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यहोवा के साक्षी

हिंदी

उनके विश्वास की मिसाल पर चलिए

 अध्याय बीस

“मुझे यकीन है”

“मुझे यकीन है”

1. मारथा क्यों दुखी थी और उसके दिल पर क्या बीत रही थी?

मारथा अपने मन की आँखों से वह गुफा अब भी देख सकती थी जिसमें उसके भाई की लाश रखी गयी थी। गुफा का मुँह एक बड़े-से पत्थर से बंद कर दिया गया था। उसे ऐसा लग रहा था मानो वह पत्थर गुफा के मुँह पर नहीं, उसके दिल पर रखा गया हो। उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि उसका प्यारा भाई लाज़र नहीं रहा। लाज़र को मरे चार दिन हो चुके थे। तब से उसके घर में मातम छाया रहा और लोगों का आना-जाना लगा रहा जो उन्हें दिलासा देने आते थे।

2, 3. (क) यीशु को देखते ही मारथा को कैसा लगा होगा? (ख) मारथा ने जो अहम बात कही उससे उसके बारे में क्या पता चलता है?

2 अब मारथा के सामने वह आदमी खड़ा था जो उसके भाई का बहुत करीबी दोस्त था। वह था यीशु। यीशु को देखकर शायद मारथा का दुख और बढ़ गया होगा क्योंकि दुनिया में वही एक इंसान था जो उसके भाई की जान बचा सकता था। फिर भी जब वह बैतनियाह के बाहर यीशु से मिली, जो पहाड़ी के एक तरफ बसा छोटा-सा गाँव था, तो उसे थोड़ा दिलासा मिला। यीशु ने उसके साथ हमदर्दी जतायी और उसे दिलासा दिया। कुछ ही पलों में मारथा को बहुत हौसला मिला। यीशु ने उससे ऐसे सवाल पूछे जिनकी वजह से उसे अपने विश्वास पर और मरे हुओं के ज़िंदा होने की आशा पर ध्यान लगाने में मदद मिली। बातचीत के दौरान मारथा ने एक बहुत ही अहम बात कही, “मुझे यकीन है कि तू परमेश्वर का बेटा मसीह है, जिसे दुनिया में आना था।”—यूह. 11:27.

3 मारथा का विश्वास वाकई काबिले-तारीफ था। बाइबल उसके बारे में ज़्यादा नहीं बताती, लेकिन जितना बताती है उससे हम अपना विश्वास मज़बूत करने के बारे में बहुत कुछ सीख सकते हैं। आइए हम मारथा के बारे में बाइबल में दिए सबसे पहले वाकए पर गौर करें।

‘चिंता करना और परेशान होना’

4. मारथा के परिवार में कौन-कौन था और उनका यीशु के साथ कैसा रिश्ता था?

4 महीनों पहले की बात है। उस वक्‍त लाज़र ज़िंदा और भला-चंगा था। उसके घर एक बहुत ही खास मेहमान आनेवाला था, यीशु मसीह। लाज़र के परिवार में उसकी दो  बहनें थीं, मारथा और मरियम। तीनों भाई-बहन जवान थे और शायद एक ही छत के नीचे रहते थे। कुछ खोजकर्ता कहते हैं कि मारथा शायद उन तीनों में बड़ी थी क्योंकि मेहमान-नवाज़ी करने में अकसर वही पहल करती थी और कुछ किस्सों में उसका नाम तीनों में पहले आता है। (यूह. 11:5) हम नहीं जानते कि उनमें से किसी की शादी हुई थी या नहीं। मगर एक बात पक्की है कि वे तीनों यीशु के अच्छे दोस्त थे। यीशु जब भी यहूदिया इलाके में प्रचार करता वह लाज़र के घर ही ठहरता। उस इलाके में यीशु को काफी विरोध का सामना करना पड़ा था, इसलिए उनके घर में रहते वक्‍त उसे ज़रूर काफी सुकून और हिम्मत मिली होगी।

5, 6. (क) यीशु के आने पर मारथा क्यों उसकी खातिरदारी में खास ध्यान दे रही थी? (ख) जब मरियम को यीशु से सीखने का मौका मिला तो उसने क्या किया?

