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यहोवा के साक्षी

हिंदी

उनके विश्वास की मिसाल पर चलिए

 अध्याय सात

वह “यहोवा के सामने बढ़ने लगा”

वह “यहोवा के सामने बढ़ने लगा”

1, 2. (क) शमूएल ने कब और कहाँ इसराएलियों से बात की? (ख) उसे क्यों उन्हें पश्‍चाताप करने का बढ़ावा देना था?

शमूएल अपने इसराएली लोगों का चेहरा देख रहा था जो उसके कहने पर गिलगाल शहर में इकट्ठा हुए थे। शमूएल, परमेश्वर का वफादार सेवक था और बरसों से एक भविष्यवक्ता और न्यायी रहा था। उस वक्‍त गरमी का मौसम था। आज के कैलेंडर के हिसाब से शायद मई या जून का महीना रहा होगा। खेतों में गेहूँ की सुनहरी फसलें कटाई के लिए तैयार खड़ी थीं। इसराएली शमूएल के सामने खामोश खड़े थे। अब शमूएल ऐसा क्या कहता कि उसकी बातें उनके दिल तक पहुँचे?

2 इसराएलियों की आँखों पर परदा पड़ा था। वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनके हालात कितने नाज़ुक हैं। उन्होंने शमूएल से ज़िद की थी कि उन पर राज करने के लिए वह एक राजा चुने। उन्हें ज़रा भी एहसास नहीं था कि राजा की माँग करके वे अपने परमेश्वर यहोवा और उसके भविष्यवक्ता का घोर अनादर कर रहे थे। दरअसल वे यहोवा को अपना राजा मानने से इनकार कर रहे थे! अब शमूएल उन्हें कैसे अपनी गलती का एहसास दिलाता ताकि वे पश्‍चाताप करते?

शमूएल के बचपन की घटनाओं से हम सीखते हैं कि बुरे माहौल में रहते हुए भी हम यहोवा पर विश्वास मज़बूत कर सकते हैं

3, 4. (क) शमूएल ने अपने बचपन के बारे में क्यों बताया? (ख) उसके विश्वास की मिसाल क्यों हमारे लिए फायदेमंद है?

3 शमूएल ने भीड़ से कहा, “मैं तो बूढ़ा हो चुका हूँ, मेरे बाल पक गए हैं।” उसके सफेद बालों की वजह से उसकी बातों में वज़न था। फिर उसने कहा, “मैं बचपन से लेकर आज तक तुम लोगों की अगुवाई करता आया हूँ।” (1 शमू. 11:14, 15; 12:2) हालाँकि शमूएल बूढ़ा हो गया था, फिर भी वह अपना बचपन नहीं भूला था। बचपन की यादें अब भी उसके दिलो-दिमाग में ताज़ा थीं। उस वक्‍त उसने जो फैसले लिए उनकी वजह से वह बरसों-बरस अपने परमेश्वर यहोवा पर विश्वास बनाए रख सका और उसकी भक्‍ति कर सका।

 4 शमूएल ऐसे लोगों के बीच रहता था जिन्हें परमेश्वर पर विश्वास नहीं था और जो परमेश्वर के वफादार नहीं थे। फिर भी वह लगातार अपना विश्वास बढ़ाता रहा और उसे बरकरार रखा। आज हमारे लिए भी अपना विश्वास बढ़ाना एक चुनौती है, क्योंकि हम ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ लोगों को परमेश्वर पर विश्वास नहीं है और वे भ्रष्ट हैं। (लूका 18:8 पढ़िए।) आइए देखें कि हम शमूएल से क्या सीख सकते हैं। चलिए पहले उसके बचपन पर गौर करें।

‘छोटा लड़का जो यहोवा के सामने सेवा करता था’

5, 6. (क) शमूएल का बचपन कैसे अनोखा था? (ख) उसके माता-पिता को क्यों यकीन था कि पवित्र डेरे में उसकी अच्छी देखभाल होगी?

