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यहोवा के साक्षी

हिंदी

महान शिक्षक से सीखिए

 पाठ 7

कहना मानने से सुरक्षा होती है

कहना मानने से सुरक्षा होती है

अगर आपको हर काम अपनी मरज़ी से करने की छूट दे दी जाए, तो आपको कैसा लगेगा? आपको अच्छा लगेगा, है ना? क्या कभी-कभी ऐसा होता है कि आप सोचते हो, काश! मुझे कोई टोके ना, मैं जो करना चाहता हूँ मुझे वह करने दिया जाए? अच्छा सच-सच बताओ, आप क्या सोचते हो?—

आपको बड़ों की बात क्यों माननी चाहिए?

लेकिन आपके लिए क्या अच्छा होगा? खुद ही सोचिए आपको किससे फायदा होता है, अपनी मन-मरज़ी करने से, या मम्मी-पापा का कहना मानने से?— परमेश्वर कहता है कि आपको अपने मम्मी-पापा का कहना मानना चाहिए। अगर उसने ऐसा कहा है, तो ज़रूर इसकी कोई वजह होगी। चलिए वह वजह पता करते हैं।

अच्छा बताओ, आप कितने साल के हो?— क्या आप जानते हो कि आपके पापा कितने साल के हैं?— आपकी मम्मी कितने साल की हैं या आपके दादा-दादी कितने साल के हैं?— उनकी उम्र आपसे कहीं ज़्यादा है। इंसान की उम्र जितनी ज़्यादा होती है, उसके पास सीखने के लिए उतना ही ज़्यादा समय होता है। वह हर साल उतनी ही ज़्यादा बातें सुनता और देखता है और उतना ही ज़्यादा काम करता है। इसलिए बच्चे, बड़ों से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

क्या आप किसी बच्चे को जानते हो जो आपसे छोटा है?— क्या आपके पास उससे ज़्यादा जानकारी नहीं है?— ऐसा क्यों है? क्योंकि उम्र में आप उससे बड़े हैं। आपको सीखने के लिए उससे ज़्यादा समय मिला।

 क्या आप जानते हो किसकी उम्र आपसे, मुझसे और हर इंसान से ज़्यादा है?— यहोवा परमेश्वर की। वह आपसे और मुझसे कहीं ज़्यादा जानता है। जब वह हमसे कोई काम करने को कहता है, तो हम यकीन रख सकते हैं कि वह हमें कभी कोई गलत काम करने के लिए नहीं कहेगा। कभी-कभी उसका दिया काम मुश्किल हो सकता है। क्या आपको पता है, एक बार महान शिक्षक को भी परमेश्वर की आज्ञा माननी मुश्किल लगी थी?—

एक बार परमेश्वर ने यीशु से एक ऐसा काम करने को कहा जो बहुत मुश्किल था। इस बारे में यीशु ने परमेश्वर से प्रार्थना की, जैसा कि आप यहाँ तसवीर में देख सकते हो। उसने प्रार्थना में कहा: ‘अगर तेरी मरज़ी हो तो यह मुश्किल काम मुझे मत दे।’ यीशु की इस प्रार्थना से पता चलता है कि परमेश्वर की इच्छा पूरी करना हमेशा आसान नहीं होता। लेकिन क्या आप जानते हो कि यीशु ने अपनी प्रार्थना के आखिर में क्या कहा?—

यीशु की प्रार्थना से हम क्या सीख सकते हैं?

यीशु ने अपनी प्रार्थना के आखिर में कहा: “जो मेरी मरज़ी है, वह नहीं बल्कि वही हो जो तेरी मरज़ी है।” (लूका 22:41, 42) जी हाँ, वह अपनी मरज़ी नहीं बल्कि परमेश्वर की मरज़ी पूरी करना चाहता था। इसलिए उसने वही किया जो परमेश्वर चाहता था। उसने वह नहीं किया जो उसे लगता था कि सही होगा।

इससे हम क्या सीख सकते हैं?— हमें हमेशा वही करना चाहिए जो परमेश्वर चाहता है, फिर चाहे उसे करना मुश्किल क्यों न हो। हम एक और बात सीखते हैं। जानते हो वह क्या है?— हम सीखते हैं कि परमेश्वर और यीशु, दोनों एक नहीं हैं जैसा कि कुछ लोग कहते हैं। यहोवा परमेश्वर, यीशु से बड़ा है और उसे अपने बेटे से कहीं ज़्यादा जानकारी है।

जब हम परमेश्वर का कहना मानते हैं तो हम दिखाते हैं कि हम उससे प्यार करते हैं। बाइबल कहती है: “परमेश्वर से प्यार करने का मतलब यही है कि हम उसकी आज्ञाओं पर चलें।” (1 यूहन्ना 5:3) तो अब आप समझे कि हम सबको परमेश्वर की आज्ञा क्यों माननी चाहिए। क्या आप परमेश्वर की आज्ञा मानना चाहते हो?—

 चलो हम अपनी बाइबल खोलें और देखें कि परमेश्वर बच्चों से क्या करने को कहता है। हम बाइबल से इफिसियों के अध्याय 6 की आयत 1-3 पढ़ें। यहाँ लिखा है: ‘बच्चो, प्रभु में अपने माता-पिता का कहना माननेवाले बनो, क्योंकि यह परमेश्वर की नज़र में सही है: “अपने पिता और अपनी माँ का आदर करो।” यह पहली आज्ञा है जिसके साथ यह वादा भी किया गया है: “कि तेरे साथ भला हो और तू धरती पर बहुत दिनों तक ज़िंदा रहे।”’

