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यहोवा के साक्षी

हिंदी

उनके विश्वास की मिसाल पर चलिए

 अध्याय पाँच

“एक नेक औरत”

“एक नेक औरत”

1, 2. (क) रूत क्या काम कर रही थी? (ख) रूत ने परमेश्वर के कानून और उसके लोगों के बारे में क्या जाना?

रूत जौ की बालों के ढेर के पास घुटने टेकी अपने काम में लगी रही। अब तक शाम ढलने को आयी थी। खेतों में मज़दूर अपना काम खत्म करके पहाड़ की चोटी पर बसे बेतलेहेम के फाटक की तरफ धीरे-धीरे चल रहे थे। मगर रूत एक छोटी-सी लाठी से बालें पीटती रही ताकि उनसे अनाज अलग कर सके। उसके हाथ-पैर ज़रूर दुख रहे होंगे क्योंकि उसने सुबह से कड़ी मेहनत की थी, एक पल के लिए भी आराम नहीं किया। भले ही उसे बहुत मशक्कत करनी पड़ी, फिर भी उसका पहला दिन अच्छा गुज़रा। उसने शायद उम्मीद नहीं की थी कि उसका दिन अच्छा बीतेगा।

2 क्या आखिरकार इस जवान विधवा के हालात सुधरने लगे थे? जैसे हमने पिछले अध्याय में देखा, उसने अपनी सास के साथ ही रहने का फैसला किया था। उसने नाओमी से वादा किया था कि वह उसका साथ कभी नहीं छोड़ेगी और उसके परमेश्वर यहोवा को अपना परमेश्वर मानेगी। ये दोनों दुखियारी औरतें मोआब छोड़कर बेतलेहेम चली आयी थीं। कुछ ही समय बाद मोआबी रूत को पता चला कि यहोवा के कानून में गरीब इसराएलियों और परदेसियों के लिए ऐसा इंतज़ाम किया गया है कि वे इज़्ज़त से अपना गुज़ारा कर सकें। और अब उसकी मुलाकात यहोवा के कुछ ऐसे लोगों से हुई जो कानून को मानते थे और इस वजह से वे उसके साथ कृपा से पेश आए। इससे उसके दुखी मन को काफी राहत मिली।

3, 4. (क) बोअज़ ने कैसे रूत की हिम्मत बँधायी थी? (ख) आज आर्थिक मंदी के इस दौर में हम रूत की मिसाल से क्या सीख सकते हैं?

3 उनमें से एक था बोअज़ जिसके खेतों से वह बालें बीन रही थी। बोअज़ एक बुज़ुर्ग था और उसने रूत में एक पिता जैसी दिलचस्पी दिखायी। उसने इस बात के लिए रूत की तारीफ की कि वह नाओमी की देखभाल करती है और उसने सच्चे परमेश्वर यहोवा के पंखों तले पनाह लेने का फैसला किया है। बोअज़ की यह बात मन-ही-मन याद करके रूत मुस्कुरा रही थी।—रूत 2:11-14 पढ़िए।

4 फिर भी रूत ने जब अपने भविष्य के बारे में सोचा तो उसके मन में कई सवाल उठे होंगे। एक तो वह गरीब परदेसी है और दूसरी बात, उसका न तो कोई पति है न कोई औलाद, इसलिए वह आगे चलकर खुद की और नाओमी की देखभाल कैसे करेगी?  क्या बालें बीनने से उनका गुज़ारा हो जाएगा? जब वह खुद बूढ़ी हो जाएगी तो कौन उसकी देखभाल करेगा? इस तरह चिंता करना लाज़िमी था। आज आर्थिक मंदी के इस दौर में हममें से कइयों को इसी तरह की चिंताएँ सताती हैं। इसलिए अब जब हम देखेंगे कि रूत अपने विश्वास की वजह से कैसे उन चुनौतियों का सामना कर पायी, तो हम उससे बहुत कुछ सीख सकेंगे।

परिवार किसे कहते हैं?