5 शमूएल का बचपन बहुत अनोखा था। जब उसकी उम्र शायद तीन साल या उससे थोड़ी ज़्यादा थी तब उसका दूध छुड़ाया गया और उसके कुछ ही समय बाद वह शीलो में परमेश्वर के पवित्र डेरे में सेवा करने लगा। शमूएल का घर वहाँ से करीब 30 किलोमीटर दूर रामाह में था। उसके पिता एलकाना और माँ हन्ना ने उसे एक खास सेवा के लिए यानी नाज़ीर बनकर जीवन-भर यहोवा की सेवा करने के लिए अर्पित कर दिया था। * क्या इसका यह मतलब था कि शमूएल के माँ-बाप उससे प्यार नहीं करते थे, इसलिए उन्होंने उसे अपने से दूर कर दिया था?

6 नहीं, ऐसी बात नहीं थी। वे जानते थे कि पवित्र डेरे में उनके बेटे की अच्छी देखभाल होगी। वहाँ शमूएल, महायाजक एली के साथ काम करता जिसकी निगरानी में वहाँ का सारा कामकाज होता था। वहाँ कई औरतें भी थीं जो शायद ठहराए गए इंतज़ाम के मुताबिक डेरे से जुड़े कई काम करती थीं।—निर्ग. 38:8; न्यायि. 11:34-40.

7, 8. (क) शमूएल के माता-पिता ने साल-दर-साल उसका हौसला कैसे बढ़ाया? (ख) उनसे आज के माता-पिता क्या सीख सकते हैं?

7 इतना ही नहीं, हन्ना और एलकाना अपने प्यारे बेटे को कभी नहीं भूले जो परमेश्वर से मिन्नत करने पर उन्हें मिला था। हन्ना ने यहोवा से एक बेटा माँगा था और वादा किया था कि वह हमेशा के लिए उसे पवित्र सेवा में दे देगी। वह हर साल जब शीलो जाती तो उसके लिए बिन आस्तीन का नया बागा ले जाती जिसे वह खुद बनाती थी ताकि डेरे में सेवा करते वक्‍त वह उसे पहन सके। छोटे शमूएल को अपने माता-पिता से मिलकर बेहद खुशी होती होगी। वे उसे सही मार्गदर्शन देते होंगे और बताते होंगे कि पवित्र डेरे में यहोवा की सेवा करना कितना बड़ा सम्मान है। वाकई इन सब बातों से उसका हौसला बढ़ा होगा।

8 आज माता-पिता, हन्ना और एलकाना से बहुत कुछ सीख सकते हैं। कई माता-पिता अपनी सारी ताकत बच्चों को बढ़िया-से-बढ़िया सहूलियतें देने में लगा देते हैं, बजाय इसके कि उन्हें यहोवा के करीब आने में मदद दें। लेकिन शमूएल के माँ-बाप ने सबसे पहले यहोवा के साथ मज़बूत रिश्ता बनाने में परिवार की मदद की और इसका शमूएल पर अच्छा असर हुआ। वह आगे चलकर परमेश्वर का वफादार सेवक बना।—नीतिवचन 22:6 पढ़िए।

9, 10. (क) पवित्र डेरे का वर्णन कीजिए और बताइए कि उसे देखकर छोटे शमूएल को कैसा लगता होगा। (फुटनोट भी देखें।) (ख) शमूएल को वहाँ क्या काम दिया गया था? (ग) आपको क्या लगता है, आज बच्चे उसकी मिसाल पर कैसे चल सकते हैं?

 9 हम कल्पना कर सकते हैं कि जैसे-जैसे शमूएल बड़ा होता गया वह शीलो के आस-पास की पहाड़ियों पर घूमने जाता होगा। वह इन पहाड़ियों से एक तरफ देखता होगा और नीचे बसे शहर पर और दूर-दूर तक फैली घाटी पर नज़र दौड़ाता होगा। जब उसकी नज़र पवित्र डेरे पर पड़ती होगी तो खुशी से उसकी आँखें चमक उठती होंगी और उसे गर्व होता होगा। वह डेरा करीब 400 साल पहले मूसा की निगरानी में बनाया गया था और बहुत पवित्र था। * पूरी दुनिया में वह यहोवा की शुद्ध उपासना की खास जगह थी।

