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यहोवा के साक्षी

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 भाग 2

संतोष से भरी ज़िंदगी जीने के लिए कुछ सुझाव

संतोष से भरी ज़िंदगी जीने के लिए कुछ सुझाव

जब आपके सामने कोई समस्या आ जाती है, तो आप सलाह के लिए किसके पास जाते हैं? आप शायद एक भरोसेमंद दोस्त के पास जाएँ या किसी अनुभवी सलाहकार के पास। समस्या का हल जानने के लिए लाइब्रेरी वगैरह जाकर जानकारी हासिल करना भी फायदेमंद हो सकता है। या क्या आप पूरब के देशों के लोगों की तरह “दादी-नानियों की सलाह” पर चलना पसंद करते हैं जिन्होंने दुनिया देखी है? आप जो भी रास्ता इख्तियार करें, अच्छा होगा कि आप अपनी समस्या को सुलझाने के लिए बुद्धि से भरी और सीधी सलाह पर ध्यान दें। यहाँ ऐसी बेहतरीन सलाह का एक नमूना दिया गया है जो आपके लिए मददगार हो सकता है।

“लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिस में उसको चलना चाहिये”

2 परिवार में: आज कई माता-पिताओं को यह चिंता खाए जा रही है कि इस बुरे माहौल में अपने बच्चों की परवरिश कैसे करें। यहाँ दी गयी सलाह उनके काम आ सकती है: “लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिस में उसको चलना चाहिये, और वह बुढ़ापे में भी उस से न हटेगा।” 1 बढ़ते बच्चों को “मार्ग” दिखाने यानी यह सिखाने की ज़रूरत होती है कि उन्हें किन स्तरों का पालन करना चाहिए। आज ज़्यादा-से-ज़्यादा विशेषज्ञ भी यह मानने लगे हैं कि बच्चों को फायदेमंद नियम सिखाना बेहद ज़रूरी है। जब माता-पिता बुद्धिमानी के साथ बच्चों के लिए ऐसे स्तर तय करते हैं तो उन पर चलकर बच्चे सुरक्षित महसूस करते हैं। इसके अलावा: “छड़ी और डांट से बुद्धि प्राप्त होती है, परन्तु जो लड़का योंही छोड़ा जाता है वह अपनी माता की लज्जा का कारण होता है।” 2 “छड़ी” का मतलब है माता-पिता का अधिकार, जो उन्हें प्यार से जताना चाहिए ताकि उनके बच्चे बिगड़ न जाएँ। मगर इस अधिकार को जताने का यह मतलब हरगिज़ नहीं कि बच्चों के साथ जैसा चाहे वैसा सलूक किया जा सकता है। माता-पिता को यह सलाह दी गयी है: “अपने बालकों को तंग न करो, न हो कि उन का साहस टूट जाए।” 3

“तुममें से हर एक को अपनी पत्नी से वैसे ही प्रेम करना चाहिये जैसे तुम स्वयं अपने आपको करते हो”

3 पति-पत्नी के बीच गहरा रिश्‍ता, सुखी परिवार का आधार होता है। ऐसा रिश्‍ता कैसे कायम किया जा सकता है? ‘तुममें से हर एक को अपनी पत्नी से वैसे ही प्रेम करना चाहिये जैसे तुम स्वयं अपने आपको करते हो। और एक पत्नी को भी अपने पति का आदर करना चाहिये।’ 4 परिवार में प्यार और आदर वही काम करते हैं जो किसी मशीन में तेल करता है।  यह सलाह तभी कारगर होगी जब पति-पत्नी के बीच खुलकर बातचीत हो क्योंकि “बिना सम्मति की कल्पनाएं निष्फल हुआ करती हैं।” 5 पति-पत्नी को आपस में दिल-खोलकर बातचीत करने के लिए यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उनके साथी के मन में क्या चल रहा है और उसकी मदद करनी चाहिए कि वह खुलकर अपने दिल की बात बताए। इस बात को हमेशा याद रखना बुद्धिमानी होगी कि “मनुष्य के हृदय के उद्देश्‍य गहरे जल के समान हैं, परन्तु समझदार मनुष्य उसे खींच निकालता है।” 6