5, 6. (क) बोअज़ के खेत में रूत का पहला दिन कैसा रहा? (ख) जब नाओमी ने रूत को देखा तो उसने क्या किया?

5 जब रूत ने बालें पीटकर सारा अनाज निकाल लिया तो उसने देखा कि उसके पास एपा-भर जौ है। आज के हिसाब से एपा-भर जौ का वज़न करीब 14 किलो होगा! उसने अनाज को एक बड़े-से कपड़े में बाँध लिया और उसे सिर पर रखकर बेतलेहेम में अपने घर की तरफ चल पड़ी, क्योंकि अँधेरा होने लगा था।—रूत 2:17.

6 जब नाओमी ने अपनी प्यारी बहू को आते देखा तो वह खुश हुई। रूत के सिर पर इतना भारी बोझ देखकर उसे हैरानी भी हुई होगी। और बोअज़ ने मज़दूरों को जो खाना दिया था उसमें से बचा हुआ खाना भी रूत घर ले आयी। इसलिए रूत और नाओमी ने साथ मिलकर एक सादा-सा खाना खाया। नाओमी ने पूछा, “तू किसके खेत में बीनने गयी थी? जिसने भी तुझ पर दया की, उसका भला हो।” (रूत 2:19) नाओमी रूत के सिर पर अनाज का ढेर देखकर समझ गयी कि किसी ने रूत की हालत पर ध्यान दिया और उस पर कृपा की है।

7, 8. (क) नाओमी ने बोअज़ की कृपा के बारे में क्या समझा और क्यों? (ख) रूत ने कैसे दिखाया कि उसकी सास के लिए उसका प्यार अटल है?

7 फिर दोनों बातों में लग गयीं। रूत ने नाओमी को बताया कि बोअज़ ने उस पर कितनी कृपा की। यह बात नाओमी के दिल को छू गयी। उसने कहा, “यहोवा उसे आशीष दे। सचमुच, परमेश्वर जीवितों और मरे हुओं के लिए अपने अटल प्यार का सबूत देना कभी नहीं छोड़ता।” (रूत 2:20) नाओमी समझ गयी कि बोअज़ ने जो कृपा की उसके पीछे यहोवा का हाथ है, क्योंकि वही अपने सेवकों को दरियादिल होने के लिए उभारता है। यहोवा अपने लोगों से वादा भी करता है कि अगर वे दूसरों पर कृपा करेंगे तो वह उन्हें आशीष देगा। *नीतिवचन 19:17 पढ़िए।

8 नाओमी ने रूत से कहा कि वह बोअज़ की बात मानकर उसके खेतों में ही बीना करे और उसके घराने की जवान औरतों के साथ ही रहे ताकि खेत के मज़दूर उसे परेशान न करें। रूत ने यह सलाह मानी। इसके अलावा, उसने “अपनी सास नाओमी का साथ नहीं छोड़ा।” (रूत 2:22, 23) इन शब्दों से हम एक बार फिर रूत का अटल  प्यार देख सकते हैं जिसके लिए वह जानी जाती थी। रूत की मिसाल हमें खुद को जाँचने के लिए उभारती है कि क्या हम परिवार के बंधन को अहमियत देते हैं, हमेशा अपने अज़ीज़ों का साथ देते हैं और ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद करते हैं। यहोवा इस तरह के अटल प्यार पर हमेशा गौर करता है।

रूत और नाओमी से हम यह सीखते हैं कि हमें अपने परिवार की कदर करनी चाहिए, फिर चाहे वह छोटा क्यों न हो

9. रूत और नाओमी से हम परिवार के बारे में क्या सीख सकते हैं?

9 रूत और नाओमी सिर्फ दो लोग थे, तो क्या उन्हें परिवार नहीं कहा जा सकता? कुछ लोगों का मानना है कि परिवार उसे कहते हैं जिसमें पति-पत्नी, बेटा-बेटी, दादा-दादी वगैरह हों। मगर रूत और नाओमी की कहानी हमें सिखाती है कि यहोवा के सेवकों का परिवार चाहे कितना ही छोटा हो, अगर उसके सदस्य एक-दूसरे से प्यार करें, अपनापन दिखाएँ और कृपा से पेश आएँ तो सही मायनों में उसे परिवार कहा जा सकता है। क्या आप अपने परिवार की कदर करते हैं? यीशु ने अपने चेलों को याद दिलाया कि जिन लोगों का परिवार नहीं है, मसीही मंडली उनके लिए परिवार जैसी होगी।—मर. 10:29, 30.