10 धीरे-धीरे पवित्र डेरे से शमूएल का लगाव बढ़ता गया। बाद में उसने जो ब्यौरा लिखा उसमें हम पढ़ते हैं, “शमूएल अभी छोटा लड़का ही था, फिर भी वह मलमल का एपोद पहनकर यहोवा के सामने सेवा करता था।” (1 शमू. 2:18) शमूएल का एपोद यानी बिन आस्तीन का सादा बागा इस बात की निशानी था कि वह डेरे में याजकों की मदद करता था। हालाँकि वह याजकों में से नहीं था, फिर भी उसे पवित्र डेरे में कुछ काम दिया गया था। जैसे, सुबह के वक्‍त डेरे के आँगन का दरवाज़ा खोलना और बूढ़े एली की मदद करना। शमूएल को ये सब करने से बहुत खुशी मिलती थी। लेकिन आगे चलकर यहोवा के भवन में बुरे काम होते देखकर उसका मासूम दिल परेशान हो उठा।

बुरे माहौल में बेदाग रहना

11, 12. (क) होप्नी और फिनेहास की सबसे बड़ी गलती क्या थी? (ख) वे पवित्र डेरे में किस तरह के बुरे काम करते थे? (फुटनोट भी देखें।)

11 छोटी उम्र से ही शमूएल ने पवित्र डेरे में बुरे-बुरे काम होते देखे। एली के दो बेटे थे, होप्नी और फिनेहास। शमूएल ने लिखा, “एली के बेटे दुष्ट थे, उनके दिल में यहोवा के लिए कोई इज़्ज़त नहीं थी।” (1 शमू. 2:12) इस आयत में बतायी दोनों बातों का आपस में गहरा नाता है। होप्नी और फिनेहास इसलिए दुष्ट थे क्योंकि वे यहोवा का आदर नहीं करते थे। वे उसके नेक स्तरों और माँगों को तुच्छ समझते थे। यह उनकी सबसे बड़ी गलती थी और इस वजह से उन्होंने कई सारे पाप किए।

12 परमेश्वर के कानून में साफ बताया गया था कि याजकों को क्या-क्या काम करने हैं और पवित्र डेरे में किस तरह बलिदान चढ़ाने हैं। उन्हें यह सब इसलिए बताया गया था क्योंकि बलिदान चढ़ाने का इंतज़ाम परमेश्वर ने किया था ताकि लोग अपने पापों की माफी पा सकें, उसकी नज़रों में शुद्ध ठहरें और उससे आशीष और मार्गदर्शन पाने के लायक  बनें। लेकिन होप्नी और फिनेहास ने उन बलिदानों की बेइज़्ज़ती की और उनकी देखा-देखी दूसरे याजक भी ऐसा ही करने लगे। *

13, 14. (क) डेरे में होनेवाले दुष्ट कामों से मासूम लोगों पर कैसा असर हुआ होगा? (ख) एली कैसे महायाजक और पिता की ज़िम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा?

13 कल्पना कीजिए, यह सब देखकर छोटे शमूएल को कैसा लगा होगा। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ होगा कि पवित्र डेरे में ऐसे बड़े-बड़े अपराध हो रहे हैं और कोई उन्हें रोक भी नहीं रहा है। उसने न जाने कितने ही गरीब, लाचार और टूटे मनवालों को पवित्र डेरे से निराश और अपमानित लौटते देखा होगा, जो यह आस लिए आते थे कि उन्हें दिलासा और हिम्मत मिलेगी। यही नहीं, जब शमूएल को मालूम पड़ा कि होप्नी और फिनेहास सही चालचलन के मामले में भी यहोवा के नियमों को तोड़ रहे हैं और पवित्र डेरे में सेवा करनेवाली औरतों के साथ संबंध रख रहे हैं तब उसके दिल पर क्या बीती होगी? (1 शमू. 2:22) उसने शायद उम्मीद की होगी कि एली कुछ करेगा।