ज़िंदगी से हार मानने के बजाय सही नज़रिया रखिए और दूसरों के साथ प्यार-भरे रिश्‍ते कायम करने के लिए आगे बढ़िए

4 बहुत-से बुज़ुर्ग अपने बुढ़ापे में बिलकुल अकेला महसूस करते हैं। यहाँ तक कि जिन देशों में कल तक बुज़ुर्गों की बहुत इज़्ज़त की जाती थी, वहाँ भी आज बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता से अलग रहने लगे हैं। लेकिन बच्चों के लिए इन बुद्धि-भरी बातों पर गौर करना अच्छा होगा: “अपने पिता और अपनी माता का आदर करना।” 7 “जब तेरी माता बुढ़िया हो जाए, तब भी उसे तुच्छ न जानना।” 8 “जो अपने पिता से दुर्व्यवहार करता और अपनी माता को भगा देता है, वह निन्दनीय और अपमानजनक पुत्र है।” 9 दूसरी तरफ, बुज़ुर्ग माता-पिताओं को ज़िंदगी से हार मानने के बजाय सही नज़रिया रखने की ज़रूरत है। उन्हें चाहिए कि वे खुद आगे बढ़कर लोगों के साथ प्यार-भरे रिश्‍ते कायम करने की कोशिश करें। “जो औरों से अलग हो जाता है, वह अपनी ही इच्छा पूरी करने के लिये ऐसा करता है, और सब प्रकार की खरी बुद्धि से बैर करता है।” 10

5 शराब पीना: यह बात सच है कि “दाखमधु से जीवन को आनन्द मिलता है,” 11 और शराब पीने पर एक आदमी ‘अपना दुख फिर स्मरण नहीं करता।’ 12 लेकिन याद रखिए: “दाखरस हँसी उड़ाने वाला और मदिरा उपद्रव मचाने वाली है। जो कोई उस से मतवाला होता है, वह बुद्धिमान नहीं।” 13 ज़रा सोचिए, हद-से-ज़्यादा शराब पीने के क्या अंजाम हो सकते हैं: “अन्त में [मदिरा] सर्प के समान डसती और करैत के समान काटती है। तेरी आंखें विचित्र बातें देखेंगी और तेरे मुंह से उल्टी-सीधी बातें निकलेंगी। . . . ‘मैं कब होश में आऊँगा कि फिर से पीऊँ?’” 14 संतुलित मात्रा में शराब फायदेमंद हो सकती है लेकिन इसे असंतुलित मात्रा में लेने से हमेशा दूर रहना चाहिए।

6 रुपया-पैसा: अगर पैसों का समझदारी से इस्तेमाल किया जाए तो कई मामलों में पैसों की तंगी से बचा जा सकता है। इस सलाह को सुनिए: “तू पियक्कड़ों के साथ मत रहना और न अत्यधिक मांस खानेवालों के साथ संगति करना, क्योंकि पियक्कड़ और पेटू तो कंगाल हो जाएंगे, और उनकी खुमारी उनको चिथड़े पहनाएगी।” 15 अगर हम हद-से-ज़्यादा शराब ना पीएँ, ड्रग्स की लत से और जूआ खेलने जैसी आदतों से दूर रहें तो हम अपने परिवार की ज़रूरतों को अच्छी तरह पूरा कर सकते हैं और इस तरह  पैसों का सही इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन कई लोग अपने पाँव चादर के बाहर पसारते हैं और नतीजा यह होता है कि उन्हें सिर्फ अपने सिर से कर्ज़ का बोझ उतारने के लिए कोल्हू के बैल की तरह जुतना पड़ता है। कुछ लोग तो कर्ज़ का ब्याज चुकाने के लिए अलग से उधार लेते हैं और इस तरह और भी कर्ज़ में डूब जाते हैं। इस मामले में बुद्धि के इन शब्दों को मानने से काफी मदद मिलेगी: “जो व्यर्थ की बातों में समय बिताता है वह अत्यधिक दरिद्र होगा।” 16 हम अपने आप से ये सवाल पूछ सकते हैं: ‘क्या मुझे वाकई उन चीज़ों की ज़रूरत है जिन्हें मैं खरीदना चाहता हूँ? ऐसी कितनी चीज़ें मेरी अलमारी में पड़ी हैं जिन्हें मैंने बस एक-दो बार ही इस्तेमाल किया था?’ एक पत्रकार लिखते हैं: “इंसान की ज़रूरतें कम हैं मगर उसकी ख्वाहिशें बे-हिसाब हैं।” बुद्धि के इन शब्दों पर ध्यान दीजिए: “न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं। और यदि हमारे पास खाने और पहिनने को हो, तो इन्हीं पर सन्तोष करना चाहिए। . . . रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने . . . अपने आप को नाना प्रकार के दुखों से छलनी बना लिया है।” 17

