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यहोवा के साक्षी

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 अध्याय 17

“अपने पवित्र विश्वास की बुनियाद पर खुद को मज़बूत करो”

“अपने पवित्र विश्वास की बुनियाद पर खुद को मज़बूत करो”

“अपने पवित्र विश्वास की बुनियाद पर खुद को मज़बूत करो . . . खुद को परमेश्वर के प्यार के लायक बनाए रखो।”—यहूदा 20, 21.

1, 2. आप किस तरह की इमारत बनाने का काम कर रहे हैं? आपकी इमारत का मज़बूत और टिकाऊ होना क्यों इतनी अहमियत रखता है?

आप बड़ी मेहनत से एक इमारत बनाने का काम कर रहे हैं। इस काम को शुरू हुए कुछ अरसा बीत चुका है और यह आगे भी चलता रहेगा। यह काम आसान नहीं था, इसमें कई मुश्किलें आयीं, मगर आप जो कुछ कर पाए हैं, उससे आपको संतोष है। आपने ठान लिया है कि चाहे जो भी हो आप हिम्मत नहीं हारेंगे, न ही ढीले पड़ेंगे, क्योंकि आपको मालूम है कि आपकी ज़िंदगी, यहाँ तक कि आपका भविष्य भी इस बात पर निर्भर करता है कि आपने यह इमारत कितनी मज़बूत और टिकाऊ बनायी है। क्यों आपकी ज़िंदगी इस काम पर निर्भर है? क्योंकि यह इमारत आप खुद हैं!

2 चेले यहूदा ने इसी काम पर ज़ोर दिया था जो हम खुद पर करते हैं। जब उसने अपने मसीही भाई-बहनों को “खुद को परमेश्वर के प्यार के लायक बनाए” रखने का बढ़ावा दिया, तो उसने यह भी बताया कि वे यह कैसे कर सकते हैं। उसने कहा, “अपने पवित्र विश्वास की बुनियाद पर खुद को मज़बूत करो।” (यहूदा 20, 21) आप खुद को किन तरीकों से मज़बूत कर सकते हैं, ताकि आपका विश्वास पहले से ज़्यादा मज़बूत होता जाए और आप परमेश्वर के प्यार के लायक बने रहें? आइए हम आध्यात्मिक मायने में इमारत बनाने के इस काम के तीन ज़रूरी पहलुओं पर गौर करें।

 यहोवा की माँगें जायज़ हैं, इस बात पर अपना विश्वास मज़बूत करते रहिए

3-5. (क) यहोवा की माँगों के बारे में क्या सोचने के लिए शैतान आपको गुमराह करना चाहेगा? (ख) परमेश्वर की माँगों को हमें किस नज़र से देखना चाहिए? इनका हमारी भावनाओं पर कैसा असर होना चाहिए? मिसाल देकर समझाइए।

3 सबसे पहले तो हमें परमेश्वर के दिए नियमों पर अपना विश्वास मज़बूत करने की ज़रूरत है। अब तक आपने इस किताब में चालचलन के बारे में यहोवा की कई माँगों पर चर्चा की है। आप इन्हें किस नज़र से देखते हैं? शैतान तो यही चाहेगा कि आपको गुमराह करे ताकि आप यह सोचने लगें कि यहोवा के नियम, सिद्धांत और स्तर हम पर बहुत ज़्यादा बंदिशें लगाते हैं, यहाँ तक कि ये हम पर अत्याचार हैं। अदन के बाग में उसकी यह चाल काम कर गयी, और तब से वह यही चाल चल रहा है। (उत्पत्ति 3:1-6) क्या उसकी यह चाल आप पर भी काम करेगी? इसका जवाब काफी हद तक आपकी सोच पर निर्भर करता है।

4 इसे समझने के लिए एक मिसाल लीजिए। मान लीजिए आप एक सुंदर बाग में टहल रहे हैं। चलते-चलते आप देखते हैं कि उस बाग के एक हिस्से में बहुत ही ऊँचा और मज़बूत बाड़ा लगाया गया है, जिसकी वजह से आप बाड़े के उस पार नहीं जा सकते। उस तरफ का नज़ारा बहुत खूबसूरत लग रहा है। पहले तो आपको यह बाड़ा बिना मतलब की बंदिश, अपनी आज़ादी में एक रुकावट लगता है। लेकिन तभी आपको बाड़े के उस पार एक खूँखार शेर दिखायी देता है, जो शिकार पर झपटने के लिए घात लगाए बैठा है। अब आपको यह एहसास होता है कि यह बाड़ा कोई रुकावट नहीं, बल्कि आपकी हिफाज़त के लिए है। क्या अभी कोई खूँखार शेर आपको अपना शिकार बनाने की ताक में घूम रहा है? परमेश्वर का वचन यह चेतावनी देता है: “अपने होश-हवास बनाए रखो, चौकन्ने रहो! तुम्हारा दुश्मन शैतान, गरजते हुए शेर की तरह इस ताक में घूम रहा है कि किसे फाड़ खाए।”—1 पतरस 5:8.