5 मारथा अपने घर का अच्छा खयाल रखती और मेहमानों की खूब खातिरदारी करती थी। वह बहुत मेहनती थी और अकसर घर के कामकाज में लगी रहती थी। जब यीशु और शायद उसके कुछ साथी घर आए तो मारथा हमेशा की तरह बिना देर किए उनकी मेहमान-नवाज़ी करने में लग गयी। उसने फौरन सोच लिया कि वह उनके लिए तरह-तरह के पकवान बनाएगी। उस ज़माने में मेहमान-नवाज़ी को बहुत अहमियत दी जाती थी। जब कोई मेहमान घर आता तो उसे चूमकर उसका स्वागत किया जाता, उसकी जूतियाँ उतारकर उसके पैर धोए जाते और फिर उसके सिर पर खुशबूदार तेल उँडेला जाता था। (लूका 7:44-47 पढ़िए।) मेहमान के रहने और खाने-पीने का पूरा-पूरा खयाल रखा जाता था।

6 अपने इस खास मेहमान की खातिरदारी करने के लिए मारथा और मरियम के पास ढेर सारा काम था। कई लोगों का मानना है कि उन दोनों में से मरियम सीखने के लिए ज़्यादा उत्सुक रहती थी। उसने शुरू-शुरू में तो अपनी बहन मारथा की मदद की होगी, लेकिन जब यीशु उनके घर आया तो वह मारथा को छोड़ यीशु के पास जा बैठी। यीशु मौके का फायदा उठाकर वहाँ मौजूद लोगों को परमेश्वर के राज के बारे में सिखाने लगा, जो उसके प्रचार का खास विषय था। वह उस ज़माने के धर्म गुरुओं की तरह नहीं था। वह औरतों की इज़्ज़त करता था और उन्हें भी सिखाता था। मरियम, यीशु से सीखने का यह मौका नहीं गँवाना चाहती थी, इसलिए वह यीशु के पैरों के पास बैठ गयी और उसकी हर बात गौर से सुनने लगी।

7, 8. (क) मारथा की चिंता क्यों बढ़ने लगी? (ख) जब उससे बरदाश्त नहीं हुआ तो उसने क्या किया?

7 ज़रा सोचिए, यह देखकर मारथा को कैसा लगा होगा। मेहमानों के लिए इतने सारे पकवान बनाने थे, उनका खयाल रखना था, और भी ढेरों काम थे। जैसे-जैसे वक्‍त बीतता गया उसकी चिंता और बढ़ने लगी। आते-जाते वह देखती कि मरियम उसका हाथ बँटाने के बजाय आराम से बैठकर यीशु की बातें सुन रही है। क्या यह देखकर वह लाल-पीली हो गयी, बड़बड़ाने लगी या उसकी भौंहें तन गयीं? अगर उसने ऐसा किया भी होगा तो कोई ताज्जुब की बात नहीं। एक अकेली जान इतना सारा काम कैसे कर पाती!

 8 मारथा से अब बरदाश्त नहीं हुआ। उसने यीशु को बीच में ही टोककर कहा, “प्रभु, क्या तुझे परवाह नहीं कि मेरी बहन ने सारा काम मुझ अकेली पर छोड़ दिया है? उससे बोल कि आकर मेरा हाथ बँटाए।” (लूका 10:40) ये शब्द बहुत तीखे थे। उसने यीशु से कहा कि वह मरियम को सुधारे और उसे हुक्म दे कि वह भी काम पर लग जाए।

9, 10. (क) यीशु ने मारथा को क्या जवाब दिया? (ख) हम कैसे जानते हैं कि यीशु मारथा की मेहनत को फिज़ूल नहीं बता रहा था?

9 जवाब में यीशु ने जो कहा उससे शायद मारथा को ताज्जुब हुआ होगा, जैसे कि इस बात को पढ़नेवाले बहुत-से लोगों को होता है। यीशु ने बड़ी नरमी से कहा, “मारथा, मारथा, तू बहुत बातों की चिंता कर रही है और परेशान हो रही है। असल में थोड़ी ही चीज़ों की ज़रूरत है या बस एक ही काफी है। जहाँ तक मरियम की बात है, उसने अच्छा भाग चुना है और वह उससे नहीं छीना जाएगा।” (लूका 10:41, 42) यीशु के कहने का क्या मतलब था? क्या वह यह कह रहा था कि मारथा परमेश्वर से ज़्यादा दूसरी चीज़ों को अहमियत दे रही है? एक बढ़िया दावत तैयार करने में मारथा जो मेहनत कर रही थी, क्या यीशु उसे फिज़ूल बता रहा था?