7 मेहनत का गुण काफी हद तक पैसे से जुड़ी समस्याओं को सुलझा सकता है। ‘हे आलसी, च्यूंटियों के पास जा; उनके काम पर ध्यान दे, और बुद्धिमान हो। कुछ और सो लेना, थोड़ी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ा और छाती पर हाथ रखे लेटे रहना, तब तेरा कंगालपन बटमार की नाईं आ पड़ेगा।’ 18 सोच-समझकर योजना बनाना और एक कारगर बजट बनाना भी मददगार साबित हो सकता है: “तुम में से कौन है कि गढ़ बनाना चाहता हो, और पहिले बैठकर खर्च न जोड़े, कि पूरा करने की विसात मेरे पास है कि नहीं?” 19

“क्या तू किसी व्यक्‍ति को देखता है जो अपने कार्य में निपुण है?”

8 लेकिन तब क्या जब हमारे गरीब होने में हमारा कोई दोष न हो? हो सकता है कि हम मेहनती हों लेकिन इसके बावजूद, देश में आए आर्थिक संकट की वजह से शायद हम बेरोज़गार हो गए हों। या हम ऐसे देश में रहते हों जहाँ की ज़्यादातर आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीती है। ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? “बुद्धि की आड़ रुपये की आड़ का काम देता है; परन्तु ज्ञान की श्रेष्ठता यह है कि बुद्धि से उसके रखनेवालों के प्राण की रक्षा होती है।” 20 इसके अलावा इस सलाह पर गौर करें: “क्या तू किसी व्यक्‍ति को देखता है जो अपने कार्य में निपुण है? वह तो राजाओं के सम्मुख खड़ा होगा।” 21 क्या हम कुछ ऐसे हुनर सीख सकते हैं जिनसे हमें नौकरी पाने में आसानी होगी?

“दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा”

9 आगे दी गयी सलाह पर चलना शायद अक्लमंदी की बात न लगे मगर यह सलाह सचमुच असरदार है: “दिया करो, तो तुम्हें भी दिया  जाएगा . . . , क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा।” 22 इसका यह मतलब नहीं कि हमें सिर्फ बदले में कुछ पाने के इरादे से दूसरों की मदद करनी चाहिए। इसके बजाय यह सलाह हमें दरियादिली दिखाने का बढ़ावा दे रही है: “उदार प्राणी हृष्ट पुष्ट हो जाता है, और जो औरों की खेती सींचता है, उसकी भी सींची जाएगी।” 23 ज़रूरत की घड़ी में दूसरों की मदद करने से हम देने की भावना को बढ़ावा देंगे, जिससे आगे चलकर हमें फायदा हो सकता है।

10 इंसानी रिश्‍ते: एक बुद्धिमान राजा ने कहा: “मैंने देखा कि प्रत्येक परिश्रम और प्रत्येक निपुणता का कार्य जो किया जाता है, वह व्यक्‍ति का अपने पड़ोसी से प्रतिस्पर्धा के कारण किया जाता है। यह भी व्यर्थ तथा वायु पकड़ने का प्रयास है।” 24 प्रतिस्पर्धा की भावना की वजह से कई लोग नासमझी का काम करते हैं। एक आदमी देखता है कि उसके पड़ोसी ने 32 इंच का टी.वी. खरीदा है तो वह फौरन जाकर 36 इंच का टी.वी. खरीद लाता है, भले ही उसका 27 इंच का पहला टी.वी. बिलकुल ठीक-ठाक क्यों न चल रहा हो। ऐसी होड़ लगाना सचमुच व्यर्थ है। यह बिलकुल वायु को पकड़ने जैसा है—चाहे जितना भी दौड़ो, हाथ में कुछ नहीं आनेवाला। क्या यह सही नहीं?