रूत और नाओमी ने एक-दूसरे की मदद की और हौसला बढ़ाया

‘वह हमारे छुड़ानेवालों में से एक है’

10. नाओमी रूत के लिए क्या करना चाहती थी?

10 अप्रैल में होनेवाली जौ की कटाई से लेकर जून में होनेवाली गेहूँ की कटाई तक, रूत बोअज़ के खेतों में बालें बीनती रही। उस दौरान नाओमी ज़रूर सोचने लगी होगी कि वह अपनी प्यारी बहू के लिए क्या कर सकती है। मोआब में तो उसने रूत की दोबारा शादी कराने की उम्मीद ही खो दी थी। (रूत 1:11-13) मगर अब यहाँ इसराएल में वह रूत का घर बसाने की सोचने लगी। उसने रूत से कहा, “बेटी, क्या यह मेरा फर्ज़ नहीं कि मैं तेरे लिए एक ऐसा घर ढूँढ़ूँ जहाँ तू सुकून पा सके?” (रूत 3:1) उस ज़माने में यह रिवाज़ था कि माता-पिता ही अपने बच्चों के लिए रिश्ता ढूँढ़ते थे और रूत, नाओमी के लिए बेटी से कम नहीं थी। नाओमी रूत का घर बसाना चाहती थी, उसके लिए एक पति ढूँढ़ना चाहती थी ताकि उसका अपना घर-परिवार हो जहाँ वह सुकून से जी सके और सलामत रहे। मगर नाओमी यह कैसे कर सकती थी?

11, 12. (क) जब नाओमी ने कहा कि बोअज़ उनका ‘छुड़ानेवाला’ है, तो वह कानून के किस इंतज़ाम के बारे में बता रही थी? (ख) रूत ने अपनी सास की सलाह सुनकर क्या कहा?

11 जब रूत ने पहली बार बोअज़ का ज़िक्र किया तो नाओमी ने कहा था, “वह आदमी हमारा रिश्तेदार है और हमारे छुड़ानेवालों में से एक है।” (रूत 2:20) इसका क्या मतलब था? परमेश्वर के कानून में ऐसे परिवारों के लिए एक प्यार-भरा इंतज़ाम किया गया था जो गरीबी या परिवार में किसी की मौत होने की वजह से तंगी झेलते थे। अगर एक औरत के बच्चा होने से पहले उसका पति मर जाए तो उसे सबसे बड़ा दुख  इस बात से होता कि उसके पति का नाम मिट जाएगा क्योंकि उसका वंश चलानेवाला कोई नहीं है। लेकिन कानून के मुताबिक, उसके पति का भाई उससे शादी कर सकता था ताकि वह वारिस पैदा कर सके जो उसके मरे हुए पति का वंश आगे बढ़ाए और परिवार की जायदाद की देखभाल करे। *व्यव. 25:5-7.

12 नाओमी ने रूत को एक तरकीब बतायी। हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जब नाओमी उसे बताने लगी तो रूत कैसे हैरत-भरी नज़रों से उसे देखने लगी होगी। इसराएल का कानून रूत के लिए बिलकुल नया था और वहाँ के कई रिवाज़ों से वह वाकिफ नहीं थी। फिर भी उसने नाओमी की हर बात ध्यान से सुनी क्योंकि वह उसकी बहुत इज़्ज़त करती थी। नाओमी की सलाह रूत को अजीब लगी होगी और उसे मानने की बात सोचकर उसे थोड़ी शर्म भी आयी होगी। उसने सोचा होगा कि अगर यह बात सबको पता चल जाएगी तो वह बदनाम हो सकती है। फिर भी उसने नाओमी की सलाह मानने का फैसला किया। उसने नम्रता से कहा, “जो कुछ तूने कहा है, वह सब मैं करूँगी।”—रूत 3:5.

