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यहोवा के साक्षी

हिंदी

2017 यहोवा के साक्षियों की सालाना किताब

सन्‌ 1989 में सोखूमी के पास समुंदर किनारे सभा हो रही है

 जॉर्जिया | 1924-1990

शुरूआती दिनों में सच्चाई की खोज करनेवाले

शुरूआती दिनों में सच्चाई की खोज करनेवाले

 सन्‌ 1920 के बाद के सालों से ही बाइबल विद्यार्थी जॉर्जिया में ऐसे लोगों तक राज का संदेश पहुँचाने के लिए मेहनत करने लगे जो सच्चाई की खोज कर रहे थे। सन्‌ 1924 में लेबनान देश के बेरूत शहर में एक दफ्तर खोला गया ताकि वहाँ से कई इलाकों में हो रहे प्रचार काम की निगरानी की जाए, जैसे आर्मीनिया, जॉर्जिया, तुर्की और सीरिया में।

हो सकता है उन दिनों जॉर्जिया में सच्चाई के बीज बोए गए हों, मगर उनसे फौरन नतीजे नहीं दिखायी दे रहे थे। (मत्ती 13:33) लेकिन समय के गुज़रते राज का संदेश फैल गया, जिस वजह से कई लोगों ने अपनी ज़िंदगी में बड़े-बड़े बदलाव किए।

वह इंसाफ के लिए तरसता था

जब दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया तब वासो क्वेनीयाश्वीली एक किशोर था। उस समय जॉर्जिया, सोवियत संघ का हिस्सा था, इसलिए वासो के पिता को  जल्द ही सोवियत की सेना में भरती किया गया। तब तक वासो की माँ की मौत हो चुकी थी। वासो के दो छोटे भाई और एक छोटी बहन थी, इसलिए घर के गुज़ारे के लिए वह चोरी करने लगा।

वासो एक गिरोह में शामिल हो गया और देखते-ही-देखते जुर्म की दुनिया में मशहूर हो गया। उसने बताया, “मैं सोचता था कि बाहर की दुनिया के मुकाबले जुर्म की दुनिया में ज़्यादा इंसाफ होता है।” मगर जल्द ही वासो को एहसास हुआ कि वह जिस इंसाफ की तलाश कर रहा है वह उसे कोई भी इंसानी संगठन नहीं दिला सकता। उसने कहा, “मैं इंसाफ के लिए तरसता था।”

जेल से रिहा होने के कुछ ही समय बाद, 1964 में वासो क्वेनीयाश्वीली

बाद में वासो पकड़ा गया और उसे सज़ा दी गयी। उसे साइबेरिया के मज़दूरों के शिविर भेज दिया गया। वहाँ उसकी मुलाकात यहोवा के एक साक्षी से हुई जिसे अपने विश्वास की वजह से कैद किया गया था। वासो ने बताया,  “अब जाकर वह चीज़ मिल गयी जिसकी मुझे तलाश थी। हमारे पास पढ़ने के लिए कुछ नहीं था, फिर भी वह भाई मुझे जो बताता था उसे सीखने की मैंने पूरी-पूरी कोशिश की।”

सन्‌ 1964 में जब वासो रिहा हुआ तो वह जॉर्जिया लौट गया और यहोवा के साक्षियों को ढूँढ़ने लगा। इस बीच उसने खत के ज़रिए उस साक्षी से संपर्क बनाए रखा जो उसके साथ कैद था। दुख की बात है कि वासो के उस वफादार दोस्त की मौत हो गयी और इससे परमेश्वर के लोगों से वासो का संपर्क पूरी तरह टूट गया। उसे साक्षियों से दोबारा मिलने के लिए करीब 20 साल इंतज़ार करना पड़ा। आगे की कहानी हम बाद में देखेंगे।

मुश्किलें आशीष में बदल गयीं

जंगल में एक सभा हो रही है

जॉर्जिया की एक जवान लड़की, वालेंतीना मीमीनोश्वीली को जब नात्सियों के यातना शिविर में कैद किया गया तो उसे एक बड़ी आशीष मिली। वहाँ वह पहली बार यहोवा के साक्षियों से मिली। साक्षियों के बारे में जो बात उसे  सबसे ज़्यादा अच्छी लगी वह थी उनका अटूट विश्वास। उन्होंने उसे बाइबल से जो कुछ सिखाया वह उसके दिल को छू गया।

वालेंतीना युद्ध के बाद जब घर लौटी तो वह बाइबल से सीखी बातें दूसरों को बताने लगी। मगर जल्द ही वहाँ के अधिकारियों का ध्यान उस पर गया। उन्होंने उसे 10 साल के लिए मज़दूरों के शिविर में काम करने के लिए रूस भेज दिया। वहाँ फिर उसकी मुलाकात यहोवा के साक्षियों से हुई और बाद में उसने बपतिस्मा लिया।

