इस जानकारी को छोड़ दें

सैकेंडरी मैन्यू को छोड़ दें

विषय-सूची को छोड़ दें

यहोवा के साक्षी

हिंदी

सजग होइए‍!  |  अंक 4 2017

 क्या इसे रचा गया था?

पोलीया बेरी का चमकीला नीला रंग

पोलीया बेरी का चमकीला नीला रंग

पोलीया कॉनडेनसाटा नाम का पौधा पूरे अफ्रीका में पाया जाता है। इसका छोटा-सा फल, जिसे पोलीया बेरी कहते हैं, चमकीले नीले रंग का होता है। इतना गहरा रंग किसी और पौधे में देखने को नहीं मिलता। लेकिन कमाल की बात यह है कि इस फल में ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जिससे इसका रंग नीला हो। तो फिर यह इतना नीला कैसे दिखता है?

गौर कीजिए: पोलीया बेरी के छिलके में जो कोशिकाएँ होती हैं, उनकी दीवारों में छोटे-छोटे धागे होते हैं। ये धागे कुछ इस तरह व्यवस्थित होते हैं, मानो माचिस की कई तीलियाँ एक के बगल में एक रखी गयी हों। इस तरीके से व्यवस्थित धागों की कई परतें होती हैं। ये परतें एक-के-ऊपर-एक तो होती हैं, लेकिन हर परत की दिशा नीचेवाली परत से थोड़ी अलग होती है। इस वजह से ये परतें घुमावदार सीढ़ी की तरह दिखती हैं। कोशिका के धागे नीले रंग के नहीं होते, लेकिन इन धागों की परतें जिस तरह एक-दूसरे के ऊपर लगी होती हैं, उस बनावट की वजह से बेरी का रंग गहरा नीला और चमकदार दिखता है। ज़्यादातर कोशिकाएँ नीली नज़र आती हैं। लेकिन कुछ कोशिकाओं की दीवारों की परतों में थोड़ा फर्क होता है, इसलिए उन्हें अलग-अलग दिशा से देखने पर वे हरी, गुलाबी या पीली दिखती हैं। बहुत नज़दीक से देखने पर इस बेरी के रंग हर जगह एक जैसे नहीं दिखते, बल्कि ऐसा लगता है जैसे हलके-गहरे रंग के बहुत-से बिंदु आपस में जुड़े हों, ठीक जैसे कंप्यूटर में कोई तसवीर नज़दीक से देखने पर नज़र आती है।

पोलीया बेरी का अपना कोई रंग नहीं होता, इसलिए पौधे से टूट जाने पर भी इनका रंग फीका नहीं पड़ता। ताज्जुब की बात है कि करीब 100 साल पहले इकट्ठा की गयीं कुछ बेरियों का रंग आज भी उतना ही चमकीला है, जितना ताज़ा बेरियों का होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन बेरियों में कोई गूदा नहीं होता, सिर्फ बीज होते हैं, फिर भी ये आस-पास उड़नेवाली चिड़ियों को आकर्षित करती हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि पोलिया बेरी की बनावट की वजह से उसमें जो रंग आता है, उसकी नकल करके कई चीज़ें तैयार की जा सकती हैं। जैसे, ऐसे रंग जो फीके न पड़ें या ऐसे रंगीन कागज़ जिनकी नकल न की जा सके।

आपको क्या लगता है? पोलीया बेरी में चमकीला नीला रंग जिस तरह आता है, क्या उसका खुद-ब-खुद विकास हुआ या फिर उसे इस तरह रचा गया है?