13. बुज़ुर्गों की सलाह मानने के बारे में हम रूत से क्या सीख सकते हैं? (अय्यूब 12:12 भी देखें।)

13 कभी-कभी जवानों को बुज़ुर्गों और तजुरबेकार लोगों की सलाह मानना मुश्किल लगता है। वे शायद सोचें कि बड़े लोग, जवानों की मुश्किलों और चुनौतियों को कहाँ समझेंगे। मगर रूत की नम्रता की मिसाल हमें सिखाती है कि उन बुज़ुर्गों की सलाह मानना बहुत फायदेमंद हो सकता है, जो हमसे प्यार करते हैं और हमारा भला चाहते हैं।  (भजन 71:17, 18 पढ़िए।) अब आइए देखें कि नाओमी ने रूत को क्या सलाह दी और क्या उसे मानने से रूत को सचमुच आशीष मिली।

रूत खलिहान में

14. खलिहान क्या होता था और वहाँ क्या काम होता था?

14 उसी शाम रूत खलिहान की तरफ निकल पड़ी। खलिहान में बहुत-से किसान अपनी बालें ले जाते थे और वहाँ उन्हें दाँवते और फटकते थे। ज़्यादातर खलिहान किसी पहाड़ी पर होते थे क्योंकि शाम के वक्‍त वहाँ तेज़ हवाएँ चलती थीं। मज़दूर बड़े-बड़े काँटों या बेलचों से दाँवे गए अनाज को ऊपर उछालते थे ताकि हवा में भूसा उड़ जाए और अनाज ज़मीन पर गिर जाए।

15, 16. (क) शाम को जब बोअज़ ने अपना काम खत्म किया तो खलिहान में क्या-क्या हो रहा था? (ख) बोअज़ को कैसे पता चला कि उसके पैरों के पास रूत लेटी है?

15 रूत जब खलिहान के पास पहुँची तो ऐसी जगह जाकर खड़ी हो गयी जहाँ किसी की नज़र उस पर न पड़े। उसने देखा कि मज़दूर काम बंद करने के लिए सबकुछ समेट रहे हैं। बोअज़ ने सारा दिन अपने मज़दूरों की निगरानी की थी जो अनाज फटककर उसका एक बड़ा ढेर खड़ा कर रहे थे। अब सारा काम होने के बाद उसने रात को खाना खाया और फिर वह उस ढेर के एक तरफ लेट गया। शायद उस ज़माने में लोग अनाज के पास इसलिए लेटते थे ताकि उसे चोरों और लुटेरों से बचा सकें। जब रूत ने देखा कि बोअज़ सोने की तैयारी कर रहा है तो वह समझ गयी कि अब वह समय आ गया है कि वह नाओमी की बतायी तरकीब के मुताबिक काम करे।

16 रूत दबे पाँव बोअज़ के पास जाने लगी। जैसे-जैसे वह कदम बढ़ाती उसकी धड़कनें तेज़ होतीं। वह साफ देख सकती थी कि बोअज़ गहरी नींद में है। जैसे नाओमी ने बताया था, रूत बोअज़ के पैरों के पास गयी और उन पर से कपड़ा हटाकर वहीं पास  में लेट गयी। फिर वह इंतज़ार करने लगी। उसे ऐसा लगा मानो वक्‍त थम गया हो। काफी इंतज़ार के बाद, करीब आधी रात को बोअज़ हिलने लगा। वह ठंड से ठिठुरने लगा, इसलिए वह उठकर आगे की तरफ झुका, शायद इसलिए कि कपड़े से अपने पैर ढाँप सके। तभी उसे एहसास हुआ कि पैरों के पास कोई है। बाइबल बताती है, “उसने देखा कि एक औरत उसके पैरों के पास लेटी है।”—रूत 3:8.

17. जो लोग रूत के इरादे पर शक करते हैं वे कौन-सी दो बातें भूल जाते हैं?