सन्‌ 1967 में जब वालेंतीना रिहा हुई तो वह पश्‍चिमी जॉर्जिया चली गयी। वहाँ वह सूझ-बूझ से काम लेकर प्रचार करती रही। उसे नहीं पता था कि वह जल्द ही किसी की प्रार्थना का जवाब बनेगी।

यहोवा ने उसकी प्रार्थनाओं का जवाब दिया

सन्‌ 1962 में बहन आनतोनीना गुदाद्‌ज़े साइबेरिया से जॉर्जिया आकर बस गयी क्योंकि उसके पति ने, जो सच्चाई में नहीं था, अपने देश लौटने का फैसला किया। आनतोनीना साइबेरिया की रहनेवाली थी और उसे सच्चाई उन साक्षियों से मिली जिन्हें देश-निकाला देकर वहाँ भेज दिया गया था। अब जब वह पूर्वी जॉर्जिया के शहर खाशुरी में रहने लगी तो उसे ऐसा लगा कि मसीही भाई-बहनों से उसका नाता टूट गया है।

सन्‌ 1960 के बाद के सालों में गुदाद्‌ज़े परिवार

आनतोनीना बताती है कि उस समय यहोवा ने कैसे उसकी प्रार्थनाओं का जवाब दिया। वह कहती है, “एक दिन मुझे एक पैकेट मिला जो मेरी माँ ने साइबेरिया से भेजा था। उसमें बाइबल की कुछ किताबें बड़े ध्यान से छिपाकर रखी गयी थीं। इस तरह छ: साल तक मुझे किताबें मिलती रहीं। जब भी मुझे ये किताबें मिलतीं मैं यहोवा का धन्यवाद करती थी कि वह मेरा मार्गदर्शन करता है, मुझे हिम्मत देता है और मेरी देखभाल करता है।”

फिर भी आनतोनीना अकेला महसूस कर रही थी। वह कहती है, “मैं यहोवा से बिनती करती रही कि वह मुझे मेरे भाई-बहनों से दोबारा मिला दे।  एक दिन दो औरतें उस दुकान में आयीं जहाँ मैं काम करती थी। उन्होंने मुझसे पूछा, ‘क्या आप आनतोनीना हैं?’ उनके चेहरे पर जो प्यार झलक रहा था उससे मैं समझ गयी कि वे मेरी मसीही बहनें हैं। हमने एक-दूसरे को गले लगाया और हम खुशी से रोने लगीं।”

उन दो बहनों में से एक थी वालेंतीना मीमीनोश्वीली। आनतोनीना को जब पता चला कि पश्‍चिमी जॉर्जिया में ही सभाएँ हो रही हैं तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा! हालाँकि सभाओं में जाने के लिए उसे 300 से ज़्यादा किलोमीटर सफर करना पड़ता था, फिर भी वह महीने में एक बार वहाँ ज़रूर जाती थी।

पश्‍चिमी जॉर्जिया में सच्चाई ने जड़ पकड़ी

सन्‌ 1961 से 1969 के दौरान, सोवियत संघ की दूसरी जगहों में साक्षियों ने अधिकारियों के हाथों कई ज़ुल्म सहे। इसलिए कुछ साक्षी ऐसी जगहों में जाकर बस गए जहाँ हालात अच्छे थे। उनमें से एक था व्लादिमीर ग्लादियुक। वह एक जोशीला भाई था। सन्‌ 1969 में वह यूक्रेन से पश्‍चिमी जॉर्जिया के शहर ज़ुगदीदी में जाकर बस गया।

लीउबा और व्लादिमीर ग्लादियुक

जो साक्षी जॉर्जिया आए थे वे शुरू में रूसी भाषा में सभाएँ चलाते थे। मगर  जब जॉर्जियाई भाषा बोलनेवाले ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग सभाओं में आने लगे तो उस भाषा में सभाएँ रखने का इंतज़ाम किया गया। चेले बनाने के काम में इतने अच्छे नतीजे मिले कि अगस्त 1970 में वहाँ के 12 लोगों ने बपतिस्मा लिया।

सन्‌ 1972 के वसंत में व्लादिमीर और उसका परिवार पश्‍चिम में और भी दूर के एक शहर सोखूमी में जा बसा जो काले सागर के पास था। व्लादिमीर कहता है, “यहोवा ने हमें ढेर सारी आशीषें दी थीं, इसलिए हम उसके बहुत एहसानमंद थे। वहाँ की मंडली ने बहुत तेज़ी से तरक्की की।” उस साल के वसंत में जब सोखूमी में पहली बार स्मारक मनाया गया तो 45 लोग हाज़िर हुए।

