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यहोवा के साक्षी

हिंदी

प्रहरीदुर्ग—अध्ययन संस्करण  |  मार्च 2016

आपने पूछा

आपने पूछा

परमेश्वर के लोग महानगरी बैबिलोन की कैद में कब थे?

ईसवी सन्‌ 100 के बाद से वे आध्यात्मिक मायने में कैद में चले गए और 1919 तक इसी हालत में रहे। हमारी समझ में यह फेरबदल क्यों ज़रूरी है?

सारे सबूतों से पता चलता है कि 1919 में अभिषिक्‍त मसीही महानगरी बैबिलोन से आज़ाद हो गए और उन्हें एक शुद्ध मंडली में इकट्ठा किया जाने लगा। ज़रा इस बारे में सोचिए: सन्‌ 1914 में जब स्वर्ग में परमेश्वर के राज का शासन शुरू हुआ, उसके फौरन बाद परमेश्वर के लोगों का मुआयना किया गया और धीरे-धीरे उन्हें झूठी उपासना से शुद्ध किया गया। * (मला. 3:1-4) फिर 1919 में यीशु ने परमेश्वर के शुद्ध लोगों को ‘सही वक्‍त पर खाना’ देने के लिए ‘विश्वासयोग्य और सूझ-बूझ से काम लेनेवाले दास’ को नियुक्‍त किया। (मत्ती 24:45-47) उसी साल परमेश्वर के लोगों को महानगरी बैबिलोन की लाक्षणिक कैद से रिहा किया गया। (प्रका. 18:4) लेकिन परमेश्वर के लोग कैद में कब गए?

सालों पहले हम समझाते थे कि परमेश्वर के लोग 1918 की शुरूआत में थोड़े समय के लिए महानगरी बैबिलोन की कैद में चले गए थे। जैसे 15 मार्च, 1992 की प्रहरीदुर्ग में बताया गया था कि जिस तरह इसराएली बैबिलोन की कैद में चले गए थे उसी तरह 1918 में परमेश्वर के लोग महानगरी बैबिलोन की कैद में चले गए। लेकिन काफी खोजबीन करने से पता चला है कि परमेश्वर के लोग 1918 से पहले ही बहुत सालों तक कैद में रहे।

यहेजकेल 37:1-14 में दर्ज़ भविष्यवाणी में बताया गया था कि परमेश्वर के लोग कैद में जाएँगे और बाद में उन्हें रिहा किया जाएगा। यहेजकेल ने एक दर्शन में देखा कि एक घाटी हड्डियों से भरी हुई है। यहोवा ने उससे कहा, ‘ये हड्डियाँ इसराएल के सारे घराने’ को दर्शाती हैं। (आयत 11) जी हाँ, यह बात इसराएल राष्ट्र पर लागू होती है और “परमेश्वर के इसराएल” यानी अभिषिक्‍त मसीहियों पर भी। (गला. 6:16; प्रेषि. 3:21) यहेजकेल दर्शन में देखता है कि हड्डियों में जान आ जाती है और एक बड़ी सेना बन जाती है। यह दिखाता है कि परमेश्वर के लोगों को 1919 में महानगरी बैबिलोन की कैद से किस तरह रिहा किया गया। लेकिन इस भविष्यवाणी से यह कैसे पता चलता है कि वे काफी लंबे समय तक कैद में रहे?

पहली बात, यहेजकेल गौर करता है कि मरे हुए लोगों की हड्डियाँ “बहुत सूखी” हैं। (यहे. 37:2, 11) इसका मतलब लोगों को मरे हुए काफी लंबा समय हो गया था। दूसरी बात, यहेजकेल ने देखा कि मरे हुओं में धीरे-धीरे जान आयी, न कि अचानक। पहले उसे एक “आवाज़” सुनायी दी और “खड़खड़ाहट हुई और हड्डियाँ इकट्ठी होकर एक दूसरे से जुड़ गईं।” फिर उसने देखा कि “उन पर नसें चढ़ गईं और मांस भर गया।” इसके बाद  त्वचा से मांस ढक गया। फिर “उनमें श्वास आ गया और वे जीवित” हो गए। आखिरकार, ज़िंदा हुए लोगों कोर यहोवा ने उनके देश में बसा दिया। यह सब होने में वक्‍त लगेगा।—यहे. 37:7-10, 14, अ न्यू हिंदी ट्रांस्लेशन।