17 बोअज़ ने पूछा, “तू कौन है?” रूत ने शायद डरते-काँपते हुए कहा, “मैं तेरी दासी रूत हूँ। तू अपनी इस दासी को अपना ओढ़ना ओढ़ा दे क्योंकि तू हमारा छुड़ानेवाला है।” (रूत 3:9) बाइबल की समझ देनेवाले कुछ लोग कहते हैं कि रूत ने जो भी कहा और किया, गलत से इरादे से किया। मगर वे दो अहम बातें भूल जाते हैं। पहली, रूत अपने ज़माने के एक रिवाज़ को मान रही थी जिसे आज समझना मुश्किल है। आज नैतिक उसूल बहुत गिर चुके हैं, इसलिए रूत के कामों को उसी नज़र से देखना गलत होगा। दूसरी, बोअज़ ने रूत से जो कहा उससे पता चलता है कि उसने रूत के काम को गलत नहीं ठहराया बल्कि उसकी तारीफ की।

रूत नेक इरादे से बोअज़ के पास गयी

18. (क) बोअज़ ने रूत से क्या कहा जिससे उसका डर दूर हुआ? (ख) बोअज़ के मुताबिक, रूत ने कैसे दो बार अपने अटल प्यार का सबूत दिया?

18 फिर बोअज़ ने रूत से बात की। उसने ज़रूर नरमी से बात की होगी जिससे रूत का डर दूर हुआ होगा। उसने कहा, “यहोवा तुझे आशीष दे मेरी बेटी। तूने पहले भी अपने अटल प्यार का सबूत दिया है, मगर इस बार तूने और भी बढ़कर इसका सबूत दिया है। क्योंकि तू किसी जवान आदमी के पीछे नहीं गयी, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब।” (रूत 3:10) रूत ने नाओमी के लिए अपने अटल प्यार का ‘पहली’ बार सबूत तब दिया था जब वह नाओमी के साथ इसराएल आयी और उसकी सेवा करने लगी। और “इस बार” भी उसने अपने अटल प्यार का सबूत दिया। कैसे? जैसे बोअज़ ने कहा, रूत जवान थी और चाहे तो किसी जवान आदमी से शादी कर सकती थी, फिर चाहे वह अमीर होता या गरीब। मगर उसने नाओमी और उसके पति का भला करना चाहा। वह उस मरे हुए आदमी का वंश आगे बढ़ाना चाहती थी। इसलिए हम समझ सकते हैं कि बोअज़ ने क्यों रूत के निस्वार्थ प्यार के लिए उसकी तारीफ की।

19, 20. (क) बोअज़ ने मौका मिलते ही रूत से शादी क्यों नहीं की? (ख) बोअज़ ने कैसे रूत पर कृपा की और उसके अच्छे नाम का खयाल रखा?

19 इसके बाद बोअज़ ने कहा, “घबरा मत मेरी बेटी। तूने मुझसे जो भी कहा है, वह सब मैं करूँगा क्योंकि शहर में हर कोई जानता है कि तू एक नेक औरत है।” (रूत 3:11) रूत से शादी करने के बारे में सोचकर बोअज़ खुश हुआ। शायद उसे पहले से थोड़ा-बहुत अंदाज़ा था कि उसे छुड़ानेवाला बनने के लिए कहा जाएगा, इसलिए उसे इतना  ताज्जुब नहीं हुआ। मगर बोअज़ एक नेक आदमी था, इसलिए उसने अपने मन मुताबिक काम नहीं किया। उसने रूत को बताया कि एक और छुड़ानेवाला है, जो नाओमी के पति का और भी करीबी रिश्तेदार है। वह उस आदमी के पास जाएगा और पहले उसे रूत से शादी करने का मौका देगा।

