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यहोवा के साक्षी

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क्या आप सच्चाई जानना चाहेंगे?

क्या आप सच्चाई जानना चाहेंगे?

सच्चाई? किस बारे में? ज़िंदगी के उन अहम सवालों के बारे में, जो इंसान सदियों से पूछता आया है। हो सकता है आपके मन में भी ये सवाल उठे हों:

  • क्या परमेश्वर को हमारी कोई परवाह है?

  • क्या युद्ध और दुःख-तकलीफें कभी खत्म होंगी?

  • मरने पर हमारा क्या होता है?

  • हमारे अपने जो मर गए हैं, क्या हम उन्हें दोबारा ज़िंदा देखने की उम्मीद कर सकते हैं?

  • हमें किस तरह प्रार्थना करनी चाहिए? और अगर हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी प्रार्थनाएँ सुने, तो हमें क्या करना होगा?

  • हम सच्ची खुशी कैसे पा सकते हैं?

इन सवालों के जवाब आपको कहाँ मिल सकते हैं? दुनिया में ऐसी हज़ारों किताबें मौजूद हैं, जो इन सवालों के जवाब देने का दावा करती हैं। लेकिन अगर आप उन किताबों को ध्यान से पढ़ें, तो आप पाएँगे कि एक किताब एक बात कहती है, तो दूसरी कुछ और। कई किताबें ऐसी भी हैं, जिनमें दी जानकारी आज के लिए तो कारगर लगती है, मगर वक्‍त के गुज़रते वह दकियानूसी हो जाती है।

लेकिन एक किताब है, जिसमें दिए जवाब बिलकुल भरोसेमंद हैं। यह किताब सच्चाई बयान करती है। यह कौन-सी किताब है? महान पुरुष, यीशु मसीह ने परमेश्वर से प्रार्थना करते वक्‍त कहा था: “तेरा वचन सत्य [“सच्चाई,” हिन्दुस्तानी बाइबल] है।” (यूहन्ना 17:17) इस आयत में यीशु ने जिस “वचन” का ज़िक्र किया, वह आज पवित्र बाइबल के नाम से जाना जाता है। बाइबल ऊपर दिए सभी सवालों के साफ और सही जवाब देती है। आइए आगे के पन्नों पर चंद शब्दों में दिए इन सवालों के जवाब देखें।

 क्या परमेश्वर को हमारी कोई परवाह है?

यह सवाल क्यों उठता है: आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वह बहुत बेरहम है। जहाँ देखो, वहाँ बस नाइंसाफी-ही-नाइंसाफी है। और-तो-और, कुछ धर्म सिखाते हैं कि हम पर आनेवाली सारी दुःख-तकलीफों के लिए परमेश्वर ही ज़िम्मेदार है।

बाइबल सिखाती है: परमेश्वर हमारी दुःख-तकलीफों के लिए बिलकुल भी ज़िम्मेदार नहीं है। बाइबल की एक किताब, अय्यूब 34:10 में लिखा है: “यह सम्भव नहीं कि ईश्वर दुष्टता का काम करे, और सर्वशक्‍तिमान बुराई करे।” इसके बजाय, परमेश्वर ने अपने प्यार का सबूत देते हुए इस धरती को खूबसूरत दुनिया में बदल देने का मकसद ठहराया है, जिसमें सभी लोग शांति से रहेंगे। इसलिए यीशु ने हमें इस तरह प्रार्थना करना सिखाया: “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; . . . तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो।” (मत्ती 6:9, 10) परमेश्वर को, जिसका नाम यहोवा है, हमारी इतनी परवाह है कि उसने अपना मकसद पूरा करने के लिए अपने प्यारे बेटे को इस धरती पर भेजा, ताकि वह इंसानों की खातिर अपनी जान कुरबान कर सके।—यूहन्ना 3:16.

बाइबल की ये आयतें भी पढ़िए: उत्पत्ति 1:26-28; याकूब 1:13; 1 पतरस 5:6, 7.

क्या युद्ध और दुःख-तकलीफें कभी खत्म होंगी?