मारथा भले ही ‘बहुत बातों की चिंता कर रही थी और परेशान थी,’ फिर भी उसने नम्रता से यीशु की सलाह मानी

10 नहीं, यीशु जानता था कि मारथा का इरादा नेक है और वह इतनी मेहनत इसलिए कर रही है क्योंकि वह मेहमानों से प्यार करती है। यीशु की नज़र में एक शानदार दावत देना अपने आप में गलत नहीं था। कुछ समय पहले ही तो वह मत्ती के यहाँ उसके लिए रखी “एक बड़ी दावत” में गया था। (लूका 5:29) यानी बात मारथा की दावत की नहीं बल्कि यह थी कि वह किन चीज़ों को अहमियत दे रही है। उसे एक बढ़िया दावत देने की इतनी फिक्र थी कि वह भूल गयी कि कौन-सी बात ज़्यादा ज़रूरी है।

यीशु ने मारथा की मेहमान-नवाज़ी की कदर की और वह जानता था कि मारथा ने नेक इरादे से और प्यार की वजह से ऐसा किया था

11, 12. यीशु ने कैसे प्यार से मारथा की सोच सुधारी?

11 मारथा के घर में यहोवा परमेश्वर का इकलौता बेटा यीशु सच्चाई सिखा रहा था! उसकी बात सुनने से ज़्यादा ज़रूरी और कुछ नहीं था, न तो मारथा की बेहतरीन दावत, न ही उसमें लगी सारी मेहनत। यीशु को यह देखकर ज़रूर दुख हुआ होगा कि मारथा अपने विश्वास को मज़बूत करने का एक सुनहरा मौका गँवा रही है। फिर भी, उसने फैसला मारथा पर छोड़ दिया। * लेकिन मारथा को अपनी बहन के लिए फैसला करने का हक नहीं था। उसका यह कहना गलत था कि मरियम भी उसकी तरह यीशु की बात सुनना छोड़कर घर के काम में लग जाए।

 12 यीशु ने बड़े प्यार से मारथा की सोच सुधारी। उसने मारथा का गुस्सा शांत करने के लिए दो बार प्यार से उसका नाम लिया और उसे यकीन दिलाया कि उसे ‘बहुत बातों की चिंता करने और परेशान होने’ की ज़रूरत नहीं। सादा भोजन यानी एक-दो चीज़ें काफी थीं, खासकर इसलिए क्योंकि परमेश्वर के बारे में सीखने का शानदार मौका सामने था। इसलिए मरियम ने जो “अच्छा भाग” चुना था यानी यीशु से सीखने का फैसला किया था, इसे यीशु किसी भी हाल में उससे नहीं छीनता!

13. यीशु ने जिस तरह मारथा की सोच सुधारी उससे हम क्या सीख सकते हैं?

13 इस छोटे-से ब्यौरे से हम मसीह के चेले बहुत कुछ सीख सकते हैं। हमारे लिए सबसे ज़रूरी है “परमेश्वर से मार्गदर्शन पाने की भूख” मिटाना और हमें किसी भी बात को इसके आड़े नहीं आने देना चाहिए। (मत्ती 5:3) हालाँकि हम मारथा की तरह दरियादिल  और मेहनती बनना चाहते हैं, लेकिन मेहमान-नवाज़ी करते वक्‍त हमें खाने-पीने को लेकर इस कदर ‘चिंता नहीं करनी चाहिए और परेशान नहीं होना चाहिए’ कि हम ज़्यादा ज़रूरी बातों को भूल जाएँ। अपने मसीही भाई-बहनों के साथ इकट्ठा होने का हमारा मकसद बढ़िया दावत देना या उसका मज़ा लेना नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, हमें खासकर एक-दूसरे का हौसला बढ़ाने और विश्वास मज़बूत करनेवाली बातें बोलने के लिए उनके साथ इकट्ठा होना चाहिए। (रोमियों 1:11, 12 पढ़िए।) सादे भोजन के साथ भी बेहतरीन संगति का मज़ा लिया जा सकता है।

प्यारा भाई फिर से ज़िंदा हो गया!

14. हम क्यों यकीन रख सकते हैं कि मारथा ने सलाह मानने में एक अच्छी मिसाल रखी?

