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यहोवा के साक्षी

हिंदी

उनके विश्वास की मिसाल पर चलिए

 अध्याय नौ

उसने समझ-बूझ से काम लिया

उसने समझ-बूझ से काम लिया

1-3. (क) अबीगैल के घराने पर क्या मुसीबत आनेवाली थी? (ख) हम अबीगैल के बारे में क्या सीखेंगे?

अबीगैल जवान सेवक के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ते देख समझ गयी कि ज़रूर कुछ गड़बड़ है। अबीगैल के पति नाबाल के घराने पर खतरे के काले बादल मँडरा रहे थे! करीब 400 सैनिक बढ़े चले आ रहे थे। उन्होंने ठान लिया था कि वे नाबाल के घराने के सभी आदमियों को मार डालेंगे। पर क्यों?

2 यह सब नाबाल की गलती का नतीजा था। उसने हमेशा की तरह गुस्से से बात की थी और अपनी हेकड़ी दिखायी थी। मगर इस बार उसने गलत आदमी से दुश्मनी मोल ली। वह आदमी एक सेनापति था। उसके वफादार सैनिक लड़ने में माहिर थे और उस पर अपनी जान छिड़कते थे। नाबाल के एक जवान सेवक ने, जो शायद एक चरवाहा था, नाबाल की सारी बात सुन ली थी। वह दौड़ा-दौड़ा अबीगैल के पास गया। उसे पूरा यकीन था कि उसकी मालकिन अपने घराने को बचाने के लिए ज़रूर कोई तरकीब ढूँढ़ निकालेगी। लेकिन भला एक अकेली औरत एक बड़ी सेना के आगे क्या कर सकती थी?

एक अकेली औरत एक बड़ी सेना के आगे क्या कर सकती थी?

3 यह जानने से पहले आइए हम इस बेमिसाल औरत के बारे में सीखें: वह कौन थी? उसके घराने पर यह मुसीबत क्यों आयी? उसके विश्वास से हम क्या सीख सकते हैं?

“अबीगैल हमेशा समझ-बूझ से काम लेती थी और बहुत खूबसूरत थी”

4. नाबाल कैसा आदमी था?

4 अबीगैल और नाबाल की शख्सियत एक-दूसरे से बिलकुल अलग थी। अबीगैल एक अच्छी पत्नी थी, जबकि नाबाल में अच्छे पति का एक भी गुण नहीं था। वह बहुत अमीर था इसलिए खुद को बड़ा समझता था, मगर सवाल यह है कि दूसरे उसे किस नज़र से देखते थे? बाइबल में इस आदमी की जितनी निंदा की गयी है उतनी किसी और की नहीं की गयी। उसके नाम का मतलब ही था, “मूर्ख।” मगर उसे यह नाम दिया किसने? उसके माता-पिता ने? या फिर बाद में लोगों ने उसका व्यवहार देखकर उसे यह नाम दिया? उसका नाम कैसे भी पड़ा हो, यह उस पर बिलकुल सही बैठता था। नाबाल “कठोर स्वभाव का था और सबके  साथ बुरा बरताव करता था।” वह एक पियक्कड़ था और दूसरों पर धौंस जमाता था। सब उससे डरते थे और कोई उसे पसंद नहीं करता था।—1 शमू. 25:2, 3, 17, 21, 25.

5, 6. (क) अबीगैल में कौन-से मनभावने गुण थे? (ख) उसने एक निकम्मे आदमी से शादी क्यों की होगी?

5 लेकिन अबीगैल का स्वभाव बिलकुल अलग था। उसके नाम का मतलब था, “मेरे पिता ने खुद को आनंदित किया है।” सच, उसके जैसी खूबसूरत बेटी पाकर किस पिता का सीना गर्व से नहीं फूलेगा? और अगर बेटी दिल से भी खूबसूरत हो तो पिता और भी खुश होगा। अकसर देखा गया है कि जो इंसान दिखने में सुंदर होता है, उसे खुद पर इतना गुमान होता है कि वह समझ-बूझ, बुद्धि, हिम्मत और विश्वास जैसे गुण पैदा करने की ज़रूरत ही नहीं समझता। मगर अबीगैल ऐसी बिलकुल नहीं थी। बाइबल में उसकी खूबसूरती के साथ-साथ उसकी समझ-बूझ की भी तारीफ की गयी है।—1 शमूएल 25:3 पढ़िए।