यह सवाल क्यों उठता है: अनगिनत लोग आज भी युद्ध की वेदी पर बलि चढ़ रहे हैं। और जहाँ तक दुःख-तकलीफों की बात है, तो हममें से शायद ही ऐसा कोई हो जो इसका शिकार न हुआ हो।

बाइबल सिखाती है: परमेश्वर यहोवा ने भविष्यवाणी की है कि वह बहुत जल्द धरती पर राज करेगा और पूरी दुनिया में अमन-चैन लाएगा। उसके राज में ‘लोग युद्ध की विद्या नहीं सीखेंगे।’ इसके बजाय, वे ‘अपनी तलवारें पीटकर हल के फाल बनाएंगे।’ (यशायाह 2:4) उस वक्‍त परमेश्वर दुनिया से नाइंसाफी और दुःख-तकलीफों का नामो-निशान मिटा देगा। बाइबल वादा करती है: “[परमेश्वर] उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं।” यहाँ तक कि आज की नाइंसाफी और दुःख-तकलीफें भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएँगी।—प्रकाशितवाक्य 21:3, 4.

बाइबल की ये आयतें भी पढ़िए: भजन 37:10, 11; 46:9; मीका 4:1-4.

मरने पर हमारा क्या होता है?

यह सवाल क्यों उठता है: दुनिया के ज़्यादातर धर्म सिखाते हैं कि इंसान के अंदर एक आत्मा होती है, जो अमर होती है और इंसान के मरने पर उसके शरीर से निकल जाती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मरे हुओं की आत्मा ज़िंदा लोगों की मदद कर सकती है या उन्हें सता सकती है। इसके अलावा, कुछ ऐसे भी हैं जो यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर, दुष्ट लोगों की आत्माओं को नरक के धधकते कुंड में फेंक देता है, जहाँ उन्हें हमेशा के लिए तड़पाया जाता है।

बाइबल सिखाती है: जब एक इंसान मरता है, तो उसका वजूद पूरी तरह मिट जाता है। बाइबल कहती है: “मरे हुए कुछ भी नहीं जानते।” (सभोपदेशक 9:5) अगर मरे हुए कुछ जानते नहीं और कुछ महसूस नहीं कर सकते, तो वे भला ज़िंदा लोगों को क्या नुकसान पहुँचाएँगे या उनकी क्या मदद करेंगे?—भजन 146:3, 4.

बाइबल की ये आयतें भी पढ़िए: उत्पत्ति 3:19; सभोपदेशक 9:6, 10.

 हमारे अपने जो मर गए हैं, क्या हम उन्हें दोबारा ज़िंदा देखने की उम्मीद कर सकते हैं?

यह सवाल क्यों उठता है: हर इंसान में जीने की चाहत होती है। साथ ही, वह अपने परिवार के संग ज़िंदगी का पूरा मज़ा भी लेना चाहता है। ऐसे में जब उसके किसी अपने की मौत हो जाती है, तो उसे अपनी ज़िंदगी अधूरी-सी लगने लगती है।

बाइबल सिखाती है: यीशु ने वादा किया है कि मरे हुए लोगों को दोबारा ज़िंदा किया जाएगा। (यूहन्ना 5:28, 29) इसके बाद, परमेश्वर उन्हें इसी धरती पर, जो एक खूबसूरत बगीचे में बदल दी जाएगी, जीने का मौका देगा। (यशायाह 65:21-25) उस वक्‍त ज़िंदगी वाकई जीने लायक होगी। परमेश्वर की आज्ञा माननेवाले सभी लोग चुस्त-दुरुस्त होंगे और वे हमेशा-हमेशा के लिए जीएँगे। बाइबल कहती है: “धर्मी लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे, और उस में सदा बसे रहेंगे।”—भजन 37:29.

बाइबल की ये आयतें भी पढ़िए: अय्यूब 14:14, 15; लूका 7:11-17; प्रेरितों 24:15.

हमें किस तरह प्रार्थना करनी चाहिए? और अगर हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी प्रार्थनाएँ सुने, तो हमें क्या करना होगा?

यह सवाल क्यों उठता है: लगभग सभी धर्मों के लोग प्रार्थना या पूजा-पाठ करते हैं। मगर फिर भी, कइयों को लगता है कि परमेश्वर उनकी प्रार्थनाओं का जवाब नहीं देता।

बाइबल सिखाती है: यीशु ने सिखाया कि हमें रटी-रटायी प्रार्थनाएँ नहीं करनी चाहिए। उसने कहा: ‘जब तू प्रार्थना करे, तो वही बातें न दोहरा।’ (मत्ती 6:7, NHT) अगर हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं को सुने, तो हमें क्या करना होगा? पहला यूहन्ना 5:14 हमें बताता है: “यदि हम [परमेश्वर] की इच्छा के अनुसार कुछ मांगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।” यह आयत दिखाती है कि हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि परमेश्वर की इच्छा क्या है। फिर हमें उस इच्छा के मुताबिक प्रार्थना करनी होगी।

बाइबल की ये आयतें भी पढ़िए: भजन 65:2; यूहन्ना 14:6; 16:23, 24; 1 यूहन्ना 3:22.