14 जब यीशु ने मारथा को प्यार से समझाया तो क्या उसने यीशु की बात मानी और उससे सबक सीखा? ज़रूर सीखा होगा। इसका जवाब हमें प्रेषित यूहन्ना की किताब में मिलता है जहाँ उसने लाज़र के बारे में एक रोमांचक वाकया लिखा है। यूहन्ना ने लिखा, “यीशु, मारथा और उसकी बहन और लाज़र से बहुत प्यार करता था।” (यूह. 11:5) इससे पहले बतायी दावत के किस्से को अब तक कई महीने बीत चुके थे। इससे पता चलता है कि जब यीशु ने प्यार से मारथा की सोच सुधारी तो वह मुँह फुलाकर बैठी नहीं रही, न ही उसने अपने अंदर नाराज़गी पाली। इसके बजाय उसने दिल से यीशु की सलाह मानी। इस मामले में भी मारथा ने हमारे लिए विश्वास की एक बेहतरीन मिसाल रखी है। आखिर हममें ऐसा कौन है जो गलती नहीं करता और जिसे सुधार करने के लिए सलाह की ज़रूरत नहीं पड़ती?

15, 16. (क) जब लाज़र बीमार पड़ा तो मारथा ने क्या किया होगा? (ख) मारथा और मरियम की उम्मीदों पर क्यों पानी फिर गया होगा?

15 जब लाज़र बीमार पड़ा तो मारथा ने ज़रूर उसकी अच्छी देखभाल की होगी। उसकी तकलीफ कम करने और उसका इलाज करवाने के लिए मारथा से जो भी बन पड़ा उसने किया। फिर भी लाज़र की हालत बिगड़ती गयी। उसकी बहनें दिन-रात उसकी सेवा में लगी रहीं। मारथा ने कितनी ही बार लाज़र का मुरझाया चेहरा देखकर सुख-दुख के उन लमहों को याद किया होगा जो उन्होंने साथ बिताए थे।

16 जब उन्हें लगा कि अब लाज़र के बचने की कोई उम्मीद नहीं है तो उन्होंने यीशु के पास संदेश भिजवाया। यीशु जहाँ प्रचार कर रहा था वहाँ से बैतनियाह पहुँचने में दो दिन लगते थे। उन्होंने संदेश में बस इतना कहा, “प्रभु, आकर देख! तेरा वह दोस्त बीमार है जिससे तू बहुत प्यार करता है।” (यूह. 11:1, 3) वे जानती थीं कि यीशु उनके भाई से बहुत प्यार करता था और उन्हें विश्वास था कि यीशु अपने दोस्त को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगा। क्या वे उम्मीद कर रही थीं कि यीशु जल्द-से-जल्द आ जाएगा? अगर हाँ, तो उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। लाज़र की मौत हो गयी!

17. (क) मारथा को किस बात से हैरानी हुई होगी? (ख) जब उसे पता चला कि यीशु गाँव के पास पहुँच गया है तो उसने क्या किया?

17 मारथा और मरियम ने मिलकर अपने भाई के लिए मातम मनाया और उसे दफनाने  का इंतज़ाम किया। उनसे मिलने के लिए बैतनियाह और आस-पास से कई लोग आए। लेकिन अब भी यीशु की कोई खबर नहीं थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया मारथा की हैरानी बढ़ती गयी होगी कि आखिर यीशु क्यों नहीं आया। चार दिन बाद उसे खबर मिली कि यीशु उसके गाँव के पास पहुँच गया है। वह किसी काम में देर नहीं करती थी, इसलिए इस दुख की घड़ी में भी वह मरियम को बताए बगैर यीशु से मिलने दौड़ी चली गयी।—यूहन्ना 11:18-20 पढ़िए।

18, 19. मारथा ने किस आशा पर अपना विश्वास ज़ाहिर किया और यह क्यों लाजवाब था?

18 यीशु को देखते ही मारथा ने वह बात कही जो इतने दिनों से उसे परेशान कर रही थी। उसने कहा, “प्रभु, अगर तू यहाँ होता तो मेरा भाई न मरता।” लेकिन मारथा में आशा और विश्वास का दीया अब भी जल रहा था। उसने कहा, “मैं अब भी जानती हूँ कि तू परमेश्वर से जो कुछ माँगेगा, वह तुझे दे देगा।” उसका विश्वास मज़बूत करने के लिए यीशु ने फौरन उससे कहा, “तेरा भाई ज़िंदा हो जाएगा।”—यूह. 11:21-23.

