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यहोवा के साक्षी

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संतोष से भरी ज़ंदगी—कैसे हासिल की जा सकती है

 भाग 8

संतोष से भरी ज़िंदगी दोबारा हासिल करने का रास्ता

संतोष से भरी ज़िंदगी दोबारा हासिल करने का रास्ता

परमेश्‍वर का हुक्म तोड़ने के बाद इंसान का भविष्य अंधियारा हो गया था। मगर फिर भी परमेश्‍वर ने उन्हें त्यागा नहीं बल्कि उन्हें एक आशा दी। इस बारे में बाइबल समझाती है: “सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करनेवाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई। कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्‍वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी।” (रोमियों 8:20, 21) जी हाँ, परमेश्‍वर ने पहले मानव जोड़े की संतानों को एक आशा दी। यह आशा थी कि इंसान को विरासत में मिले पाप और मौत के पंजे से ज़रूर आज़ाद किया जाएगा। इस आशा की बिनाह पर वे दोबारा यहोवा परमेश्‍वर के साथ एक करीबी रिश्‍ता कायम कर सकते थे। मगर कैसे?

परमेश्‍वर ने इंसानों को एक आशा दी ताकि वे पाप और मृत्यु की दासता से छुड़ाए जा सकें

2 आदम और हव्वा ने पाप करके अपनी संतान से, धरती पर हमेशा-हमेशा के लिए सुखी जीवन जीने का हक छीन लिया। अपनी मरज़ी से भले-बुरे का फैसला करने की छूट पाने के लिए उन्होंने भविष्य में आनेवाले मानव परिवार को पाप और मौत की गुलामी के लिए बेच दिया। इस परिवार में पैदा होनेवाली आदम की सभी संतानों की तुलना ऐसे दासों से की जा सकती है जिन्हें दूर एक टापू पर रहना पड़ता है और उन पर अत्याचारी राजा शासन करते हैं। पाप और मृत्यु ने सचमुच राजाओं की तरह मानवजाति को अपना गुलाम बनाकर, उन पर हुकूमत की है। (रोमियों 5:14, 21) ऐसा लगता था कि उनको छुड़ाना किसी के भी बस की बात नहीं। आखिर उनके पुरखों ने ही उन्हें गुलामी करने के लिए बेच दिया था! लेकिन एक परोपकारी आदमी उन्हें छुड़ाने के लिए अपने बेटे को भेजता है, जो उनको छुड़ाने के लिए पूरी-पूरी कीमत लेकर आता है।—भजन 51:5; 146:4; रोमियों 8:2.

3 इस कहानी में बताए गए दासों को छुड़ानेवाला परोपकारी, यहोवा परमेश्‍वर है। और उसका बेटा, यीशु मसीह है जिसने गुलामों को छुड़ाने के लिए पूरी-पूरी कीमत अदा की थी। पृथ्वी पर इंसान के तौर पर जन्म लेने से पहले भी, वह परमेश्‍वर के एकलौते बेटे की हैसियत से स्वर्ग में था। (यूहन्‍ना 3:16) वह यहोवा की सबसे पहली सृष्टि था और उसके ज़रिए स्वर्ग और पृथ्वी के सभी प्राणियों को बनाया गया। (कुलुस्सियों 1:15, 16) यहोवा ने चमत्कार  करके अपने इस आत्मिक पुत्र का जीवन एक कुँवारी के गर्भ में डाला। इस वजह से वह एक सिद्ध मनुष्य के तौर पर जन्म ले सका और वह कीमत चुका सका जो परमेश्‍वर के न्याय के मुताबिक आदम की संतान को छुड़ाने के लिए ज़रूरी थी।—लूका 1:26-31, 34, 35.