हम सच्ची खुशी कैसे पा सकते हैं?

यह सवाल क्यों उठता है: बहुत-से लोग मानते हैं कि सच्ची खुशी सिर्फ दौलत, शोहरत या खूबसूरती से मिल सकती है। इसलिए उन पर इन चीज़ों को हासिल करने का जुनून सवार रहता है। मगर इन्हें हासिल कर लेने के बाद भी सच्ची खुशी उनसे कोसों दूर होती है।

बाइबल सिखाती है: यीशु ने सच्ची खुशी का राज़ बताते हुए कहा: “धन्य वे हैं, जो परमेश्वर का वचन सुनते और मानते हैं।” (लूका 11:28) जी हाँ, सच्ची खुशी हमें सिर्फ तभी मिल सकती है, जब हम अपनी सबसे बड़ी ज़रूरत को पूरा करेंगे। वह है, परमेश्वर के और उसने हमारे लिए जो मकसद ठहराया है, उसके बारे में सच्चाई जानना। यह सच्चाई बाइबल में दी गयी है और इसे सीखने के बाद हम जान पाएँगे कि कौन-सी बातें हमारी ज़िंदगी में अहमियत रखती हैं और कौन-सी नहीं। अगर हम बाइबल से सीखी सच्चाई के मुताबिक फैसले लें और काम करें, तो हम एक मकसद-भरी ज़िंदगी जी पाएँगे।

बाइबल की ये आयतें भी पढ़िए: नीतिवचन 3:5, 6, 13-18; 1 तीमुथियुस 6:9, 10.

 इस परचे में हमने बाइबल से सिर्फ छः सवालों के जवाब पाए हैं। आपके मन में शायद और भी दूसरे सवाल हों, जैसे: ‘अगर परमेश्वर को हमारी परवाह है, तो उसने इतने लंबे समय से बुराइयों और दुःख-तकलीफों को क्यों रहने दिया है? मैं अपने परिवार को और भी खुशहाल कैसे बना सकता हूँ?’ क्या आप इन सवालों के भी जवाब जानना चाहेंगे? अगर आप सच्चाई की तलाश में हैं, तो आप बेशक ‘हाँ’ कहेंगे। बाइबल इस तरह के ढेरों सवालों के बिलकुल सही-सही जवाब देती है।

मगर कई लोग बाइबल पढ़ने से हिचकिचाते हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि यह एक बहुत बड़ी किताब है, जिसे समझना मुश्किल है। लेकिन अगर आप बाइबल से अपने सवालों के जवाब जानना चाहते हैं, तो यहोवा के साक्षियों को आपकी मदद करने में खुशी होगी। इसके लिए उन्होंने दो इंतज़ाम किए हैं।

इनमें से एक इंतज़ाम है, बाइबल असल में क्या सिखाती है? किताब। यह किताब उन लोगों की मदद करने के लिए तैयार की गयी है, जो बहुत व्यस्त रहते हैं। और दूसरा इंतज़ाम है, मुफ्त में घर पर बाइबल का अध्ययन करने का कार्यक्रम। इसके तहत आपके इलाके में रहनेवाला एक यहोवा का साक्षी, जो बाइबल के बारे में सिखाने के काबिल है, आपसे हफ्ते में एक बार मिलेगा और बाइबल से चर्चा करने के लिए आपका थोड़ा-सा समय लेगा। यह चर्चा आप अपने घर पर कर सकते हैं या फिर जहाँ आप चाहें वहाँ। दुनिया के लाखों लोगों ने इस कार्यक्रम से फायदा पाया है। कई लोगों ने तो खुशी से कहा है: “मुझे सच्चाई मिल गयी है!”

इससे बड़ा खज़ाना और क्या हो सकता है! आखिर, बाइबल की सच्चाई हमें अंधविश्वास और खौफ की बेड़ियों से आज़ाद करती है और हमारी उलझनें भी दूर करती है। यह सच्चाई हमें जीने का एक मकसद और सुनहरे कल की आशा देती है। साथ ही, यह हमारी ज़िंदगी को खुशियों से भर देती है। यीशु ने कहा था: “[तुम] सच्चाई को जानोगे और सच्चाई तुमको आज़ाद करेगी।”—यूहन्ना 8:32, हिन्दुस्तानी बाइबल।