अगर कभी हमें गुस्से पर काबू पाना बहुत मुश्‍किल लगे तो हम क्या कर सकते हैं?

11 कभी-कभी दूसरे लोग ऐसी बातें कह देते हैं जो हमें चुभ जाती हैं। लेकिन इस सलाह पर ध्यान दीजिए: “अपने मन में उतावली से क्रोधित न हो, क्योंकि क्रोध मूर्खों ही के हृदय में रहता है।” 25 यह सच है कि कुछ बातों में हम अपने गुस्से को जायज़ ठहरा सकते हैं। एक प्राचीन लेखक ने माना: “क्रोध तो करो,” मगर उसने यह भी कहा: “पर पाप मत करो: सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे।” 26 लेकिन अगर कभी हमें गुस्से पर काबू पाना बहुत मुश्‍किल लगे तो हम क्या कर सकते हैं? “मनुष्य की समझ-बूझ उसे शीघ्र क्रोधित नहीं होने देती, और अपराध पर ध्यान न देना उसकी महानता है।” 27 इसके लिए हमारे अंदर गहरी समझ होने की ज़रूरत है। हम अपने आप से पूछ सकते हैं: ‘उसने मेरे साथ क्यों ऐसा बर्ताव किया? क्या कोई वजह है जो उसके इस बर्ताव के लिए कुछ हद तक ज़िम्मेदार है?’ क्रोध को काबू में रखने के लिए गहरी समझ के साथ-साथ दूसरे गुण भी पैदा किए जा सकते हैं। “बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: . . . और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बान्ध लो।” 28 जी हाँ, प्यार वो मरहम है जो इंसानी रिश्‍तों के बीच आनेवाली दरारों को भर देता है।

12 फिर भी कभी-कभी हमारा “एक छोटा सा अंग” यानी जीभ, दूसरों के साथ हमारे रिश्‍ते में कड़वाहट पैदा कर सकती है। ये शब्द कितने सच  हैं: “जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता; वह एक ऐसी बला है जो कभी रुकती ही नहीं; वह प्राण नाशक विष से भरी हुई है।” 29 यह सलाह भी सचमुच गौर करने लायक है: “हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो।” 30 अपनी ज़बान का इस्तेमाल करने में हमें सावधान रहना चाहिए कि हम बस नाम की शांति बनाए रखने के लिए ऐसी बातें न कहें जो आधी सच और आधी झूठ हों। “तुम्हारी बात हां की हां, या नहीं की नहीं हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई से होता है।” 31

13 दूसरों के साथ हम एक मधुर रिश्‍ता कैसे बनाए रख सकते हैं? मार्गदर्शन देनेवाले इस सिद्धांत पर गौर कीजिए: “हर एक अपनी ही हित की नहीं, बरन दूसरों की हित की भी चिन्ता करे।” 32 ऐसा करने से हम इस नियम का पालन कर रहे होंगे जिसे बहुत लोग सुनहरा नियम कहते हैं: “इस कारण जो कुछ तुम चाहते हो, कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उन के साथ वैसा ही करो।” 33