6 मगर आज कुछ लोग शायद सोचें, ‘जब अबीगैल इतनी बुद्धिमान थी तो उसने एक निकम्मे आदमी से शादी क्यों की?’ याद रखिए कि पुराने ज़माने में घर के बड़े-बुज़ुर्ग रिश्ता तय करते थे। या अगर लड़का-लड़की अपनी मरज़ी से जीवन-साथी चुनते तो उन्हें माता-पिता की रज़ामंदी ज़रूर लेनी पड़ती थी। तो क्या अबीगैल के माता-पिता ने नाबाल की दौलत-शोहरत देखकर अपनी बेटी का हाथ उसके हाथ में दे दिया? क्या उन्हें लगा कि अपनी बेटी को गरीबी के दलदल से बाहर निकालने का यही एक रास्ता है? वजह चाहे जो भी रही हो, एक बात साफ है कि नाबाल के पास दौलत ज़रूर थी, मगर वह एक अच्छा पति नहीं था।

7. (क) माता-पिता कैसे बच्चों को शादी के बारे में सही नज़रिया रखना सिखा सकते हैं? (ख) अबीगैल ने क्या करने की ठान ली थी?

7 इससे माता-पिताओं को सबक मिलता है कि वे अपने बच्चों को शादी के बारे में सही नज़रिया रखना सिखाएँ। उन्हें न तो अपने बच्चों को पैसा देखकर शादी करने की नसीहत देनी चाहिए और न ही कच्ची उम्र में डेटिंग करने का उन पर दबाव डालना चाहिए, क्योंकि इस उम्र में वे बड़ों की ज़िम्मेदारियाँ उठाने के काबिल नहीं होते। (1 कुरिं. 7:36) लेकिन अबीगैल के लिए अब यह सब सोचने का वक्‍त नहीं था। नाबाल से उसकी शादी चाहे किसी भी वजह से हुई हो, उसने ठान लिया था कि वह पत्नी होने की ज़िम्मेदारी अच्छी तरह निभाने की कोशिश करेगी।

“मालिक उन पर बरस पड़ा और उनकी बेइज़्ज़ती की”

8. नाबाल ने किसकी बेइज़्ज़ती की थी और ऐसा करना क्यों बेवकूफी थी?

8 नाबाल ने अभी-अभी अबीगैल के लिए एक और मुसीबत खड़ी कर दी। उसने जिस आदमी की बेइज़्ज़ती की वह कोई और नहीं बल्कि दाविद था। दाविद, यहोवा परमेश्वर का वफादार सेवक था। यहोवा ने भविष्यवक्ता शमूएल के ज़रिए उसका अभिषेक किया था ताकि शाऊल के बाद वह राजा बने। (1 शमू. 16:1, 2, 11-13) जब शाऊल को इस बारे में पता चला तो वह जलने लगा और दाविद को मार डालने के लिए उसके पीछे पड़ गया। इसलिए दाविद भाग गया और अपने 600 वफादार सैनिकों के साथ वीराने में रहने लगा।

9, 10. (क) दाविद और उसके आदमी किन हालात में अपना गुज़र-बसर कर रहे थे? (ख) नाबाल को क्यों दाविद और उसके आदमियों का एहसान मानना चाहिए था? (पैराग्राफ 10 का फुटनोट भी देखें।)

9 नाबाल माओन नाम के नगर में रहता था, मगर करमेल में काम करता था जो पास  का एक नगर था। शायद वहीं उसकी ज़मीन भी थी। * ये दोनों नगर काफी ऊँचाई पर थे और वहाँ हरे-हरे घास के मैदान थे। भेड़ों को चराने के लिए यह बहुत बढ़िया जगह थी। नाबाल के पास 3,000 भेड़ें थीं। मगर आस-पास का इलाका पूरा जंगल था। दक्षिण में दूर-दूर तक पारान वीराना फैला था। पूरब का रास्ता लवण सागर की तरफ जाता था। यह रास्ता बंजर इलाके से गुज़रता था जहाँ जगह-जगह तंग घाटियाँ और गुफाएँ थीं। इन्हीं इलाकों में दाविद और उसके आदमी बड़ी मुश्किल से अपना गुज़र-बसर कर रहे थे। अपना पेट भरने के लिए उन्हें शिकार करना पड़ता था। उन्हें और भी कई तकलीफें झेलनी पड़ती थीं। अकसर उनकी मुलाकात रईस नाबाल के जवान चरवाहों से हो जाती थी।