एली के बेटों के बुरे काम देखकर शमूएल परेशान हो उठा होगा

14 दरअसल एली इस समस्या का हल कर सकता था। वह महायाजक था, इसलिए पवित्र डेरे में जो कुछ हो रहा था उसके लिए वह ज़िम्मेदार था। यही नहीं, वह उन दोनों का पिता था, इसलिए उन्हें सुधारना उसका फर्ज़ था। वे न सिर्फ खुद का नुकसान कर रहे थे बल्कि देश के बेशुमार लोगों को दुख दे रहे थे। लेकिन एली ने न तो महायाजक की ज़िम्मेदारी ठीक से निभायी न ही पिता की। उसने बस अपने बेटों को हलके से झिड़का, जबकि उन्हें सख्ती से सुधारने की ज़रूरत थी। (1 शमूएल 2:23-25 पढ़िए।) वे ऐसे पाप कर रहे थे जिसके लिए वे मौत के लायक थे!

15. (क) यहोवा ने एली को कौन-सा कड़ा संदेश दिया? (ख) यह सुनकर एली के परिवार ने क्या किया?

15 हालात इतने बिगड़ गए कि यहोवा ने अपने “एक सेवक” को एली और उसके परिवार के पास भेजा ताकि वह उन्हें कड़ा संदेश सुनाए कि उन्हें क्या सज़ा दी जाएगी। (वह सेवक एक भविष्यवक्ता था जिसका नाम बाइबल में नहीं दिया गया है।) यहोवा ने उस सेवक के ज़रिए एली से कहा, ‘तू हमेशा मुझसे ज़्यादा अपने बेटों का आदर करता है।’ फिर परमेश्वर ने भविष्यवाणी की कि उसके दोनों बेटे एक ही दिन मारे जाएँगे और उसके परिवार को भारी दुख उठाना पड़ेगा, यहाँ तक कि वह याजकपद खो देगा। क्या ऐसी कड़ी चेतावनी पाकर एली का परिवार बदल गया? ब्यौरे में ऐसा कुछ नहीं बताया गया है कि उन्होंने पश्‍चाताप किया।—1 शमू. 2:27–3:1.

16. (क) शमूएल की तरक्की के बारे में क्या बताया गया है? (ख) यह पढ़कर आपको क्यों अच्छा लगा? समझाइए।

16 इन सारी बुराइयों का छोटे शमूएल पर क्या असर हुआ? इस ब्यौरे में जहाँ एली के  बेटों के बुरे कामों के बारे में बताया गया है, वहीं बीच-बीच में हमें शमूएल के बारे में बढ़िया बातें पढ़ने को मिलती हैं कि वह कैसे बड़ा होता गया और तरक्की करता गया। मिसाल के लिए, 1 शमूएल 2:18 में हम पढ़ते हैं, “शमूएल अभी छोटा लड़का ही था, फिर भी वह मलमल का एपोद पहनकर यहोवा के सामने सेवा करता था।” छोटी उम्र से ही शमूएल ने परमेश्वर की सेवा करना अपनी ज़िंदगी का मकसद बना लिया था। उसी अध्याय की आयत 21 में एक और बात बतायी गयी है, “शमूएल यहोवा के सामने बढ़ने लगा।” वाकई, यह कितनी अच्छी बात है! जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, स्वर्ग में रहनेवाले पिता के साथ उसका रिश्ता मज़बूत होता गया। सच, किसी भी तरह के बुरे असर से बचने का सबसे बढ़िया तरीका है यहोवा के साथ एक करीबी रिश्ता बनाना।

17, 18. (क) मसीही जवान बुरे असर से बचने के लिए शमूएल की मिसाल पर कैसे चल सकते हैं? (ख) क्या दिखाता है कि शमूएल ने सही रास्ता चुना था?