रूत दूसरों के साथ आदर और कृपा से पेश आती थी, इसलिए उसने एक बढ़िया नाम कमाया

20 फिर बोअज़ ने रूत से कहा कि वह अब लेट जाए और सुबह होने से पहले घर चली जाए ताकि कोई उसे देख न ले। वह नहीं चाहता था कि रूत के नाम पर या उसके नाम पर कोई कलंक लगे, क्योंकि अगर किसी ने उन्हें देख लिया तो वह सोचेगा कि उन्होंने कुछ गलत काम किया है। अब तक रूत की चिंता थोड़ी कम हुई होगी क्योंकि बोअज़ ने उसकी गुज़ारिश मान ली थी। इसलिए वह फिर से उसके पैरों के पास लेट गयी। सुबह उजाला होने से पहले ही वह उठ गयी। बोअज़ ने उसकी चादर में खूब सारा जौ डालकर दिया और उसे लेकर वह बेतलेहेम लौट गयी।—रूत 3:13-15 पढ़िए।

21. (क) किस वजह से रूत ने एक “नेक औरत” होने का नाम कमाया? (ख) हम रूत की मिसाल पर कैसे चल सकते हैं?

21 रूत बोअज़ की यह बात याद करके कितनी खुश हुई होगी कि सब लोग उसे एक “नेक औरत” मानते हैं। बेशक उसने यह अच्छा नाम इसलिए कमाया क्योंकि वह यहोवा को जानने और उसकी सेवा करने के लिए तैयार थी। इतना ही नहीं, उसने नाओमी पर बहुत कृपा की और उसके लोगों के तौर-तरीके और रिवाज़ अपनाकर उनका गहरा आदर किया, जबकि ये उसके लिए बिलकुल नए थे। अगर हम रूत जैसा विश्वास ज़ाहिर करें तो हम दूसरों का, उनके तौर-तरीकों और रिवाज़ों का दिल से आदर करेंगे। तब हम भी नेक होने का नाम कमाएँगे।

रूत के लिए ऐसा घर जहाँ उसे सुकून मिला

22, 23. (क) बोअज़ ने रूत को जो अनाज दिया उसका शायद क्या मतलब था? (फुटनोट भी देखें।) (ख) नाओमी ने रूत से क्या कहा?

22 जब रूत घर आयी तो नाओमी ने उससे पूछा, “बेटी, जल्दी बता क्या हुआ?” नाओमी शायद जानना चाहती थी कि रूत की शादी की कोई गुंजाइश है या उसे विधवा की ज़िंदगी ही गुज़ारनी पड़ेगी। रूत ने फौरन अपनी सास को सारा हाल कह सुनाया। उसने उसे जौ का ढेर भी दिखाया जो बोअज़ ने नाओमी के लिए भिजवाया था। *रूत 3:16, 17.

23 फिर नाओमी ने रूत को एक अच्छी सलाह दी। उसने रूत से कहा कि वह उस  दिन खेत में बीनने न जाए बल्कि घर पर ही रहे। उसने रूत को यकीन दिलाया, “वह आदमी तब तक चैन से नहीं बैठेगा, जब तक वह आज यह मामला निपटा नहीं देता।”—रूत 3:18.

24, 25. (क) बोअज़ ने कैसे दिखाया कि वह सीधा-सच्चा है और उसमें कोई स्वार्थ नहीं है? (ख) रूत को क्या-क्या आशीषें मिलीं?

24 नाओमी ने बोअज़ के बारे में जो कहा वह सही निकला। बोअज़ शहर के फाटक पर गया जहाँ मुखियाओं की बैठक होती थी और वह तब तक इंतज़ार करता रहा जब तक कि रूत को छुड़ानेवाला नज़दीकी रिश्तेदार वहाँ से नहीं गुज़रता। जब वह आदमी आया तो बोअज़ ने गवाहों के सामने उसे छुड़ानेवाला बनकर रूत से शादी करने का मौका दिया। मगर उस आदमी ने यह कहकर इनकार कर दिया कि ऐसा करने से उसकी अपनी विरासत बरबाद हो जाएगी। तब बोअज़ ने शहर के फाटक पर मौजूद गवाहों के सामने कहा कि वह छुड़ानेवाला बनकर नाओमी के पति एलीमेलेक की जायदाद खरीदेगा और उसके बेटे महलोन की विधवा रूत से शादी करेगा। बोअज़ ने कहा कि वह ऐसा इसलिए कर रहा है ताकि “उस मरे हुए आदमी की ज़मीन पर उसका नाम बना रहे।” (रूत 4:1-10) बोअज़ वाकई एक सीधा-सच्चा आदमी था और उसमें कोई स्वार्थ नहीं था।