19 मारथा को लगा कि यीशु भविष्य की बात कर रहा है। इसलिए उसने कहा, “मैं  जानती हूँ कि आखिरी दिन जब मरे हुओं को ज़िंदा किया जाएगा, तब वह ज़िंदा हो जाएगा।” (यूह. 11:24) मरे हुओं के ज़िंदा होने के बारे में उसका यह विश्वास वाकई लाजवाब था। सदूकी नाम के कुछ यहूदी धर्म गुरु इस शिक्षा पर यकीन नहीं करते थे, जबकि शास्त्र में यह शिक्षा साफ-साफ दी गयी थी। (दानि. 12:13; मर. 12:18) मारथा को पता था कि यीशु ने मरे हुओं के ज़िंदा होने की आशा के बारे में सिखाया है और उसने कुछ लोगों को ज़िंदा भी किया है। लेकिन उनमें से किसी को भी मरे इतने दिन नहीं हुए थे। उसे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि आगे क्या होनेवाला है।

20. यीशु ने यूहन्ना 11:25-27 में जो बात कही और जवाब में मारथा ने जो कहा, उसका मतलब समझाइए।

20 तब यीशु ने एक ऐसी बात कही जो आज तक मशहूर है, “मरे हुओं को ज़िंदा करनेवाला और उन्हें जीवन देनेवाला मैं ही हूँ।” जी हाँ, यहोवा परमेश्वर ने अपने बेटे को अधिकार दिया है कि वह आनेवाले समय में पूरी दुनिया में मरे हुओं को ज़िंदा करे। यीशु ने मारथा से पूछा, “क्या तू इस पर यकीन करती है?” जवाब में मारथा ने वह बात कही जो इस लेख की शुरूआत में बतायी गयी है। उसे विश्वास था कि यीशु ही मसीहा है, वही यहोवा परमेश्वर का बेटा है और दुनिया में उसी के आने के बारे में भविष्यवक्ताओं ने पहले से बताया था।—यूह. 5:28, 29; यूहन्ना 11:25-27 पढ़िए।

21, 22. (क) यीशु ने मातम करनेवालों के लिए अपनी भावनाएँ कैसे ज़ाहिर कीं? (ख) समझाइए कि लाज़र कैसे ज़िंदा किया गया?

21 क्या यहोवा परमेश्वर और उसका बेटा यीशु मसीह ऐसे विश्वास की कदर करते हैं? इसके बाद मारथा की आँखों के सामने जो घटनाएँ घटीं वे इस सवाल का साफ-साफ जवाब देती हैं। मारथा दौड़कर अपनी बहन को बुला लायी। फिर उसने देखा कि किस तरह मरियम और वहाँ इकट्ठी भीड़ से बात करते-करते यीशु का दिल भर आया। उसने यीशु की आँखों में छलकते आँसुओं को भी देखा। यीशु ने यह छिपाने की बिलकुल कोशिश नहीं की कि जब किसी की मौत हो जाती है तो कितना दुख होता है। इसके बाद मारथा ने यीशु को यह कहते सुना कि उसके भाई की कब्र से पत्थर हटाया जाए।—यूह. 11:28-39.

22 मारथा ने, जो हमेशा दिल से ज़्यादा दिमाग से काम लेती थी, एतराज़ करते हुए कहा कि लाज़र को मरे चार दिन हो चुके हैं, इसलिए उसकी लाश से बदबू आ रही होगी। यीशु ने उसे याद दिलाया, “क्या मैंने तुझसे नहीं कहा था कि अगर तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा देखेगी?” उसने विश्वास किया और सच में उसने यहोवा परमेश्वर की महिमा देखी। उसी वक्‍त परमेश्वर ने अपने बेटे को शक्‍ति दी कि वह लाज़र को ज़िंदा करे। इसके बाद जो-जो हुआ उसे मारथा कभी नहीं भूली होगी: यीशु की यह पुकार, “लाज़र, बाहर आ जा!” गुफा के अंदर से लाज़र के उठने की आहट, कफन की पट्टियों में लिपटे लाज़र का धीरे-धीरे बाहर आना, यीशु की यह आज्ञा, “इसे खोल दो और जाने दो” और वह पल जब दोनों बहनें खुशी से दौड़कर अपने भाई से लिपट गयीं। (यूहन्ना 11:40-44 पढ़िए।) मारथा को लगा मानो उसके दिल पर रखा वह भारी पत्थर हट गया!

