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यहोवा के साक्षी

हिंदी

उनके विश्वास की मिसाल पर चलिए

 अध्याय बाईस

वह परीक्षाओं में भी वफादार रहा

वह परीक्षाओं में भी वफादार रहा

1, 2. जब यीशु कफरनहूम में सिखा रहा था तो पतरस ने क्या उम्मीद की होगी, मगर क्या हुआ?

पतरस कफरनहूम के सभा-घर में था। वह लोगों के चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश कर रहा था कि यीशु की बातों का उन पर क्या असर हो रहा है। पतरस इसी शहर में रहता था। यहीं गलील झील के उत्तरी तट पर उसका मछुवाई का कारोबार था। उसके कई दोस्त, रिश्तेदार और जो उसके साथ कारोबार करते थे, सब यहीं रहते थे। पतरस उम्मीद कर रहा था कि उसके शहर के लोग यीशु की बातें सुनकर उसकी तरह समझ जाएँगे कि वही मसीहा है। उसने यह भी सोचा कि जब दुनिया का सबसे महान गुरु यीशु उन्हें परमेश्वर के राज के बारे में सिखाएगा तो वे खुशी से फूले नहीं समाएँगे। मगर अफसोस, ऐसा कुछ नहीं हुआ।

2 इसके उलट, कई लोगों ने यीशु की बात सुनना बंद कर दिया। कुछ लोग कुड़कुड़ाने लगे क्योंकि वे यीशु की बातों से सहमत नहीं थे। मगर पतरस सबसे ज़्यादा यीशु के कुछ चेलों का रवैया देखकर परेशान हो गया। इससे पहले यीशु जब भी कुछ नयी सच्चाइयाँ सिखाता तो उनके चेहरे खिल उठते थे। मगर अब यीशु ने जो नयी बात बतायी उसे सुनकर वे खुश नहीं बल्कि गुस्से में हैं। कुछ ने तो सीधे यीशु से कह दिया कि वह कैसी घिनौनी बात कर रहा है। वे यीशु की और सुनना नहीं चाहते थे, इसलिए वे सभा-घर से चले गए और उन्होंने यीशु के पीछे चलना छोड़ दिया।—यूहन्ना 6:60, 66 पढ़िए।

3. पतरस के विश्वास ने कैसे कई बार उसकी मदद की?

3 पतरस और बाकी प्रेषितों के लिए यह परीक्षा की घड़ी थी। यीशु ने उस दिन जो बातें कही थीं उन्हें पतरस भी पूरी तरह नहीं समझ पाया था। वह जानता था कि यीशु की बातों के पीछे कुछ मतलब छिपा है और उसे जाने बगैर उसकी बातें घिनौनी लग सकती हैं। अब पतरस क्या करता? यह पहली बार नहीं था जब उसकी परीक्षा हुई कि वह अपने मालिक का वफादार रहेगा या नहीं और न ही यह उसकी आखिरी परीक्षा थी। आइए देखें कि पतरस के विश्वास ने कैसे उसे ऐसी परीक्षाओं का सामना करने और वफादार बने रहने में मदद दी।

जब दूसरे वफादार नहीं रहे तब भी वफादार रहा

4, 5. यीशु ने अकसर कैसी बातें कहीं और कैसे काम किए जिससे लोग दंग रह जाते थे?

4 पतरस अकसर यीशु की बातों और उसके कामों से दंग रह जाता था। यीशु  अकसर ऐसी बात कहता या ऐसे काम करता जो लोगों की उम्मीदों से हटकर होता था। एक दिन पहले की ही बात है। यीशु ने चमत्कार से हज़ारों लोगों को खाना खिलाया था। यह देखकर लोगों ने उसे राजा बनाने की कोशिश की। मगर वह उनसे दूर चला गया और अपने चेलों से भी कहा कि वे नाव पर चढ़कर कफरनहूम चले जाएँ। यह देखकर लोग हैरान रह गए। फिर रात को जब चेले गलील झील में आए तूफान में उस पार जाने की कोशिश कर रहे थे तो यीशु ने पानी पर चलकर एक बार फिर चेलों को हैरत में डाल दिया। उसने पतरस को विश्वास के बारे में एक ज़रूरी सीख भी दी।