17 शमूएल चाहे तो सोच सकता था कि जब महायाजक एली और उसके बेटे पाप कर सकते हैं तो मैं भी अपनी मन-मरज़ी कर सकता हूँ। मगर उसने ऐसा नहीं सोचा। जब दूसरे बुरे काम करते हैं, फिर चाहे वे ज़िम्मेदारी के पद पर क्यों न हों, तो इसका यह मतलब नहीं कि हमें पाप करने की छूट मिल जाती है। आज कई मसीही जवान, शमूएल की मिसाल पर चलते हैं और ‘यहोवा के सामने बढ़ते जाते हैं,’ ऐसे माहौल में भी जब कुछ लोग उनके आगे बुरी मिसाल रखते हैं।

18 शमूएल ने जो रास्ता चुना उसका क्या नतीजा हुआ? बाइबल बताती है, “लड़का शमूएल डील-डौल में बढ़ता गया और यहोवा और लोगों का चहेता बनता गया।” (1 शमू. 2:26) जी हाँ, शमूएल को सब लोग बहुत पसंद करते थे, खासकर वे जिनकी राय मायने रखती थी। इतना ही नहीं, यहोवा भी उसे अनमोल समझता था क्योंकि वह उसका वफादार बना रहा। शमूएल को यकीन था कि परमेश्वर शीलो में हो रही बुराइयों को ज़रूर मिटाएगा। मगर उसने शायद सोचा होगा कि कब। एक रात उसे इसका जवाब मिल गया।

 ‘बोल, तेरा सेवक सुन रहा है’

19, 20. (क) बताइए कि एक रात डेरे में शमूएल के साथ क्या हुआ। (ख) शमूएल, एली के साथ कैसे पेश आता था? (ग) शमूएल को कैसे पता चला कि कौन उसे पुकार रहा है?

19 सुबह होने में अब थोड़ा ही वक्‍त बचा था, फिर भी चारों तरफ अँधेरा था। डेरे में रखी बड़ी दीवट अब भी जल रही थी। रात के सन्नाटे में शमूएल को एक आवाज़ सुनायी दी जो उसका नाम पुकार रही थी। उसे लगा कि एली उसे बुला रहा है जो बहुत बूढ़ा हो चुका था और उसे कुछ दिखायी नहीं देता था। शमूएल उठा और “दौड़कर” एली के पास गया। कल्पना कीजिए, शमूएल कैसे नंगे पैर दौड़कर गया होगा। उसने सोचा कि शायद एली को कुछ मदद चाहिए। यह बात हमारे दिल को छू जाती है कि वह एली की कितनी इज़्ज़त करता था और उसकी मदद करने के लिए हरदम तैयार रहता था! वह जानता था कि एली में भले ही बहुत-सी खामियाँ हैं, फिर भी वह यहोवा का ठहराया महायाजक है।—1 शमू. 3:2-5.

20 शमूएल ने एली को नींद से जगाया और कहा, “तूने मुझे बुलाया?” लेकिन एली ने कहा कि उसने उसे नहीं बुलाया और वह जाकर वापस सो जाए। इसके बाद, कई बार शमूएल को आवाज़ सुनायी दी और वह हर बार दौड़ता हुआ एली के पास गया। आखिरकार एली समझ गया कि बात क्या है। उन दिनों यहोवा की तरफ से दर्शन या संदेश मिलना बहुत कम हो गया था और इसकी वजह साफ थी। लेकिन अब यहोवा अपने लोगों से दोबारा बात करना चाहता था और वह भी इस छोटे लड़के के ज़रिए! इसलिए एली ने शमूएल से कहा कि वह जाकर सो जाए और उसे बताया कि अगर दोबारा आवाज़ सुनायी दे, तो उसे ठीक-ठीक क्या कहना है। शमूएल ने एली की बात मानी। जल्द ही उसे आवाज़ सुनायी दी, “शमूएल, शमूएल!” उसने कहा, “हे परमेश्वर बोल। तेरा सेवक सुन रहा है।”—1 शमू. 3:1, 5-10.

21. (क) आज हम यहोवा की बात कैसे सुन सकते हैं? (ख) हमें क्यों ऐसा करना चाहिए?