10 ये मेहनती सैनिक इन चरवाहों के साथ कैसे पेश आते थे? वे चाहते तो जब-तब भेड़ों को मारकर खा सकते थे, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने एक बाड़े की तरह उन चरवाहों और भेड़-बकरियों की हिफाज़त की। (1 शमूएल 25:15, 16 पढ़िए।) उस ज़माने में भेड़ों और चरवाहों को कई खतरों का सामना करना पड़ता था। जंगली जानवर बहुत हुआ करते थे। ऊपर से इसराएल देश की दक्षिणी सरहद पास थी, इसलिए दूसरे देशों के लुटेरे अकसर हमला बोल देते थे। *

11, 12. (क) दाविद के संदेश से कैसे उसकी समझ और नाबाल के लिए उसका आदर दिखायी दिया? (ख) नाबाल जिस तरह पेश आया वह क्यों गलत था?

11 वीराने में इतने सारे आदमियों को खिलाना दाविद के लिए बहुत मुश्किल रहा होगा। इसलिए उसने नाबाल से मदद लेने की सोची। उसने बुद्धि से काम लेते हुए एक सही दिन चुना और नाबाल के पास अपने 10 दूत भेजे। वह दिन भेड़ों का ऊन कतरने का समय था और ऐसे दिन में आम तौर पर लोग दरियादिली दिखाते और जश्न मनाते थे। दाविद ने अपने आदमियों को यह भी बताया कि उन्हें नाबाल से कैसे अदब से बात करनी है। उसने सोच-समझकर शब्द चुने और बड़ी नम्रता से गुज़ारिश की। उसने खुद को नाबाल का “बेटा” भी कहा। उसने शायद नाबाल को इज़्ज़त देने के लिए ऐसा कहा क्योंकि नाबाल उम्र में उससे बड़ा था। तब नाबाल ने क्या किया?—1 शमू. 25:5-8.

12 उसका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया! एक जवान सेवक ने, जिसका ज़िक्र लेख की शुरूआत में किया गया है, अबीगैल को बताया कि वह “उन पर बरस पड़ा और उनकी बेइज़्ज़ती की।” कंजूस नाबाल चिल्लाने लगा कि वह अपना अनमोल रोटी-पानी और हलाल किया गोश्त, दाविद के आदमियों पर नहीं लुटाएगा। उसने दाविद के बारे में भी भला-बुरा कहा, मानो वह कोई मामूली इंसान हो। उसने उसकी तुलना एक भगोड़े नौकर से की। नाबाल की राय शायद राजा शाऊल जैसी थी जो दाविद से नफरत करता था। दोनों ही परमेश्वर का नज़रिया नहीं रखते थे। मगर यहोवा दाविद से बहुत प्यार करता था। उसकी नज़र में वह कोई बागी सेवक नहीं बल्कि इसराएल का अगला राजा था।—1 शमू. 25:10, 11, 14.

13. (क) दाविद ने पहले क्या करने की सोची थी? (ख) याकूब 1:20 के सिद्धांत के मुताबिक क्या दाविद का रवैया सही था?

 13 जब दाविद के दूतों ने आकर सारा हाल कह सुनाया तो वह आग बबूला हो उठा। उसने आदेश दिया, “सब लोग अपनी-अपनी तलवार बाँध लो!” फिर वह भी हथियार बाँधकर अपने 400 आदमियों को लेकर निकल पड़ा। उसने कसम खायी कि वह नाबाल के घराने के हर आदमी को मार डालेगा। (1 शमू. 25:12, 13, 21, 22) दाविद का गुस्सा होना वाजिब था, मगर गुस्सा उतारने का उसका तरीका गलत था। बाइबल बताती है, “इंसान के क्रोध का नतीजा परमेश्वर की नेकी नहीं होता।” (याकू. 1:20) मगर अब अबीगैल अपने घराने को बचाने के लिए क्या कर सकती थी?

