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यहोवा के साक्षी

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बाइबल से सीखें अनमोल सबक

 पाठ 80

यीशु ने 12 प्रेषितों को चुना

यीशु ने 12 प्रेषितों को चुना

करीब डेढ़ साल प्रचार करने के बाद, यीशु को एक ज़रूरी फैसला लेना था। उसे चुनना था कि कौन उसके साथ-साथ रहकर प्रचार करेंगे। उसे उन्हें यह सिखाना था कि वे कैसे मसीही मंडली में अगुवाई करें। यीशु चाहता था कि यह फैसला करने में यहोवा उसकी मदद करे। इसलिए वह अकेले एक पहाड़ पर गया और उसने सारी रात प्रार्थना की। सुबह होने पर उसने कुछ चेलों को अपने पास बुलाया और उनमें से 12 को प्रेषित चुना। आपको उनमें से किस-किसका नाम याद है? उनके नाम थे: पतरस, अन्द्रियास, याकूब, यूहन्‍ना, फिलिप्पुस, बरतुलमै, थोमा, मत्ती, याकूब जो हलफई का बेटा था, तद्दी, शमौन और यहूदा इस्करियोती।

अन्द्रियास, पतरस, फिलिप्पुस, याकूब

ये 12 प्रेषित यीशु के साथ-साथ सफर करते थे। यीशु ने उन्हें सिखाया कि उन्हें कैसे प्रचार करना है। इसके बाद उसने उन्हें खुद प्रचार करने भेजा। यहोवा ने प्रेषितों को शक्‍ति दी ताकि वे बीमारों को ठीक कर सकें और लोगों में समाए दुष्ट स्वर्गदूतों को निकाल सकें।

यूहन्‍ना, मत्ती, बरतुलमै, थोमा

 यीशु 12 प्रेषितों को अपना दोस्त कहता था और उसे उन पर भरोसा था। फरीसी, प्रेषितों को अनपढ़ और मामूली आदमी समझते थे। मगर प्रेषितों को अपना काम कैसे करना चाहिए, यह शिक्षा उन्हें यीशु ने दी थी। वे यीशु की ज़िंदगी के सबसे अहम समय पर उसके साथ रहे, जैसे उसकी मौत से पहले और उसके ज़िंदा होने के बाद। यीशु की तरह 12 प्रेषितों में से ज़्यादातर जन गलील से थे। उनमें से कुछ शादीशुदा थे।

हलफई का बेटा याकूब, यहूदा इस्करियोती, तद्दी, शमौन

प्रेषित अपूर्ण थे यानी वे गलतियाँ करते थे। कभी-कभी वे बिना सोचे-समझे कुछ बोल देते और गलत फैसले लेते थे। कई बार वे अपना सब्र खो देते थे। यहाँ तक कि वे झगड़ा करते थे कि उनमें सबसे बड़ा कौन है। मगर वे अच्छे लोग थे और यहोवा से प्यार करते थे। यीशु के जाने के बाद उन्हीं से मसीही मंडली की शुरूआत हुई।

“मैंने तुम्हें अपना दोस्त कहा है क्योंकि मैंने अपने पिता से जो कुछ सुना है वह सब तुम्हें बता दिया है।”—यूहन्‍ना 15:15