“मैं ध्यान से और बड़े उत्साह से सुन रही थी”

बहन बाबुत्सा जेजेलावा उन लोगों में से एक थी जिन्होंने 1973 की शुरूआत में सोखूमी में बहुत जल्द सच्चाई स्वीकार की थी। आज बहन की उम्र  90 से ऊपर है। वह उन दिनों को याद करते हुए कहती है, “एक दिन मैंने देखा कि चार औरतें बड़े जोश से बात कर रही हैं। दो नन थीं और बाकी दो के बारे में बाद में मुझे पता चला कि वे यहोवा की साक्षी हैं।” एक बहन लीउबा थी जो व्लादिमीर ग्लादियुक की पत्नी थी। दूसरी बहन यूक्रेन से आयी ईता सुदारेंको थी जो एक जोशीली पायनियर थी।

सन्‌ 1979 में और 2016 में बाबुत्सा जेजेलावा

बाबुत्सा उस बातचीत को याद करते हुए कहती है, “मैं ध्यान से और बड़े उत्साह से सुन रही थी।” जब उसने सुना कि परमेश्वर का एक नाम है तो वह फौरन उस बातचीत में शामिल हो गयी। उसने उनसे पूछा कि क्या वे उसे बाइबल में वह नाम दिखा सकती हैं। बाबुत्सा ने इतने सारे सवाल पूछे कि वह चर्चा तीन घंटे तक चली।

बाबुत्सा को डर था कि वह शायद साक्षियों से दोबारा नहीं मिल पाएगी। इसलिए उसने उनसे पूछा, “क्या आप मुझसे दोबारा नहीं मिलेंगे?”

बहनों ने कहा, “हम ज़रूर मिलेंगे। अगले शनिवार हम दोबारा आएँगे।”

अगले शनिवार जब दोनों बहनें बाबुत्सा से मिलने आयीं तो वह खुशी से फूली नहीं समायी! फौरन एक बाइबल अध्ययन शुरू किया गया। अध्ययन के आखिर में बाबुत्सा एक बार फिर पक्का करना चाहती थी कि वह परमेश्वर के लोगों से आगे भी मिलती रहेगी। उसने मन-ही-मन कहा, ‘मैंने इन लोगों को पा तो लिया है, मगर अब मुझे पक्का करना है कि इन्हें खो न दूँ।’

बाबुत्सा को एक तरकीब सूझी। वह बताती है, “मैं जानती थी कि लीउबा शादीशुदा है, मगर मुझे यह नहीं पता था कि ईता शादीशुदा है या नहीं। जब मैंने उससे पूछा तो उसने कहा कि वह शादीशुदा नहीं है। मैंने फौरन उससे कहा, ‘तो क्यों न आप मेरे घर आकर रहें! मेरे यहाँ दो बिस्तर हैं और बीच में एक दीया है। हम बाइबल को दीए के नीचे रखेंगे, फिर हम रात को भी बाइबल के बारे में बात कर सकते हैं!’” ईता ने ‘हाँ’ कहा और बाबुत्सा के घर जाकर रहने लगी।

 बाबुत्सा कहती है, “कभी-कभी मैं रात को नहीं सोती थी बल्कि जो मैंने सीखा था उस बारे में सोचती रहती थी। फिर अचानक मेरे दिमाग में सवाल उठता और मैं ईता को जगाकर कहती, ‘ईता अपनी बाइबल निकालो, मुझे एक सवाल पूछना है!’ ईता आँखें मलती हुई कहती थी, ‘ठीक है, मेरी बहना।’ फिर ईता बाइबल खोलकर मुझे जवाब दिखाती थी।” ईता जब बाबुत्सा के घर रहने लगी तो उसके बस तीन दिन बाद बाबुत्सा प्रचार में जाने लगी!

बाबुत्सा की एक बहुत अच्छी दोस्त थी, नातेला चारगेइश्वीली। बाबुत्सा कहती है, “मुझे लगा कि वह अपनी दौलत की वजह से सच्चाई स्वीकार नहीं करेगी, मगर खुशी की बात है कि मैं गलत थी। जब मैंने उसे पहली बार सच्चाई के बारे में बताया तभी सच्चाई उसे भा गयी और उसने उसे स्वीकार कर लिया।” कुछ ही समय बाद वे दोनों जोश के साथ अपने दोस्तों, साथ काम करनेवालों और पड़ोसियों को अपनी आशा के बारे में बताने लगीं।