“परमेश्वर तुझे आशीष दे क्योंकि तूने समझदारी से काम लिया”

14. (क) हालात को सुधारने के लिए अबीगैल ने कौन-सा पहला कदम उठाया? (ख) अबीगैल और नाबाल में जो फर्क था उससे हम क्या सीखते हैं? (फुटनोट भी देखें।)

14 जैसे हमने देखा, अबीगैल हालात को सुधारने का पहला कदम उठा चुकी थी। कैसे? उसने जवान सेवक की बात सुनी, जबकि नाबाल को दूसरों की बात सुनने की आदत नहीं थी। सेवक ने नाबाल के बारे में कहा, “मालिक ऐसा निकम्मा आदमी है कि हममें से कोई उससे बात नहीं कर सकता।” * (1 शमू. 25:17) खुद को बड़ा आदमी समझने की वजह से नाबाल दूसरों की कभी नहीं सुनता था। इस तरह का अक्खड़पन आज हर कहीं देखने को मिलता है। लेकिन सेवक जानता था कि अबीगैल उसकी बात ज़रूर सुनेगी। इसलिए वह उसके पास समस्या लेकर गया।

अबीगैल नाबाल जैसी नहीं थी, वह दूसरों की बात सुनती थी

15, 16. (क) नीतिवचन में दिया काबिल पत्नी का ब्यौरा क्यों अबीगैल पर सही बैठता है? (ख) हम क्यों कह सकते हैं कि वह अपने पति के मुखियापन के खिलाफ नहीं जा रही थी?

15 अबीगैल ने फौरन अपना दिमाग लगाया और कदम उठाया। इस ब्यौरे में अबीगैल के लिए शब्द “फौरन” चार बार इस्तेमाल हुआ है। उसने दाविद और उसके आदमियों के लिए ढेर सारी चीज़ें बाँधीं, जैसे रोटी, दाख-मदिरा, भेड़ें, भुना हुआ अनाज, किशमिश और अंजीर की टिकियाँ। इससे साफ है कि अबीगैल अच्छी तरह घर सँभालती थी, इसलिए वह जानती थी कि घर में क्या-क्या है। उस पर नीतिवचन किताब में दिया काबिल पत्नी का ब्यौरा सही बैठता है। (नीति. 31:10-31) उसने पहले सारा सामान अपने कुछ सेवकों के हाथ भिजवा दिया, फिर वह अकेली पीछे-पीछे आयी। “मगर उसने अपने पति नाबाल को कुछ नहीं बताया।”—1 शमू. 25:18, 19.

16 क्या इसका मतलब यह है कि अबीगैल अपने पति के मुखियापन के खिलाफ जा रही थी? जी नहीं। नाबाल ने यहोवा के अभिषिक्‍त सेवक के साथ ऐसी दुष्टता की जिससे उसके घराने के सभी मासूम लोगों की जान पर बन आयी। ऐसे में अगर अबीगैल कदम नहीं  उठाती तो क्या वह अपने पति के दोष में साझेदार नहीं होती? यही नहीं, ऐसे हालात में उसका फर्ज़ था कि वह अपने पति से बढ़कर परमेश्वर के अधीन रहे।

17, 18. (क) जब अबीगैल दाविद से मिली तो उसने क्या किया और क्या कहा? (ख) उसकी बातों का दाविद पर क्यों गहरा असर हुआ?

17 थोड़े ही समय में अबीगैल, दाविद और उसके आदमियों के पास पहुँच गयी। एक बार फिर उसने फौरन कदम उठाया। जैसे ही उसने दाविद को देखा, वह गधे से नीचे उतर गयी और ज़मीन पर गिरकर दाविद को प्रणाम किया। (1 शमू. 25:20, 23) फिर उसने दाविद को मन की सारी बात बतायी और अपने पति और घराने के लिए रहम की भीख माँगी। आखिर उसने ऐसा क्या कहा जिससे दाविद पर इतना गहरा असर हुआ?

“अपनी दासी को कुछ कहने की इजाज़त दे”

18 दाविद के आदमियों के साथ जो हुआ उसका सारा इलज़ाम अबीगैल ने अपने सिर ले लिया और दाविद से माफी माँगी। उसने माना कि उसका पति वाकई अपने नाम के मुताबिक मूर्ख है। यह कहकर उसने शायद दाविद को सुझाया कि ऐसे आदमी के मुँह लगना उसकी शान के खिलाफ है। उसने दाविद पर भरोसा जताया कि वह यहोवा का चुना हुआ आदमी है और “यहोवा की तरफ से युद्ध करता है।” उसने यह भी बताया कि उसे मालूम है, यहोवा ने दाविद और उसके राज करने के अधिकार के बारे में क्या वादा किया है। उसने कहा, ‘यहोवा तुझे इसराएल का अगुवा ठहराएगा।’ इसके अलावा, उसने दाविद से बिनती की कि वह ऐसा कुछ न करे जिससे वह खून का दोषी ठहरे या बाद में ‘उसका मन उसे धिक्कारे।’ शायद अबीगैल के कहने का यह मतलब था कि बाद में दाविद का ज़मीर उसे कचोट सकता है। (1 शमूएल 25:24-31 पढ़िए।) है न उसके शब्द सलोने और दिल को छू लेनेवाले!