5 सुबह होने पर चेलों ने देखा कि लोगों की वह भीड़ नावों पर चढ़कर उस पार चेलों के पीछे-पीछे चली आयी है। मगर यह भीड़ शायद यीशु से सीखने के इरादे से नहीं बल्कि इसलिए आयी थी कि वह फिर से चमत्कार करके उन्हें खिलाए। इसलिए यीशु ने उन्हें झिड़का। (यूह. 6:25-27) उसने कफरनहूम के सभा-घर में इसी विषय से जुड़ी और भी बातें बतायीं और फिर एक ऐसी सच्चाई बतायी जो बहुत अहम थी, मगर जिसे सुनकर लोग चौंक गए!

6. यीशु ने कौन-सी मिसाल दी और यह सुनकर लोगों ने क्या किया?

6 यीशु नहीं चाहता था कि लोग सिर्फ खाने के लिए उसके पास आएँ। वह चाहता था कि वे यह बात समझें कि अगर वे यीशु के बलिदान पर विश्वास करें और उसकी मिसाल पर चलें तो परमेश्वर उन्हें हमेशा की ज़िंदगी देगा। इसलिए उसने एक मिसाल दी। उसने खुद की तुलना मन्ना से की जो मूसा के दिनों में स्वर्ग से मिलनेवाला खाना था। जब कुछ लोगों ने इस बात पर एतराज़ किया तो उसने एक और मिसाल देते हुए खुलकर कहा कि जीवन पाने के लिए उन्हें उसका माँस खाना होगा और खून पीना होगा। यह सुनते ही वे भड़क उठे। उनमें से कुछ कहने लगे, “यह कैसी घिनौनी बात है, कौन इसे सुनेगा?” यीशु के बहुत-से चेलों ने भी फैसला किया कि वे उसके पीछे नहीं चलेंगे। *यूह. 6:48-60, 66.

7, 8. (क) पतरस यीशु के बारे में क्या बात अब तक समझ नहीं पाया था? (ख) यीशु के सवाल का पतरस ने क्या जवाब दिया?

7 मगर पतरस ने क्या किया? यीशु की बात सुनकर वह भी उलझन में पड़ गया होगा। वह अब तक नहीं समझ पाया था कि परमेश्वर की मरज़ी पूरी करने के लिए यीशु को मरना होगा। क्या पतरस ने सोचा कि वह भी यीशु को छोड़कर चुपचाप चला जाएगा? नहीं। पतरस में एक खास गुण था जिस वजह से वह उन लोगों से अलग था। वह गुण क्या था?

8 यीशु ने प्रेषितों की तरफ मुड़कर कहा, “क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?” (यूह. 6:67) उसने यह सवाल बारहों से पूछा था मगर जवाब पतरस ने दिया। अकसर वही बाकी प्रेषितों से पहले बोलता था। शायद वह उन सबमें उम्र में बड़ा था। चाहे वह बड़ा  था या नहीं, एक बात पक्की है कि वह अपने मन की बात कहने से कभी नहीं झिझकता था। और इस मौके पर उसने जो मन की बात कही वह बहुत बढ़िया थी और आज तक मशहूर है। उसने कहा, “प्रभु, हम किसके पास जाएँ? हमेशा की ज़िंदगी की बातें तो तेरे ही पास हैं।”—यूह. 6:68.

9. पतरस कैसे यीशु का वफादार रहा?

9 क्या पतरस की कही यह बात आपके दिल को छू नहीं जाती? उसके विश्वास ने उसे एक अनमोल गुण पैदा करने में मदद दी और वह था वफादारी। पतरस साफ देख सकता था कि सिर्फ यीशु ही यहोवा का भेजा उद्धारकर्ता है और वह परमेश्वर के राज के बारे में जो सिखाता है उन्हीं को मानने से उद्धार मिल सकता है। पतरस जानता था कि यीशु की कही कुछ बातें भले ही उसे समझ में न आएँ, मगर यीशु को छोड़ किसी और के ज़रिए उसे परमेश्वर की मंज़ूरी और हमेशा की ज़िंदगी नहीं मिल सकती थी।

हमें यीशु की शिक्षाएँ माननी चाहिए, फिर चाहे वे हमारी सोच या पसंद के मुताबिक न हों

10. हम कैसे पतरस की तरह वफादार रह सकते हैं?