मारथा को यीशु पर विश्वास करने की यह आशीष मिली कि उसने और मरियम ने अपने भाई को दोबारा ज़िंदा होते देखा

23. यहोवा और यीशु आपको क्या देना चाहते हैं और इसे पाने के लिए आपको क्या करना होगा?

 23 यह वाकया दिखाता है कि मरे हुओं का ज़िंदा होना कोरी कल्पना नहीं है। यह बाइबल की ऐसी शिक्षा है जो मन को बहुत सुकून देती है और जिसके सच होने का सबूत इतिहास में मिलता है। (अय्यू. 14:14, 15) जो विश्वास रखते हैं उन्हें यहोवा परमेश्वर और उसका बेटा यीशु ज़रूर आशीष देते हैं, जैसे उन्होंने मारथा, मरियम और लाज़र को दी थीं। अगर आप मारथा की तरह अपना विश्वास मज़बूत करेंगे तो वे आपको भी ढेरों आशीषें देंगे।

“मारथा सेवा में लगी हुई थी”

24. बाइबल मारथा के बारे में आखिरी बार ज़िक्र करते हुए क्या बताती है?

24 इसके बाद मारथा का ज़िक्र बाइबल में एक बार और आता है। यह बात यीशु की ज़िंदगी के आखिरी हफ्ते की है। यह जानते हुए कि जल्द ही उसे किन तकलीफों से गुज़रना पड़ेगा, यीशु बैतनियाह में अपने दोस्तों के घर गया। वहाँ से 3 किलोमीटर पैदल चलकर वह यरूशलेम पहुँच सकता था। यीशु और लाज़र शाम का खाना खाने शमौन के घर गए जो पहले एक कोढ़ी था। यहाँ मारथा के बारे में आखिरी बार ज़िक्र करते हुए बाइबल बताती है, “मारथा सेवा में लगी हुई थी।”—यूह. 12:2.

25. आज मारथा जैसी बहनों का होना मंडलियों के लिए क्यों एक आशीष है?

25 मारथा सचमुच एक मेहनती औरत थी! बाइबल जब पहली बार उसका ज़िक्र करती है तो वह काम कर रही थी और आखिरी बार ज़िक्र करती है तब भी वह काम कर रही थी और दूसरों का खयाल रखने में लगी हुई थी। आज मसीही मंडलियों के लिए यह कितनी बड़ी आशीष है कि उनके बीच मारथा जैसी बहनें हैं, जो दिलेर और दरियादिल हैं और खुद को यहोवा और दूसरों की सेवा में लगाकर अपने विश्वास का सबूत देती हैं। क्या मारथा आगे भी इसी तरह अपने विश्वास का सबूत देती रही? बेशक! उसके विश्वास ने ही उसे आगे चलकर और भी कई मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत दी होगी।

26. मारथा के विश्वास ने उसे क्या-क्या सहने की ताकत दी?

26 कुछ ही दिन बाद मारथा को अपने प्यारे प्रभु यीशु की दर्दनाक मौत का सदमा सहना पड़ा। इसके अलावा जिन लोगों ने यीशु को मार डाला था उन्होंने उसके भाई लाज़र को भी मार डालने की ठान ली थी, क्योंकि उसके ज़िंदा होने से कई लोग यीशु पर विश्वास करने लगे थे। (यूहन्ना 12:9-11 पढ़िए।) यही नहीं, एक दिन मौत ने मारथा को भी अपने भाई और बहन से जुदा कर दिया। हम नहीं जानते कि यह कैसे और कब हुआ, लेकिन इतना ज़रूर यकीन रख सकते हैं कि मारथा के अनमोल विश्वास ने उसे आखिर तक धीरज धरने की ताकत दी। इसलिए यह ज़रूरी है कि मसीही, मारथा के विश्वास की मिसाल पर चलें।

^ पैरा. 11 पहली सदी के यहूदी समाज में आम तौर पर औरतों को धर्म गुरुओं से शिक्षा पाने की इजाज़त नहीं थी। उन्हें सिर्फ घर का कामकाज सिखाया जाता था। इसलिए मारथा को शायद यह बात अजीब लगी कि एक औरत कैसे एक गुरु के पास बैठकर सीख सकती है।