25 बोअज़ ने रूत से शादी कर ली। इसके बाद “यहोवा की आशीष से रूत गर्भवती हुई और उसने एक बेटे को जन्म दिया।” बेतलेहेम की औरतों ने नाओमी को आशीर्वाद दिया और रूत की तारीफ करते हुए कहा कि वह नाओमी के लिए सात बेटों से भी बढ़कर है। बाद में रूत के बेटे के खानदान से ही महान राजा दाविद पैदा हुआ। (रूत 4:11-22) आगे चलकर दाविद के वंश से यीशु मसीह पैदा हुआ।—मत्ती 1:1. *

यहोवा ने रूत को मसीहा की पुरखिन बनने का सम्मान दिया

26. रूत और नाओमी की कहानी से हम क्या सीखते हैं?

26 रूत को कितनी बड़ी आशीष मिली और नाओमी को भी आशीष मिली जिसने रूत के बच्चे को अपने बच्चे की तरह पाला। उन दोनों औरतों की कहानी से हम सीखते हैं कि यहोवा उन सब लोगों पर ध्यान देता है जो अपने परिवार की देखभाल करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं और उसके चुने हुए लोगों के साथ मिलकर वफादारी से उसकी सेवा करते हैं। यहोवा बोअज़, नाओमी और रूत जैसे वफादार लोगों को ज़रूर आशीष देता है।

^ पैरा. 7 जैसे नाओमी ने कहा, यहोवा सिर्फ ज़िंदा लोगों पर ही नहीं बल्कि मरे हुओं पर भी कृपा करता है। नाओमी ने अपने पति और दोनों बेटों को मौत में खोया था। रूत ने भी अपना पति खोया था। वे तीनों आदमी रूत और नाओमी को बहुत अज़ीज़ थे। इसलिए नाओमी और रूत पर कृपा करना, एक तरह से उन आदमियों पर कृपा करने जैसा था क्योंकि अगर वे ज़िंदा होते तो यही चाहते कि रूत और नाओमी की अच्छी देखभाल हो।

^ पैरा. 11 सबूत दिखाते हैं कि एक विधवा से शादी करने का हक सबसे पहले उसके मरे हुए पति के भाइयों में से किसी एक को दिया जाता था। अगर उसका कोई भाई नहीं होता तो यह हक नज़दीकी रिश्तेदारों में से किसी आदमी को दिया जाता था। विरासत के अधिकार के मामले में भी यही बात लागू होती थी।—गिन. 27:5-11.

^ पैरा. 22 बोअज़ ने रूत को छः पैमाने जौ दिया जिसके वज़न की सही-सही जानकारी नहीं है। उसने छः पैमाने देकर शायद इस बात की तरफ इशारा किया कि जैसे छः दिन काम करने के बाद आराम करने के लिए सब्त का दिन आता है, वैसे ही रूत ने विधवा के नाते जो मुश्किल दिन गुज़ारे हैं, वे अब बहुत जल्द खत्म होंगे और उसे वह “सुकून” मिलेगा जो पति और घर-परिवार के होने से मिलता है। या फिर बोअज़ ने रूत को छः पैमाने जौ इसलिए दिया होगा क्योंकि वह उतना ही ढो सकती थी। एक पैमाना शायद एक बेलचे के बराबर था।

^ पैरा. 25 रूत उन पाँच औरतों में से एक है जिनका नाम बाइबल में यीशु की वंशावली में आता है। उन औरतों में से एक राहाब भी है जो बोअज़ की माँ थी। (मत्ती 1:3, 5, 6, 16) वह भी रूत की तरह इसराएली नहीं थी।