिर चुप हो जाइए। आपको शायद लगे कि आपका बच्चा आपकी बात पर ध्यान नहीं दे रहा, मगर ऐसा नहीं है। बाद में जब वह अकेला होगा तो आपकी बात पर ज़रूर सोचेगा और उसे समझेगा भी। इसलिए उसे वक्‍त दीजिए ताकि वह ऐसा कर सके।​—बाइबल सिद्धांत: नीतिवचन 1:1-4.

सुनिए और लिहाज़ दिखाइए। बिना टोके, ध्यान से उसकी बात सुनिए ताकि आप समस्या को अच्छी तरह समझ सकें। उसकी भावनाओं का लिहाज़ करते हुए जवाब दीजिए। अगर आप अपने बनाए नियमों पर अड़े रहें, तो आपका किशोर उन्हें तोड़कर सज़ा से बच निकलने का कोई-न-कोई रास्ता ढूँढ़ लेगा। अपने किशोर से जुड़े रहिए (अँग्रेज़ी) किताब कहती है: “ऐसे में बच्चे दोहरी ज़िंदगी जीने लगते हैं। एक तरफ, वे माँ-बाप से वही बात कहते हैं जो वे सुनना चाहते हैं और दूसरी तरफ, माँ-बाप की गैर-हाज़िरी में वे वही करते हैं जो उनका मन कहता है।”​—बाइबल सिद्धांत: फिलिप्पियों 4:5.

शांत रहिए। किरण नाम की एक किशोर लड़की कहती है: “जब मेरी और माँ की सोच मेल नहीं खाती, तो माँ मेरी हर बात पर गुस्सा हो जाती है। यही बात मुझे चिढ़ दिलाती है। फिर हमारी बातचीत झगड़े में बदल जाती है।” माता-पिताओ, गुस्से से भड़कने के बजाय ऐसी बात कहिए जिससे ज़ाहिर हो कि आप अपने किशोर की भावनाएँ समझते हैं। मिसाल के लिए, यह कहने के बजाय कि “इसमें चिंता की क्या बात है!” यह कहिए कि “मैं समझ सकता हूँ, तुम इस बात से कितने परेशान हो।”​—बाइबल सिद्धांत: नीतिवचन 10:19.

फैसले लेने में उसकी मदद कीजिए, न कि यह बताइए कि उसे क्या करना है क्या नहीं। जिस तरह माँस-पेशियों को मज़बूत करने के लिए खुद एक व्यक्‍ति को कसरत करने की ज़रूरत है, उसी तरह आपके किशोर को जाँच-परख करने की अपनी काबिलीयत बढ़ाने के लिए खुद मेहनत करने की ज़रूरत है। इसलिए जब वह किसी उलझन में होता है, तो उसके लिए फैसले मत लीजिए। मसले पर चर्चा करते वक्‍त उसे खुद हल ढूँढ़ने दीजिए। दो-तीन सुझावों पर विचार करने के बाद उससे कहिए: “ये कुछ तरीके हैं मसले को सुलझाने के। एक-दो दिन लेकर इन पर आराम से सोचो और फिर अपना चुनाव करो। इसके बाद हम साथ बैठकर बात करेंगे कि तुमने क्या चुनाव किया है और क्यों।”​—बाइबल सिद्धांत: इब्रानियों 5:14. ▪ (g13-E 01)

^ पैरा. 7 इस लेख में नाम बदल दिए गए हैं।