10 क्या आप भी ऐसा ही महसूस करते हैं? आज दुनिया में बहुत-से लोग यीशु से प्यार करने का दावा करते हैं मगर अफसोस, वे उसके वफादार नहीं हैं। सही मायनों में मसीह के वफादार रहने के लिए पतरस की तरह हमें उसकी शिक्षाओं से लगाव रखना चाहिए। हमें उनके बारे में सीखना चाहिए, उनका मतलब समझना चाहिए और उनके मुताबिक जीना चाहिए, फिर चाहे वे हमारी सोच या पसंद के मुताबिक न हों। वफादार रहने से ही हम हमेशा की ज़िंदगी पा सकते हैं, जो यीशु हमारे लिए चाहता है।—भजन 97:10 पढ़िए।

जब उसकी सोच सुधारी गयी तब भी वफादार रहा

11. यीशु अपने चेलों को लेकर कहाँ गया? (फुटनोट भी देखें।)

11 इसके कुछ ही समय बाद, यीशु अपने प्रेषितों और कुछ चेलों को लेकर दूर उत्तर की तरफ जाने लगा। वादा किए गए देश की उत्तरी सरहद में बर्फ से ढका हेरमोन पहाड़ था, जो कभी-कभी गलील झील से दिखायी देता था। जब यीशु और उसके चेले पहाड़ी रास्ते से होते हुए कैसरिया फिलिप्पी के पास के गाँवों की तरफ जाने लगे, तो वे हेरमोन पहाड़ के और भी नज़दीक पहुँचने लगे और इस वजह से यह पहाड़ और भी बड़ा दिखने लगा। * दूसरी तरफ, वादा किए देश के दक्षिण का ज़्यादातर हिस्सा दिखायी देता था। चारों तरफ का नज़ारा बहुत ही खूबसूरत था और वहीं पर यीशु ने चेलों से एक अहम सवाल किया।

12, 13. (क) यीशु क्यों जानना चाहता था कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं? (ख) पतरस के जवाब से कैसे पता चलता है कि उसका विश्वास सच्चा था?

12 यीशु ने उनसे पूछा, “लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं, मैं कौन हूँ?” हम कल्पना  कर सकते हैं कि पतरस यीशु की आँखों में देख रहा है जो जवाब सुनने के लिए बेताब हैं। वह महसूस कर सकता था कि उसका मालिक हमेशा की तरह उनके साथ कितने प्यार से पेश आ रहा है और कितना समझदार और बुद्धिमान है। यीशु जानना चाहता था कि लोग उसकी शिक्षाएँ सुनने और उसके काम देखने के बाद उसके बारे में क्या सोच रहे हैं। यीशु के चेलों ने उसे बताया कि उसके बारे में लोगों की क्या-क्या गलत धारणाएँ हैं। अब यीशु ने उनसे एक और सवाल पूछा। वह जानना चाहता था कि क्या उसके करीबी चेलों को भी ऐसी गलतफहमियाँ हैं। उसने पूछा, “लेकिन तुम क्या कहते हो, मैं कौन हूँ?”—लूका 9:18-20.

