बोलीविया

नाईजीरिया, पहले और बाद में

ताहिती

राज-घर, इस नाम से ही पता चलता है कि यहाँ बाइबल से जो शिक्षा दी जाती है उसका मुख्य विषय परमेश्वर का राज है। यही यीशु के प्रचार का मुख्य विषय था।—लूका 8:1.

ये समाज में सच्ची उपासना के केंद्र हैं। इस जगह से यहोवा के साक्षी अपने इलाके में व्यवस्थित ढंग से खुशखबरी के प्रचार का इंतज़ाम करते हैं। (मत्ती 24:14) राज-घर छोटे-बड़े हो सकते हैं और उनके डिज़ाइन भी अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन ये बहुत सादे होते हैं और कई राज-घरों में एक-से-ज़्यादा मंडलियाँ सभाओं के लिए इकट्ठी होती हैं। हाल के सालों में हमने दुनिया-भर में हज़ारों नए राज-घर (हर दिन औसतन पाँच राज-घर) बनाए हैं, ताकि जिस तेज़ी से मंडलियों और प्रचारकों की गिनती बढ़ रही है, उनके इकट्ठा होने के लिए जगह हो सके। आखिर इतने सारे राज-घरों का निर्माण कैसे मुमकिन हो पाया है?—मत्ती 19:26.

इनका निर्माण एक अलग फंड में भेजे गए दान से होता है। यह दान शाखा दफ्तर को भेज दिया जाता है, ताकि जिन मंडलियों को नए राज-घर की ज़रूरत है या जिन्हें अपने राज-घर की मरम्मत करवानी है, उन्हें पैसे दिए जा सकें।

इनका निर्माण अलग-अलग तबके से आए स्वयंसेवक करते हैं, जिन्हें कोई तनख्वाह नहीं दी जाती। कई देशों में राज-घर निर्माण समूह बनाए गए हैं। निर्माण सेवकों का समूह और दूसरे स्वयंसेवक, अपने ही देश में एक मंडली से दूसरी मंडली में जाकर राज-घर बनाने में मदद देते हैं। कभी-कभी तो वे दूर-दराज़ इलाकों में भी जाते हैं। दूसरे कुछ देशों में काबिल साक्षियों को ठहराया जाता है, जिन्हें एक इलाका सौंपा जाता है और वे उस इलाके में राज-घरों के निर्माण और मरम्मत की निगरानी करते हैं। हालाँकि हर निर्माण की जगह पर आस-पास की जगहों से बहुत-से कुशल कारीगर खुशी-खुशी आकर इस काम में हाथ बँटाते हैं, मगर ज़्यादातर मेहनत का काम मंडली के भाई-बहन करते हैं। यहोवा की पवित्र शक्‍ति और उसके लोगों की जी-जान से की गयी मेहनत से ही यह सब मुमकिन हो रहा है।—भजन 127:1; कुलुस्सियों 3:23.

  • हमारी उपासना की जगहों को राज-घर क्यों कहा जाता है?

  • पूरी दुनिया में इतने सारे राज-घरों का निर्माण कैसे मुमकिन हो रहा है?