4 जब यीशु करीब 30 साल का हुआ तो उसने यरदन नदी में बपतिस्मा लिया। बपतिस्मे के समय उसे पवित्र आत्मा यानी परमेश्‍वर की सक्रिय शक्‍ति से अभिषिक्‍त किया गया। इस तरह वह मसीह बन गया जिसका मतलब है “अभिषिक्‍त जन।” (लूका 3:21, 22) पृथ्वी पर यीशु ने साढ़े तीन साल तक सेवकाई की। उन सालों के दौरान, उसने अपने शिष्यों को “परमेश्‍वर के राज्य” के बारे में सिखाया। परमेश्‍वर का राज्य, स्वर्ग की वह सरकार है जिसके अधीन मानवजाति दोबारा यहोवा परमेश्‍वर के साथ  एक शांतिमय रिश्‍ता कायम कर सकेगी। (लूका 4:43; मत्ती 4:17) यीशु जानता था कि इंसानों को किस मार्ग पर चलने से खुशहाल ज़िंदगी मिलेगी इसलिए उसने अपने शिष्यों को खुशी पाने के बारे में खास सिद्धांत बताए। क्यों न आप अपनी बाइबल में मत्ती के अध्याय 5 से 7 खोलें और पहाड़ी उपदेश में दी गयी उसकी कुछ शिक्षाएँ पढ़कर देखें?

क्या आप ज़िंदगी-भर उस इंसान का एहसान नहीं मानेंगे जो आपको गुलामी की ज़ंजीरों से छुड़ा देता है?

5 यीशु आदम की तरह नहीं था, उसने सारी ज़िंदगी परमेश्‍वर की आज्ञा मानी। ‘उस ने कोई पाप नहीं किया।’ (1 पतरस 2:22; इब्रानियों 7:26) दरअसल उसके पास पृथ्वी पर हमेशा की ज़िंदगी जीने का हक था, मगर आदम ने जो खो दिया उसकी कीमत परमेश्‍वर को अदा करने के लिए उसने अपना यह हक यानी ‘अपना प्राण दे दिया’। यातना स्तंभ पर यीशु ने अपना सिद्ध मानव जीवन अर्पित कर दिया। (यूहन्‍ना 10:17; 19:17, 18, 28-30; रोमियों 5:19, 21; फिलिप्पियों 2:8) इस तरह यीशु ने छुड़ौती दी या दूसरे शब्दों में कहें तो उसने वह दाम चुकाया जो मानवजाति को पाप और मृत्यु की दासता से छुड़ाने के लिए ज़रूरी था। (मत्ती 20:28) मान लीजिए आप किसी के गुलाम हैं और आपसे दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह काम लिया जाता है। अगर कोई आपको गुलामी की ज़ंजीरों से छुड़ाने का इंतज़ाम करता है और कोई आपकी ज़िंदगी के बदले अपनी जान कुरबान करने के लिए तैयार हो जाता है, तो क्या आप ज़िंदगी-भर उनका एहसान नहीं मानेंगे? इसी तरह छुड़ौती के इंतज़ाम से आपके लिए पाप और मौत से छुटकारा पाने का रास्ता खुल गया है ताकि आप परमेश्‍वर के विश्‍वव्यापी घराने में शामिल हो सकें और सचमुच एक संतोष भरी ज़िंदगी हासिल कर सकें।—2 कुरिन्थियों 5:14, 15.

6 यह जानकर कि यहोवा ने आप पर ऐसी अपार कृपा की है, आपका मन उकसाएगा कि आप उसकी और भी कदर करें और उसके वचन, बाइबल में दी गयी बुद्धि-भरी बातों पर अमल करने की पूरी-पूरी कोशिश करें। मिसाल के तौर पर, बाइबल का एक सिद्धांत लीजिए जिस पर चलना बहुत कठिन है—जब कोई आपके खिलाफ पाप करे, तो उसे माफ कर देना। क्या आपको कुलुस्सियों के अध्याय 3 की 12 से 14 की आयतों में दिए गए शब्द याद हैं जिन पर हमने पाठ 2 में चर्चा की थी? उन आयतों में बताया गया है कि आपको दूसरों को माफ कर देना चाहिए, फिर चाहे उनके खिलाफ शिकायत करने की जायज़ वजह भी क्यों न हो। हमें ऐसा क्यों करना चाहिए, बाइबल के इसी भाग में समझाया गया है: “जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।” एक बार अगर आपके मन में यह बात अच्छी तरह बैठ जाए कि यहोवा और यीशु मसीह ने इंसानों की खातिर कितना कुछ किया है, तो आप दूसरों को माफ करने के लिए तैयार होंगे, फिर चाहे उन्होंने आपके खिलाफ कैसा भी पाप क्यों न किया हो, खासकर अगर वे पश्‍चाताप करते और आपसे माफी माँगते हैं।