21 शीलो में यहोवा को एक सेवक मिल ही गया जो उसकी बात सुनता था। शमूएल ने सारी ज़िंदगी यहोवा की बात सुनी। क्या आप भी यहोवा की बात सुनते हैं? इसके लिए ज़रूरी नहीं कि रात में स्वर्ग से हमें उसकी आवाज़ सुनायी दे। आज एक मायने में हम यहोवा की आवाज़ हमेशा सुन सकते हैं। उसके वचन बाइबल के ज़रिए। हम जितना ज़्यादा परमेश्वर की सुनेंगे और उसके मुताबिक चलेंगे, उतना ज़्यादा हमारा विश्वास बढ़ता जाएगा। शमूएल के साथ भी यही हुआ।

शमूएल डर रहा था, फिर भी उसने एली को यहोवा का न्यायदंड सुनाया

22, 23. (क) शमूएल जो भविष्यवाणी पहले सुनाने से डर रहा था वह कैसे पूरी हुई? (ख) लोग शमूएल के बारे में क्या जानने लगे?

22 उस रात से शमूएल की ज़िंदगी बदल गयी। वह यहोवा के साथ एक खास रिश्ते में बँध गया। वह परमेश्वर का भविष्यवक्ता बन गया और लोगों को उसका संदेश सुनाने लगा। छोटे शमूएल को सबसे पहला संदेश महायाजक एली को सुनाना था। पहले तो वह बहुत डर गया क्योंकि उसे एली को बताना था कि उसके परिवार के बारे में परमेश्वर ने जो भविष्यवाणी की वह जल्द पूरी होनेवाली थी। फिर भी उसने हिम्मत जुटाकर एली को परमेश्वर का न्यायदंड सुनाया। एली ने नम्रता से उसे स्वीकार किया। कुछ ही समय बाद यहोवा की कही एक-एक बात पूरी हुई: इसराएलियों ने पलिश्तियों से युद्ध किया, होप्नी और  फिनेहास एक ही दिन मारे गए और जब एली को खबर मिली कि यहोवा का पवित्र संदूक ज़ब्त कर लिया गया है तो उसकी भी मौत हो गयी।—1 शमू. 3:10-18; 4:1-18.

23 इसके बाद सब लोग जानने लगे कि शमूएल, यहोवा का एक वफादार भविष्यवक्ता है। ब्यौरा बताता है कि “यहोवा उसका साथ देता रहा” और उसने उसकी कही हर भविष्यवाणी पूरी की।—1 शमूएल 3:19 पढ़िए।

“शमूएल ने यहोवा को पुकारा”

24. (क) कुछ समय बाद इसराएलियों ने क्या फैसला किया? (ख) यह क्यों एक घोर पाप था?

24 क्या इसराएली शमूएल की अच्छी मिसाल पर चलकर यहोवा के करीब आए और उसके वफादार रहे? नहीं। कुछ समय बाद उन्होंने फैसला किया कि अब उन्हें एक मामूली भविष्यवक्ता नहीं चाहिए जो उनका न्याय करे। इसके बजाय, दूसरे राष्ट्रों की तरह उन्हें भी एक राजा चाहिए था। यहोवा के कहने पर शमूएल उनकी माँग पूरी करने के लिए तैयार हो गया। लेकिन उसे इसराएलियों को बताना था कि राजा की माँग करके उन्होंने कितना बड़ा पाप किया है। उन्होंने किसी इंसान को नहीं बल्कि यहोवा को ठुकराया है! इसलिए लोगों को उनकी गलती का एहसास दिलाने के लिए शमूएल ने उन्हें गिलगाल में इकट्ठा होने के लिए कहा।

शमूएल ने विश्वास से प्रार्थना की और यहोवा ने उसकी सुनकर ज़ोरदार आँधी चलायी

25, 26. गिलगाल में शमूएल ने कैसे अपने लोगों को एहसास दिलाया कि उन्होंने यहोवा के खिलाफ गंभीर पाप किया है?