तो देखा आपने यहोवा परमेश्वर ही आपसे कहता है कि आप अपने मम्मी-पापा का कहना मानें। साथ ही, आपको अपने मम्मी-पापा का आदर करना चाहिए। परमेश्वर वादा करता है कि अगर आप उनकी आज्ञा मानेंगे तो आपका ‘भला होगा।’

चलो मैं आपको ऐसे लोगों की कहानी बताता हूँ जिन्होंने आज्ञा मानी और इस वजह से उनकी जान बच गयी। ये लोग आज से हज़ारों साल पहले यरूशलेम नाम के एक बहुत बड़े शहर में रहते थे। उस शहर के ज़्यादातर लोग परमेश्वर की बात नहीं मानते थे। इसलिए यीशु ने उन्हें चेतावनी दी कि परमेश्वर जल्द ही उस शहर को नाश कर देगा। यीशु ने उन्हें यह भी बताया कि अगर वे सही काम करें तो वे नाश नहीं होंगे। उसने कहा: ‘जब तुम देखो कि यरूशलेम को फौज ने घेर लिया है, तब जान लेना कि उसके नाश होने का समय पास आ गया है। उस वक्‍त तुम यरूशलेम शहर से निकलकर पहाड़ों पर भाग जाना।’—लूका 21:20-22.

यीशु की आज्ञा मानने से इन लोगों की जान कैसे बची?

यीशु ने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही हुआ। रोम देश की फौज ने आकर यरूशलेम को चारों तरफ से घेर लिया। लेकिन फिर न जाने क्या हुआ कि अचानक सारे सैनिक वहाँ से चले गए। लोगों की जान-में-जान आयी। ज़्यादातर लोगों ने सोचा कि अब खतरा टल गया। इसलिए वे शहर छोड़कर नहीं गए। लेकिन यीशु ने उनसे क्या करने के लिए कहा था?— अगर उस वक्‍त आप यरूशलेम शहर में होते तो आप क्या करते?— जिन्होंने यीशु की बात पर यकीन किया उन्होंने अपना घर-बार छोड़ दिया और यरूशलेम से बहुत दूर पहाड़ों पर भाग गए।

एक साल तक यरूशलेम में शांति छायी रही, कोई दुश्मन फौज हमला करने नहीं आयी। दूसरे साल भी कुछ नहीं हुआ। और तीसरे साल भी सबकुछ ठीक-ठाक था। यरूशलेम में रहनेवालों ने सोचा होगा कि जो लोग शहर छोड़कर भाग गए वे बेवकूफ  हैं। लेकिन चौथे साल पता है क्या हुआ? रोमी फौज वापस आयी। उसने फिर से यरूशलेम को चारों तरफ से घेर लिया। बचाव के सारे रास्ते बंद थे, अब बहुत देर हो चुकी थी। इस बार फौज ने पूरे शहर को तहस-नहस कर दिया। शहर के ज़्यादातर लोग मारे गए और बचे हुए लोगों को रोमी फौज बंदी बनाकर ले गयी।

लेकिन जिन लोगों ने यीशु की बात मानी, उनका क्या हुआ?— वे सब सही-सलामत थे। वे यरूशलेम से काफी दूर थे। इसलिए उनका बाल भी बाँका नहीं हुआ। यीशु की बात मानने से उन सबकी सुरक्षा हुई।

अगर आप अपने मम्मी-पापा की बात मानो तो क्या आपकी सुरक्षा हो सकती है?— वे शायद आपसे कहें, सड़क पर खेलने मत जाना। वे ऐसा क्यों कहते हैं?— क्योंकि सड़क पर खेलने से गाड़ी से आपका एक्सीडेंट हो सकता है। लेकिन आप शायद सोचें: ‘अभी तो कोई गाड़ी नहीं आ रही है। मुझे चोट नहीं लगेगी। दूसरे बच्चे भी तो सड़क पर खेलते हैं, उन्हें तो कभी चोट नहीं लगती।’

जब आपको कोई खतरा नज़र नहीं आता, उस वक्‍त भी आपको क्यों आज्ञा माननी चाहिए?

 यरूशलेम के ज़्यादातर लोगों ने भी यही सोचा था। रोमी फौज के चले जाने के बाद उन्हें कोई खतरा नज़र नहीं आ रहा था। दूसरे कई लोग शहर में रह रहे थे। इसलिए वे भी रुक गए। उन्हें यीशु ने चेतावनी दी थी, पर उन्होंने उसकी परवाह नहीं की। इसका नतीजा क्या हुआ? वे अपनी जान से हाथ धो बैठे।

चलिए एक और उदाहरण लेते हैं। क्या कभी आप माचिस से खेले हो?— जब आप माचिस की तीली जलाते हो तो उसे जलता देखकर आपको बड़ा मज़ा आता होगा। लेकिन माचिस से खेलना खतरनाक हो सकता है। उससे पूरे घर में आग लग सकती है और आपकी मौत भी हो सकती है!

याद रखो कि सिर्फ कभी-कभार बात मानना काफी नहीं है। अगर आप हमेशा बड़ों की आज्ञा मानें तभी आपकी सुरक्षा होगी। और बताओ वह कौन है जो कहता है, ‘बच्चो, अपने माता-पिता का कहना मानो’?— परमेश्वर। यह मत भूलिए कि वह ऐसा इसलिए कहता है क्योंकि वह आपसे प्यार करता है।

अब इन आयतों को पढ़िए जो बताती हैं कि आज्ञा मानना कितना ज़रूरी है: नीतिवचन 23:22; सभोपदेशक 12:13; यशायाह 48:17, 18 और कुलुस्सियों 3:20.