14 तनाव: तनाव से भरी इस दुनिया में हम अपनी भावनाओं को बस में कैसे रख सकते हैं? “मन आनन्दित होने से मुख पर भी प्रसन्‍नता छा जाती है, परन्तु मन के दुःख से आत्मा निराश होती है।” 34 जब हम देखते हैं कि दूसरे लोग हमारे हिसाब से सही काम नहीं करते, तो बड़ी आसानी से हमारे ‘मन का आनन्द’ छिन सकता है। लेकिन इस वचन को ध्यान में रखना हमारे लिए अच्छा होगा: “अपने को बहुत धर्मी न बना, और न अपने को अधिक बुद्धिमान बना; तू क्यों अपने ही नाश का कारण हो?” 35 दूसरी तरफ यह भी हो सकता है कि रोज़-रोज़ की चिंताएँ हमें हमेशा सताती रहें। तब हम क्या कर सकते हैं? आइए यह बात याद रखें: “उदास मन दब जाता है, परन्तु भली बात से वह आनन्दित होता है।” 36 हम “भली बात” यानी उन अच्छी बातों के बारे में सोच सकते हैं जो हमारा हौसला बढ़ाती हैं। हताश करनेवाली परिस्थितियों में भी अच्छा नज़रिया रखना हमारी सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है: “मन का आनन्द अच्छी औषधि है।” 37 जब हमें लगता है कि दूसरों को हमारी परवाह नहीं है तो हम निराश हो जाते हैं। ऐसे में हम यह नुस्खा आज़माने की कोशिश कर सकते हैं: “लेने से ज़्यादा देने में खुशी है।” 38 ना-उम्मीद होने के बजाय अच्छा नज़रिया रखने से हम हर दिन के तनाव का सामना करने में कामयाब हो सकते हैं।

15 ऊपर हमने जिन बुद्धि की बातों का ज़िक्र किया, क्या आपको लगता है कि ये आज 21वीं सदी में आपके काम आ सकती हैं? दरअसल ये बातें एक प्राचीन किताब, बाइबल से ली गयी हैं। लेकिन बुद्धि की बातें बतानेवाली बाकी किताबों को छोड़ सिर्फ बाइबल से ही क्यों सलाह लें? इसकी कई वजहें हैं, जिनमें एक यह है कि बाइबल में दिए गए सिद्धांत हर ज़माने  में फायदेमंद साबित हुए हैं। मिसाल के लिए, यासूहीरो और कायोको पर गौर कीजिए जो महिला मुक्‍ति आंदोलन में शामिल थे। उन्होंने एक-दूसरे से शादी सिर्फ इसलिए की क्योंकि कायोको, यासूहीरो के बच्चे की माँ बननेवाली थी। मगर शादी के कुछ ही समय बाद उन्हें पैसों की तंगी हो गयी और उनके आपस में अनबन पैदा हो गया इसलिए उन्होंने तलाक ले लिया। बाद में उन दोनों ने यहोवा के साक्षियों के साथ बाइबल अध्ययन करना शुरू किया जबकि इस बात की खबर एक-दूसरे को नहीं थी। उन्हें एक-दूसरे में बहुत बदलाव नज़र आए। फिर यासूहीरो और कायोको ने दोबारा शादी करने का फैसला किया। हालाँकि आज उनकी ज़िंदगी समस्याओं से पूरी तरह आज़ाद नहीं है, लेकिन अब वे बाइबल के सिद्धांतों पर चलते हैं और एक-दूसरे की छोटी-मोटी गलतियों को माफ करके समस्याओं को सुलझा लेते हैं। बाइबल के सिद्धांतों को लागू करने पर जो अच्छे नतीजे निकलते हैं, उनका सबूत आप यहोवा के साक्षियों में देख सकते हैं। क्यों न आप बाइबल के मुताबिक जीने की कोशिश करनेवाले इन लोगों की एक सभा में हाज़िर हों और उनसे जान-पहचान बढ़ाएँ?

16 ऊपर जो-जो कारगर सलाहें दी गयी हैं, वे बाइबल में पायी जानेवाली बुद्धि के भंडार का बस एक छोटा-सा हिस्सा हैं। बाइबल, सोने की एक खान की तरह है जिसमें आप ऐसे ज्ञान का बेशुमार खज़ाना पा सकते हैं। ऐसे बहुत-से कारण हैं जिनकी वजह से यहोवा के साक्षी खुशी-खुशी बाइबल के उसूलों पर चलना पसंद करते हैं। ये कारण क्या हैं? और बाइबल के बारे में चंद सच्चाइयाँ क्या हैं? क्यों न आप यह जानने की कोशिश करें?