25 अब आइए हम उस तनाव-भरे माहौल में बूढ़े शमूएल के साथ हो लें जो इसराएलियों के सामने खड़ा है। वह उन्हें याद दिलाता है कि इतने सालों से वह कैसे वफादारी से सेवा करता आया है। ब्यौरे में लिखा है, “इसके बाद, शमूएल ने यहोवा को पुकारा।” उसने यहोवा से ज़ोरदार आँधी चलाने की बिनती की।—1 शमू. 12:17, 18.

26 लोगों को यह बात अजीब लगी होगी कि इस गरमी के मौसम में शमूएल आँधी की बिनती कर रहा है। उन्हें शायद मन-ही-मन हँसी भी आयी होगी। मगर कुछ ही पलों में उनकी हँसी बंद हो गयी। अचानक आसमान में काले घने बादल छाने लगे। तेज़ हवाओं से गेहूँ की फसलें तबाह होने लगीं। बादलों के गरजन से कान फटने लगे। फिर ज़ोरों की बारिश होने लगी। “यह देखकर सब लोग यहोवा और शमूएल से बहुत डरने लगे।” आखिरकार, वे समझ गए कि उन्होंने कितना गंभीर पाप किया है।—1 शमू. 12:18, 19.

27. यहोवा कैसे उन लोगों की मदद करता है जो शमूएल की तरह उस पर विश्वास करते हैं?

27 यहोवा ने शमूएल की मदद की ताकि शमूएल उन बागियों के दिल तक अपनी बात पहुँचा सके। यहोवा उसके बचपन से उसे ऐसी मदद देता आया था, क्योंकि उसे परमेश्वर पर विश्वास था। यहोवा बदला नहीं है, आज भी वह उन लोगों की मदद करता है जो शमूएल की तरह उस पर विश्वास करते हैं।

^ पैरा. 5 नाज़ीर बनकर सेवा करनेवालों पर शराब पीने और बाल कटवाने की पाबंदी थी। ज़्यादातर लोग कुछ समय के लिए नाज़ीर बनने की मन्नत मानते थे, लेकिन कुछ लोगों को जीवन-भर के लिए नाज़ीर ठहराया गया था, जैसे शिमशोन, शमूएल और यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला।

^ पैरा. 9 पवित्र डेरा एक बड़े तंबू जैसा दिखता था और आयताकार था। यह खास तौर पर लकड़ी से तैयार किया गया था, लेकिन इसमें उम्दा-से-उम्दा चीज़ों का इस्तेमाल किया गया था। जैसे सील मछली की खाल, खूबसूरत कढ़ाईदार कपड़ा और सोने-चाँदी से मढ़ी हुई कीमती लकड़ी। डेरे के चारों तरफ आयताकार आँगन था और आँगन में बलि चढ़ाने के लिए एक भव्य वेदी थी। ज़ाहिर है कि समय के चलते याजकों के इस्तेमाल के लिए डेरे के पास दूसरे कमरे भी बनाए गए थे। शमूएल शायद उन्हीं में से किसी एक कमरे में सोता था।

^ पैरा. 12 ब्यौरे में बताया गया है कि वे दो तरीकों से बलिदानों की बेइज़्ज़ती कर रहे थे। पहला, कानून में बताया गया था कि बलि के जानवर का कौन-सा हिस्सा याजकों को खाने के लिए दिया जाना चाहिए। (व्यव. 18:3) लेकिन पवित्र डेरे में वे दुष्ट याजक कुछ और ही कर रहे थे। वे अपने सेवक भेजते जो उनके कहने पर हाँडी में उबलते गोश्त में एक बड़ा काँटा डालते और जो भी सबसे बढ़िया हिस्सा निकलता उसे ले लेते। दूसरा, जब लोग अपने बलिदान वेदी पर चढ़ाने के लिए लाते तो वे दुष्ट याजक अपने किसी सेवक के ज़रिए उन्हें डराते-धमकाते और यहोवा को चरबी चढ़ाने से पहले ही उनसे कच्चा गोश्त ज़बरदस्ती ले लेते।—लैव्य. 3:3-5; 1 शमू. 2:13-17.