13 इस बार भी पतरस ने ही सबसे पहले जवाब दिया। वहाँ मौजूद ज़्यादातर चेलों के मन में जो था वही बात पतरस ने साफ शब्दों में और बेझिझक होकर कही, “तू मसीह है, जीवित परमेश्वर का बेटा।” हम कल्पना कर सकते हैं कि यह जवाब सुनकर यीशु के चेहरे पर कैसी मुस्कान खिल उठी होगी और उसने प्यार से पतरस को शाबाशी दी। यीशु ने पतरस को याद दिलाया कि यह अहम सच्चाई किसी इंसान ने नहीं बल्कि यहोवा परमेश्वर ने उन लोगों पर ज़ाहिर की है जिनका विश्वास सच्चा है। यहोवा ने पतरस को एक ऐसी सच्चाई समझने में मदद दी थी जो अब तक बतायी गयी अहम सच्चाइयों में से एक है। वह थी कि यीशु ही वह मसीहा है जिसका लंबे अरसे पहले वादा किया गया था!—मत्ती 16:16, 17 पढ़िए।

14. यीशु ने पतरस को कौन-सी खास ज़िम्मेदारियाँ सौंपी?

14 बहुत समय पहले एक भविष्यवाणी में बताया गया था कि मसीहा वह पत्थर होगा जिसे राजमिस्त्री ठुकरा देंगे। (भज. 118:22; लूका 20:17) इस तरह की भविष्यवाणियों को ध्यान में रखकर यीशु ने बताया कि यहोवा इसी पत्थर या चट्टान पर मंडली खड़ी करेगा जिसे पतरस ने मसीह कहा। इसके बाद उसने पतरस को मंडली की कुछ खास ज़िम्मेदारियाँ सौंपी। उसने पतरस को बाकी प्रेषितों से ऊँचा पद नहीं दिया, जैसा कि कुछ लोगों का मानना है बल्कि उसे कुछ ज़िम्मेदारियाँ दीं। उसने पतरस को “राज की चाबियाँ” दीं। (मत्ती 16:19) पतरस को यह सम्मान मिलता कि वह तीन समूहों के लिए परमेश्वर के राज में दाखिल होने के मौके का दरवाज़ा खोले। वह सबसे पहले यहूदियों के लिए, फिर सामरियों के लिए और आखिर में गैर-यहूदियों के लिए यह दरवाज़ा खोलता।

15. पतरस ने यीशु को झिड़कते हुए क्या कहा और क्यों?

15 मगर बाद में यीशु ने यह भी कहा कि जिन्हें बहुत दिया जाएगा उनसे बहुत का हिसाब लिया जाएगा। पतरस भी उनमें से एक था जिन्हें बहुत दिया गया था। (लूका 12:48) यीशु ने चेलों को मसीहा के बारे में और भी कई अहम सच्चाइयाँ बतायीं, जैसे उसे बहुत जल्द दुख सहना पड़ेगा और यरूशलेम में मार डाला जाएगा। यह सुनकर  पतरस परेशान हो गया। वह यीशु को अलग ले गया और उसे झिड़कने लगा, “प्रभु खुद पर दया कर, तेरे साथ ऐसा कभी नहीं होगा।”—मत्ती 16:21, 22.

16. (क) यीशु ने पतरस की सोच कैसे सुधारी? (ख) यीशु की बात से हम सबको क्या सीख मिलती है?

16 पतरस ने नेक इरादे से यीशु को झिड़का था, इसलिए यीशु का जवाब सुनकर वह ज़रूर चौंक गया होगा। यीशु ने पतरस से मुँह फेरकर बाकी चेलों को देखा, जो शायद पतरस की तरह ही सोच रहे थे और कहा, “अरे शैतान, मेरे सामने से दूर हो जा! तू मेरे लिए ठोकर की वजह है क्योंकि तेरी सोच परमेश्वर जैसी नहीं, बल्कि इंसानों जैसी है।” (मत्ती 16:23; मर. 8:32, 33) यीशु की इस बात से हम सबको सीख मिलती है। परमेश्वर का नज़रिया रखने के बजाय हम बड़ी आसानी से इंसानी नज़रिया अपना सकते हैं। अगर हम ऐसा करें तो हम भले ही दूसरों की मदद करने के इरादे से सलाह दें, हम अनजाने में उन्हें वह काम करने का बढ़ावा दे रहे होंगे जो शैतान चाहता है, न कि परमेश्वर। मगर अब सवाल है कि यीशु की बात सुनकर पतरस ने क्या किया?