जैसे इस भविष्यवाणी में बताया गया था, इसराएली बैबिलोन की कैद में बहुत समय तक थे। इसकी शुरूआत ईसा पूर्व 740 में हुई जब इसराएल के दस गोत्र यानी उत्तर के राज्य को अपना देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया। बाद में ईसा पूर्व 607 में, बैबिलोन के लोगों ने यरूशलेम को नाश कर दिया और बाकी दो गोत्र यानी यहूदा के दक्षिणी राज्य के लोगों को अपना देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया। फिर ईसा पूर्व 537 में इसराएल राष्ट्र कैद से आज़ाद हो गया। उस समय थोड़े से यहूदी यरूशलेम में मंदिर को दोबारा बनाने और यहोवा की उपासना फिर से शुरू करने वापस आए थे।

इस पूरी जानकारी से पता चलता है कि अभिषिक्‍त मसीही काफी लंबे समय तक महानगरी बैबिलोन की कैद में रहे, न कि सिर्फ 1918 से 1919 तक। यीशु ने भी इस लंबे समय का ज़िक्र किया था और कहा था कि नकली मसीही यानी जंगली पौधे, ‘राज के बेटों’ यानी गेहूँ के साथ-साथ बढ़ेंगे। (मत्ती 13:36-43) उस दौरान बस गिने-चुने सच्चे मसीही थे। ज़्यादातर लोग सच्चे मसीही होने का दम भरते थे। उन्होंने झूठी शिक्षाएँ अपना ली थीं और सच्चे मसीही धर्म के खिलाफ बगावत करने लगे। इसलिए हम कह सकते हैं कि मसीही मंडली महानगरी बैबिलोन की कैद में रही। कैद में रहने की शुरूआत ईसवी सन्‌ 100 के कुछ समय बाद हुई। यह तब तक इस हालत में रही जब तक कि आखिरी दिनों में परमेश्वर के आध्यात्मिक मंदिर को शुद्ध नहीं किया गया।—प्रेषि. 20:29, 30; 2 थिस्स. 2:3, 6; 1 यूह. 2:18, 19.

उन सैकड़ों सालों के दौरान चर्च के धर्म-गुरुओं का बहुत दबदबा था। यहाँ तक कि राजनैतिक नेताओं पर भी उनकी काफी धाक थी और वे लोगों को अपनी मुट्ठी में बंद रखना चाहते थे। जैसे, उस समय लोगों को अपने पास बाइबल रखने या अपनी भाषा में इसे पढ़ने की इजाज़त नहीं थी। कुछ लोग जो बाइबल पढ़ते थे उन्हें काठ पर लटकाकर जला दिया गया। जो कोई चर्च के धर्म-गुरुओं की शिक्षा के खिलाफ बोलता था, उसके साथ बहुत बुरा सलूक किया जाता था। सच्चाई सीखना या सिखाना करीब-करीब नामुमकिन था।

हमें यहेजकेल के दर्शन से यह भी पता चलता है कि परमेश्वर के लोगों में धीरे-धीरे जान आयी और उन्हें झूठे धर्मों से छुटकारा मिला। यह सब कब होना शुरू हुआ और कैसे? दर्शन में “खड़खड़ाहट” की आवाज़ का ज़िक्र किया गया था। यह अंत के समय से कुछ सदियों पहले शुरू हुआ। उस दौरान कुछ ऐसे वफादार लोग थे जो सच्चाई की तलाश में थे और परमेश्वर की सेवा करना चाहते थे, जबकि चारों तरफ झूठी शिक्षाओं का बोलबाला था। उन्होंने बाइबल का अध्ययन किया और जो सीख रहे थे उस बारे में दूसरे लोगों को बताने की हर मुमकिन कोशिश की। कुछ लोगों ने बाइबल का अनुवाद करने में कड़ी मेहनत की, वह भी ऐसी भाषाओं में जो लोग समझ सकते थे।

फिर 1870 के आस-पास चार्ल्स टेज़ रसल और उनके दोस्त  बाइबल की सच्चाई समझने और यहोवा की सेवा करने में जी-जान से लग गए। यह ऐसा था मानो हड्डियों पर मांस और त्वचा आने लगी। उन्होंने ज़ायन्स वॉच टावर और दूसरी किताबों-पत्रिकाओं के ज़रिए सच्चाई समझने में दूसरों की भी मदद की। फिर 1914 में “फोटो-ड्रामा ऑफ क्रिएशन” फिल्म और 1917 में द फिनिश्ड मिस्ट्री किताब निकाली गयी। इनसे यहोवा के लोगों को अपना विश्वास मज़बूत करने में मदद मिली। आखिरकार 1919 में मानो यहोवा के लोगों में जान आ गयी और उन्हें एक नया देश दिया गया। तब से वे लोग जिन्हें धरती पर हमेशा जीने की आशा है, अभिषिक्‍त मसीहियों का साथ दे रहे हैं । ये सभी यहोवा की उपासना करते हैं और सब मिलकर “एक बहुत बड़ी सेना” बन गए हैं।—यहे. 37:10; जक. 8:20-23. *