19. (क) अबीगैल की बात सुनकर दाविद ने क्या किया? (ख) दाविद ने क्यों उसकी तारीफ की?

19 फिर दाविद ने क्या किया? उसने अबीगैल की दी हुई चीज़ें कबूल कीं और कहा, “इसराएल के परमेश्वर यहोवा की बड़ाई हो जिसने आज तुझे मेरे पास भेजा है! परमेश्वर तुझे आशीष दे क्योंकि तूने समझदारी से काम लिया है। आज तूने मुझे खून का दोषी बनने से . . . रोक लिया है, परमेश्वर तुझे आशीष दे।” अबीगैल ने जिस तरह फुर्ती से काम किया और हिम्मत दिखायी, उसकी दाविद ने तारीफ की। उसने कबूल किया कि अबीगैल ने उसे खून का दोषी बनने से रोक लिया। उसने अबीगैल से कहा, “तू बेफिक्र होकर घर जा।” उसने बड़ी नम्रता से यह भी कहा, “मैंने तेरी बात मान ली है।”—1 शमू. 25:32-35.

‘तेरी यह दासी तैयार है’

20, 21. (क) आपके हिसाब से यह बात क्यों काबिले-तारीफ है कि अबीगैल अपने पति के पास लौट गयी? (ख) अबीगैल ने नाबाल से बात करने के लिए सही वक्‍त चुनकर कैसे समझ-बूझ और हिम्मत दिखायी?

20 इसके बाद अबीगैल अपने रास्ते चली गयी। उसने दाविद से हुई मुलाकात के बारे में ज़रूर सोचा होगा। उसने यह भी गौर किया होगा कि दाविद कितना वफादार और भला आदमी था, जबकि उसका पति रौब जमानेवाला था। मगर वह इन बातों पर देर तक नहीं सोचती रही। हम पढ़ते हैं, “बाद में अबीगैल नाबाल के पास लौटी।” जी हाँ, उसका इरादा  अब भी पक्का था कि वह पत्नी होने का फर्ज़ अच्छी तरह निभाएगी। उसे नाबाल को बताना था कि उसने दाविद और उसके आदमियों को क्या-क्या चीज़ें दीं। पति होने के नाते उसे जानने का हक था। अबीगैल को उसे यह भी बताना था कि कैसे उन पर आनेवाला खतरा टल गया है। क्यों? क्योंकि अगर नाबाल को यह बात किसी और से पता चलती तो यह उसके लिए बड़े शर्म की बात होती। लेकिन उसने नाबाल को अभी कुछ नहीं बताया क्योंकि वह राजा की तरह दावत उड़ा रहा था और शराब के नशे में धुत्त था।—1 शमू. 25:36.

अबीगैल ने हिम्मत से नाबाल को बताया कि उसने उसकी जान बचाने के लिए क्या किया है

21 अबीगैल ने एक बार फिर समझ-बूझ से काम लिया और सुबह होने का इंतज़ार किया, क्योंकि तब तक उसके पति का नशा उतर जाता और वह उसकी बात समझ पाता। पर यह अबीगैल के लिए खतरे से खाली नहीं था। वह तैश में आकर कुछ भी कर सकता था। फिर भी अबीगैल हिम्मत से उसके पास गयी और उसने उसे सबकुछ बता दिया। अबीगैल ने सोचा होगा कि उसका पति गुस्से से भड़क उठेगा, यहाँ तक कि उस पर हाथ भी उठाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। नाबाल बैठा-का-बैठा ही रहा और बिलकुल भी नहीं हिला।—1 शमू. 25:37.

22. (क) नाबाल का क्या हुआ? (ख) इस कहानी से हम परिवार में होनेवाले ज़ुल्म के बारे में क्या सीख सकते हैं?