17. यीशु ने पतरस से जो कहा उसका क्या मतलब था?

17 पतरस समझ गया होगा कि यीशु यह नहीं कह रहा था कि वह शैतान जितना दुष्ट है। यीशु ने शैतान को ठुकरा दिया था, मगर उसने पतरस को नहीं ठुकराया। (मत्ती 4:10) वह देख सकता था कि इस प्रेषित में कई अच्छे गुण हैं। उसने बस इस मामले में पतरस की गलत सोच सुधारी। पतरस को यीशु के सामने बाधाएँ डालने के बजाय उसका साथ देना था।

अगर हम नम्रता से सलाह मानें और खुद में सुधार करें तो हम यीशु और उसके पिता यहोवा के और करीब आते जाएँगे

18. (क) पतरस ने कैसे वफादारी का सबूत दिया? (ख) हम उसकी मिसाल पर कैसे चल सकते हैं?

18 क्या पतरस, यीशु से बहस करने लगा, गुस्सा हो गया या बुरा मान गया? नहीं, उसने नम्रता से सलाह कबूल की। इस तरह उसने एक और बार अपनी वफादारी का सबूत दिया। मसीह के पीछे चलनेवाले सभी लोगों को समय-समय पर सुधार करने की ज़रूरत होती है। अगर हम नम्रता से सलाह मानें और खुद में सुधार करें तो हम यीशु मसीह और उसके पिता यहोवा के और करीब आते जाएँगे।—नीतिवचन 4:13 पढ़िए।

जब पतरस की सोच सुधारी गयी तब भी वह वफादार रहा

उसे वफादारी का इनाम मिला

19. (क) यीशु की किस बात से चेले दंग रह गए? (ख) पतरस ने क्या सोचा होगा?

19 यीशु ने कुछ देर बाद एक और बात कही जिसे सुनकर चेले दंग रह गए। उसने कहा, “मैं तुमसे सच कहता हूँ कि यहाँ जो खड़े हैं, उनमें से कुछ ऐसे हैं जो तब तक मौत का मुँह नहीं देखेंगे, जब तक कि वे इंसान के बेटे को उसके राज में आता हुआ न देख लें।” (मत्ती 16:28) यह सुनकर पतरस की उत्सुकता ज़रूर जागी होगी। आखिर यीशु के कहने का क्या मतलब है? शायद पतरस ने सोचा होगा कि वह उन  लोगों में से नहीं होगा जिन्हें यह खास सम्मान मिलेगा, क्योंकि अभी-अभी उसे कड़ी सलाह दी गयी थी।

20, 21. (क) बताइए कि पतरस ने क्या दर्शन देखा। (ख) दर्शन में तीनों के बीच जो बातचीत हुई उससे पतरस क्या समझ गया?

20 मगर करीब एक हफ्ते बाद यीशु याकूब, यूहन्ना और पतरस को लेकर “एक ऊँचे पहाड़” पर गया, जो शायद हेरमोन पहाड़ था और कुछ किलोमीटर दूर था। शायद रात का समय था क्योंकि तीनों चेलों को बहुत नींद आ रही थी। मगर जब यीशु प्रार्थना करने लगा तो कुछ ऐसा हुआ कि उनकी नींद उड़ गयी।—मत्ती 17:1; लूका 9:28, 29, 32.

21 उनकी आँखों के सामने यीशु का रूप बदलने लगा। उसका चेहरा धीरे-धीरे चमकने लगा और सूरज जितना तेज़ दमकने लगा। उसके कपड़े भी सफेद होकर जगमगाने लगे। फिर यीशु के पास दो आदमी दिखायी दिए। एक मूसा जैसा लग रहा था और दूसरा एलियाह जैसा। वे दोनों यीशु से उसकी “विदाई के बारे में बात करने लगे, जो बहुत  जल्द यरूशलेम से होनेवाली थी।” वे शायद यीशु की मौत और उसके ज़िंदा होने की बात कर रहे थे। अब पतरस समझ गया कि उसने जो सोचा था वह गलत था कि यीशु को दुख नहीं सहना पड़ेगा और न ही मरना पड़ेगा।—लूका 9:30, 31.