इसलिए यह साफ पता चलता है कि परमेश्वर के लोग ईसवी सन्‌ 100 के बाद महानगरी बैबिलोन की कैद में चले गए। यही वह दौर था जब बहुत-से लोगों ने झूठी धार्मिक शिक्षाएँ अपना लीं और सच्चाई को ठुकरा दिया। इस तरह उन्होंने सच्चे मसीही धर्म के खिलाफ बगावत की। काफी सालों तक यहोवा की उपासना करना बहुत मुश्किल रहा, जैसे इसराएलियों के लिए उस समय ऐसा करना मुश्किल था जब वे कैद में थे। लेकिन आज हर किसी को सच्चाई सिखायी जा रही है। यह कितनी खुशी की बात है कि हम उस समय में जी रहे हैं जब “सिखानेवालों” या समझ-बूझ रखनेवालों की “चमक आकाशमण्डल की सी होगी।” आज बहुत-से लोग खुद को “निर्मल” या शुद्ध कर सकते हैं, “स्वच्छ” हो सकते हैं और सच्ची उपासना कर सकते हैं।—दानि. 12:3, 10.

जब शैतान ने यीशु की परीक्षा लेने की कोशिश की, तो क्या वह सच में यीशु को मंदिर ले गया था या उसने दर्शन में यीशु को मंदिर दिखाया था?

हम पक्के तौर पर नहीं जानते कि शैतान ने किस तरह यीशु को मंदिर दिखाया था।

इस घटना के बारे में बाइबल के लेखक मत्ती और लूका दोनों ने लिखा था। मत्ती ने कहा कि “शैतान उसे [यीशु को] अपने साथ पवित्र शहर यरूशलेम ले गया और उसे मंदिर की चारदीवारी के ऊपर लाकर खड़ा किया,” जो मंदिर की सबसे ऊँची जगह थी। (मत्ती 4:5) इसी घटना के बारे में लूका ने कहा कि “शैतान, यीशु को यरूशलेम ले गया और मंदिर की चारदीवारी पर लाकर खड़ा किया।”लूका 4:9.

पहले हमारी किताबों-पत्रिकाओं में बताया जाता था कि जब शैतान ने यीशु की परीक्षा लेने की कोशिश की तो शायद वह सच में उसे मंदिर नहीं ले गया था। जैसे, 1 मार्च, 1961 की प्रहरीदुर्ग (अँग्रेज़ी) में इस परीक्षा की तुलना उस परीक्षा से की गयी थी जब शैतान ने यीशु को एक ऊँचे पहाड़ पर से दुनिया के सारे राज्य दिखाकर उसकी परीक्षा लेने की कोशिश की थी। उसमें बताया गया था कि ऐसा कोई पहाड़ नहीं है जो इतना ऊँचा हो कि वहाँ से दुनिया के सारे राज्य दिख जाएँ। प्रहरीदुर्ग में यह भी बताया गया था कि उसी तरह, शैतान शायद सच में यीशु को किसी मंदिर में नहीं ले गया था। लेकिन उसके बाद आए प्रहरीदुर्ग के लेखों में यह भी बताया गया कि अगर यीशु मंदिर से कूद जाता तो उसकी जान जा सकती थी।

कुछ लोग कहते हैं कि लेवी न होने की वजह से यीशु को  मंदिर के पवित्रस्थान पर खड़े होने की इजाज़त नहीं थी। इसलिए वे कहते हैं कि शैतान ने ज़रूर दर्शन में यीशु की परीक्षा लेने की कोशिश की होगी। इससे सैकड़ों साल पहले, यहेजकेल को भी दर्शन में मंदिर दिखाया गया था।—यहे. 8:3, 7-10; 11:1, 24; 37:1, 2.

लेकिन अगर यीशु को दर्शन में मंदिर दिखाया गया था तो कुछ लोग शायद सोचें:

  • क्या सच में यीशु मंदिर से कूदने के लिए लुभाया गया था?

  • दूसरी परीक्षाओं के दौरान शैतान ने यीशु से कहा कि वह असली पत्थरों को असली रोटी में बदल दे और वह चाहता था कि वह सच में उसकी उपासना करे। तो क्या यह मुमकिन नहीं कि शैतान ने यीशु को सचमुच के मंदिर से कूदने के लिए कहा हो?