22 नाबाल को क्या हो गया था? “वह पत्थर-सा सुन्न हो गया, उसके दिल ने मानो काम करना बंद कर दिया।” शायद उसे किसी तरह का स्ट्रोक हो गया था और 10 दिन बाद उसने दम तोड़ दिया। मगर उसकी मौत सिर्फ स्ट्रोक से नहीं हुई। बाइबल बताती है, “यहोवा ने नाबाल को मारा और वह मर गया।” (1 शमू. 25:38) यहोवा ने नाबाल को सज़ा देकर सही किया। इस तरह अबीगैल की शादीशुदा ज़िंदगी की तकलीफों का अंत हो गया। आज परमेश्वर कोई चमत्कार करके लोगों को सज़ा नहीं देता। फिर भी यह कहानी एक ज़बरदस्त यादगार है कि परमेश्वर ऐसे मामलों को अनदेखा नहीं करता, जिनमें परिवार का कोई सदस्य दूसरों पर धौंस जमाता है या ज़ुल्म ढाता है। वह अपने समय पर ज़रूर इंसाफ करेगा।—लूका 8:17 पढ़िए।

23. (क) अबीगैल को और क्या आशीष मिली? (ख) कैसे पता चलता है कि ऐसी आशीष पाकर वह घमंड से नहीं फूली?

23 अबीगैल को एक और आशीष मिलनेवाली थी। जब दाविद को पता चला कि नाबाल मर गया है तो उसने अबीगैल के पास शादी का प्रस्ताव भेजा। अबीगैल ने कहा, “तेरी यह दासी अपने मालिक के सेवकों के पैर धोने के लिए तैयार है।” दाविद की पत्नी बनने के खयाल से वह घमंड से नहीं फूली बल्कि नम्र बनी रही। यहाँ तक कि वह दाविद के सेवकों की दासी बनने के लिए तैयार थी! एक बार फिर वह दाविद से मिलने के लिए फौरन तैयार हो गयी।—1 शमू. 25:39-42.

24. (क) अपनी नयी ज़िंदगी में अबीगैल ने किन चुनौतियों का सामना किया? (ख) उसके परमेश्वर यहोवा और उसके पति दाविद ने उसे किस नज़र से देखा?

 24 यह कोई राजा-रानी की कहानी नहीं जिसमें शादी के बाद दोनों की ज़िंदगी फूलों की सेज बन जाती है। दाविद और अबीगैल के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए होंगे। दाविद की पहले ही एक पत्नी थी, अहिनोअम। हालाँकि उस ज़माने में परमेश्वर ने एक-से-ज़्यादा पत्नियाँ रखने की इजाज़त दी थी, फिर भी अबीगैल जैसी वफादार औरतों के लिए ऐसे परिवार में रहना एक चुनौती रही होगी। यही नहीं, उस वक्‍त तक दाविद राजा नहीं बना था, इसलिए उसके आगे ज़रूर मुश्किलें और बाधाएँ आयी होंगी। फिर भी एक पत्नी के नाते अबीगैल ने सारी ज़िंदगी दाविद का साथ दिया और उसकी मदद की। बाद में अबीगैल ने दाविद के एक बेटे को जन्म दिया। हालाँकि अबीगैल को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, फिर भी इस दौरान उसने जाना कि उसका पति दाविद उससे प्यार करता है और उसकी हिफाज़त करता है। एक मौके पर जब अबीगैल को अगवा कर लिया गया तो दाविद ने उसे छुड़ाया। (1 शमू. 30:1-19) इस तरह दाविद यहोवा की मिसाल पर चला जो समझ-बूझ से काम लेनेवाली, हिम्मतवाली और वफादार औरतों से प्यार करता और उन्हें अनमोल समझता है।

^ पैरा. 9 यह करमेल, मशहूर करमेल पहाड़ नहीं था जो दूर उत्तर में था और जहाँ बाद में भविष्यवक्ता एलियाह का सामना बाल के भविष्यवक्ताओं से हुआ था। (अध्याय 10 देखें।) इसके बजाय यह करमेल दक्षिण के वीराने के पास का एक नगर था।

^ पैरा. 10 दाविद को शायद लगा हो कि उस इलाके के ज़मींदारों और उनकी भेड़-बकरियों की रक्षा करना, यहोवा की सेवा करना है। क्यों? उन दिनों यहोवा का मकसद था कि अब्राहम, इसहाक और याकूब के वंशज उस देश में रहें। इसलिए विदेशी हमलावरों और लूटमारों से उन्हें बचाना, पवित्र सेवा का एक तरीका था।

^ पैरा. 14 जवान सेवक ने जो इब्रानी शब्द इस्तेमाल किए उनका शाब्दिक अर्थ है, “बलियाल [निकम्मेपन] का बेटा।” बाइबल के दूसरे अनुवादों में यह वाक्य इस तरह लिखा गया है कि नाबाल “किसी की भी सुनने के लिए तैयार नहीं,” इसलिए “उससे बात करना बेकार है।”