22, 23. (क) पतरस ने कैसे दिखाया कि उसमें जोश और दूसरों के लिए परवाह है? (ख) उस रात पतरस, याकूब और यूहन्ना को और कौन-सी आशीष मिली?

22 पतरस को लगा कि इस अनोखे दर्शन में उसे भी किसी तरह हिस्सा लेना चाहिए और शायद इसलिए भी ताकि दर्शन ज़्यादा देर तक रहे। जब ऐसा लगा कि मूसा और एलियाह यीशु के पास से जा रहे हैं तो पतरस ने कहा, “गुरु, हम बहुत खुश हैं कि हम यहाँ आए। इसलिए हमें तीन तंबू खड़े करने दे, एक तेरे लिए, एक मूसा के लिए और एक एलियाह के लिए।” मूसा और एलियाह को मरे एक लंबा अरसा बीत चुका था, इसलिए दर्शन में दिखाए गए दोनों आदमियों को तंबुओं की ज़रूरत नहीं थी। दरअसल पतरस नहीं जानता था कि वह क्या कह रहा है। फिर भी जब आप देखते हैं कि उसमें कितना जोश था और उसे दूसरों की कितनी परवाह थी, तो क्या वह आपके दिल को नहीं भा जाता?—लूका 9:33.

पतरस को याकूब और यूहन्ना के साथ एक रोमांचक दर्शन देखने का सम्मान मिला

23 उस रात पतरस, याकूब और यूहन्ना को एक और आशीष मिली। एक बादल उभरा और उन पर छा गया। उस बादल में से एक आवाज़ आयी। वह यहोवा परमेश्वर की आवाज़ थी! उसने कहा, “यह मेरा बेटा है, जिसे मैंने चुना है। इसकी सुनो।” इसके बाद दर्शन खत्म हो गया और वे और यीशु पहाड़ पर रह गए।—लूका 9:34-36.

24. (क) दर्शन से पतरस को क्या फायदा हुआ? (ख) हम उस दर्शन से कैसे फायदा पा सकते हैं?

24 यीशु के रूप बदलने का दर्शन देखना पतरस के लिए एक बड़ा सम्मान था। सालों बाद उसने इस सम्मान के बारे में लिखा कि उस रात उसने एक झलक पायी कि स्वर्ग में यीशु एक राजा के नाते कितनी महिमा पाएगा। पतरस को उन लोगों में से एक होने का मौका मिला जो यीशु की “शानदार महिमा के चश्मदीद गवाह थे।” उस दर्शन से यह बात पुख्ता हुई कि परमेश्वर के वचन की बहुत-सी भविष्यवाणियाँ ज़रूर पूरी होंगी और पतरस का विश्वास भी मज़बूत हुआ ताकि वह आनेवाली परीक्षाओं में धीरज धर सके। (2 पतरस 1:16-19 पढ़िए।) उस दर्शन से आज हमें भी फायदा हो सकता है, बशर्ते हम पतरस की तरह यीशु के वफादार रहें जिसे यहोवा ने हमारा मालिक ठहराया है, उससे सीखते रहें, उसकी सलाह मानकर सुधार करें और नम्रता से उसके पीछे चलते रहें।

^ पैरा. 6 एक दिन पहले ही इस भीड़ ने जोश में आकर कहा था कि यीशु परमेश्वर का भविष्यवक्ता है, मगर अब सभा-घर में यीशु की बातें सुनकर वे कितनी जल्दी बदल गए। इससे पता चलता है कि उनका मन कितना डाँवाँडोल था।—यूह. 6:14

^ पैरा. 11 गलील झील समुद्र-तल से करीब 700 फुट नीचे था। यीशु और चेले 50 किलोमीटर दूर सफर करते हुए उन गाँवों में गए जो समुद्र-तल से 1,150 फुट ऊँचाई पर थे। सफर के दौरान वे ऐसे कई इलाकों से गुज़रे जहाँ के नज़ारे बहुत ही खूबसूरत थे।