लेकिन अगर यीशु सच में मंदिर की चारदीवारी पर खड़ा था, तो शायद कुछ लोगों के मन में ये सवाल आएँ:

  • क्या यीशु ने मंदिर के पवित्रस्थान पर खड़े होकर कानून तोड़ा?

  • यीशु वीराने से यरूशलेम के मंदिर तक कैसे गया?

आइए हम कुछ और जानकारी पर गौर करें जिससे हमें आखिर के दो सवालों के जवाब जानने में मदद मिलेगी।

प्रोफेसर डी.ए. कैरसन ने लिखा कि मत्ती और लूका की किताब में “मंदिर” के लिए जो यूनानी शब्द इस्तेमाल हुआ, वह शायद मंदिर की पूरी जगह को दर्शाता था, न कि सिर्फ मंदिर के पवित्रस्थान को जहाँ सिर्फ लेवी जा सकते थे।मंदिर के दक्षिण-पूर्वी कोने में एक सपाट छत थी। वहाँ से लेकर किद्रोन घाटी का निचला हिस्सा करीब 450 फिट था। मंदिर में यह जगह ज़मीन से सबसे ऊँची थी। शायद इसी जगह यीशु खड़ा था। इतिहासकार जोसीफस ने कहा कि यह जगह इतनी ऊँची थी कि अगर एक इंसान वहाँ खड़ा होकर नीचे देखे तो उसे “चक्कर आने लगेंगे।” भले ही यीशु लेवी नहीं था, फिर भी वह वहाँ खड़ा हो सकता था और उसके ऐसा करने पर किसी को एतराज़ नहीं होता।

लेकिन यीशु वीराने से यरूशलेम के मंदिर कैसे पहुँचा? हम पक्के तौर पर नहीं जानते। बाइबल बस इतना बताती है कि यीशु को यरूशलेम ले जाया गया। बाइबल यह नहीं बताती कि यीशु यरूशलेम से कितनी दूर था या शैतान ने कितने लंबे समय तक उसकी परीक्षा ली। इसलिए हो सकता है कि यीशु यरूशलेम चलकर गया हो, भले ही इसमें काफी लंबा समय लगा हो।

लेकिन जब शैतान ने यीशु को “दुनिया के तमाम राज्य” दिखाए तो क्या उसने दर्शन में ऐसा किया था? हाँ हो सकता है, क्योंकि धरती पर ऐसा कोई पहाड़ नहीं जहाँ से दुनिया के सभी राज्य दिखायी दे सकें। यह कुछ वैसा ही हो सकता है जैसे हम किसी को परदे पर दुनिया के दूसरे हिस्सों की तसवीरें दिखा सकते हैं। शैतान ने भले ही यीशु को दर्शन दिखाया हो, लेकिन वह इतना ज़रूर चाहता था कि यीशु सच में उसके सामने गिरकर उसकी उपासना करे। (मत्ती 4:8, 9) तो यह कहा जा सकता है कि जब शैतान यीशु को मंदिर पर ले गया, तो वह चाहता था कि यीशु सच में वहाँ से कूद जाए, यानी अपनी जान जोखिम में डाले। लेकिन यीशु ने ऐसा नहीं किया। अगर यीशु को सिर्फ दर्शन में मंदिर से कूदना होता, तो यह उसके लिए एक बड़ी परीक्षा कैसे हो सकती थी?

तो यह कहा जा सकता है कि यीशु सच में यरूशलेम गया था और मंदिर की सबसे ऊँची जगह पर खड़ा हुआ था। और जैसे शुरूआत में कहा गया था, हम यह पक्के तौर पर नहीं जानते कि शैतान ने किस तरह यीशु को मंदिर दिखाया था। लेकिन यह हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि शैतान ने बार-बार यीशु से कुछ गलत काम करवाने की कोशिश की और यीशु ने उसे हर बार करारा जवाब दिया।

^ पैरा. 2 15 जुलाई, 2013 की प्रहरीदुर्ग के पेज 10-12 पर पैराग्राफ 5-8, 12 देखिए।

^ पैरा. 5 यहेजकेल 37:1-14 और प्रकाशितवाक्य 11:7-12 में ऐसी बात बतायी गयी है जो 1919 में हुई। यहेजकेल 37:1-14 की भविष्यवाणी यह दर्शाती है कि परमेश्वर के सभी लोग लंबे समय तक कैद में रहने के बाद 1919 में सच्ची उपासना के लिए वापस आए। लेकिन प्रकाशितवाक्य 11:7-12 यह दर्शाता है कि 1919 में उन अभिषिक्‍त भाइयों के एक छोटे-से समूह को नियुक्‍त किया गया, जो परमेश्वर के लोगों की अगुवाई कर रहे थे।