5 शैतान एक खूँखार शेर जैसा है। यहोवा नहीं चाहता कि हम शैतान  के शिकार बन जाएँ। इसलिए उसने हमारी हिफाज़त के लिए कई नियम बनाए हैं ताकि हम उस दुष्ट की “धूर्त चालों” से बचे रहें। (इफिसियों 6:11) इसलिए जब भी हम परमेश्वर के नियमों पर मनन करते हैं तो हमें इनमें यहोवा का प्यार नज़र आना चाहिए। इस नज़र से देखा जाए तो हम जान पाएँगे कि परमेश्वर के नियम हमें खतरों से बचाए रखते हैं और खुशी देते हैं। चेले याकूब ने लिखा, “जो इंसान आज़ादी दिलानेवाले खरे कानून को करीब से जाँचता है और उसमें लगा रहता है, ऐसा इंसान . . . खुशी पाता है।”—याकूब 1:25.

6. परमेश्वर के जायज़ नियमों और सिद्धांतों पर अपना विश्वास मज़बूत करने का सबसे बेहतरीन तरीका क्या है? एक मिसाल दीजिए।

6 यहोवा हमारा कानून देनेवाला है। इसलिए उसके नियमों और सिद्धांतों पर अपना विश्वास मज़बूत करने का सबसे बेहतरीन तरीका है कि हम उसकी आज्ञाओं पर चलें। इससे यहोवा पर और उसके नियमों में छिपी बुद्धि पर हमारा विश्वास मज़बूत होता है। आइए देखें कैसे। मिसाल के लिए, ‘मसीह के कानून’ में एक आज्ञा यह है कि हम दूसरों को ‘वे सारी बातें मानना सिखाएँ जिनकी उसने आज्ञा दी है।’ (गलातियों 6:2; मत्ती 28:19, 20) साथ ही, मसीही इस आज्ञा को पूरी गंभीरता से लेते हैं कि उपासना के लिए और एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ाने के लिए सभाओं में इकट्ठे हों। (इब्रानियों 10:24, 25) इसके अलावा, परमेश्वर की आज्ञाएँ हमें उभारती हैं कि हम उससे हर दिन और बार-बार दिल से प्रार्थना करें। (मत्ती 6:5-8; 1 थिस्सलुनीकियों 5:17) जब हम दिनोंदिन इन आज्ञाओं के मुताबिक चलते हैं, तो हम और भी अच्छी तरह समझ पाते हैं कि ये आज्ञाएँ असल में हमें सही राह दिखाने के लिए परमेश्वर की प्यार-भरी हिदायतें हैं। इन्हें मानने से हमें ऐसी खुशी और ऐसा सुकून मिलता है जो हमें मुसीबतों से भरी इस दुनिया में कहीं और नहीं मिल सकता। जब आप इस बात पर गहराई से सोचते हैं कि परमेश्वर के कानूनों को मानने से खुद आपको कितने फायदे हुए हैं, तो क्या उन पर आपका विश्वास और मज़बूत नहीं होता?

7, 8. बाइबल कैसे उन लोगों की हिम्मत बँधाती है, जिन्हें डर है कि आगे चलकर, परमेश्वर के जायज़ नियमों पर चलते रहना उनके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा?

 7 लोगों को कभी-कभी यह चिंता सताती है कि जैसे-जैसे साल गुज़रते जाएँगे, यहोवा के नियमों को मानते रहना उनके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा। उन्हें डर है कि वे इन्हें मानने में कहीं चूक न जाएँ। अगर आपको भी कभी ऐसा महसूस हो, तो यहोवा की यह बात याद रखिए: “मैं ही तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे तेरे भले के लिए सिखाता हूँ और जिस राह पर तुझे चलना चाहिए उसी पर ले चलता हूँ। मेरी आज्ञाओं को ध्यान से सुन, उन्हें मान! तब तेरी शांति नदी के समान और तेरी नेकी समुंदर की लहरों के समान होगी।” (यशायाह 48:17, 18) क्या आपने कभी गहराई से सोचा है कि ये शब्द कितनी हिम्मत बँधाते हैं?

8 इन आयतों में यहोवा हमें याद दिला रहा है कि उसकी आज्ञाएँ मानने से खुद हमारा ही फायदा होता है। वह हमसे वादा करता है कि उसकी आज्ञा मानने से हमें दो आशीषें मिलेंगी। एक तो यह कि हमारी शांति नदी की तरह भरपूर होगी और कभी खत्म न होगी। दूसरी यह कि हमारी नेकी समुंदर की लहरों जैसी होगी। अगर आप समुंदर किनारे खड़े होकर एक-के-बाद-एक आती लहरों को देखें, तो आपको यह एहसास होता है कि ये लहरें कभी खत्म नहीं होंगी। आपको पता है कि सदियों तक ये लहरें इसी तरह किनारे से आकर टकराती रहेंगी। यहोवा कहता है कि अगर आप उसकी बात मानेंगे तो आपकी नेकी सदा तक कायम रहेगी, यानी जो सही है वह आप हमेशा तक करते रहेंगे। जब तक आप यहोवा के वफादार बने रहने की कोशिश करते रहेंगे, तब तक वह आपको कभी गिरने नहीं देगा! (भजन 55:22 पढ़िए।) क्या यहोवा के इन वादों से उस पर और उसकी जायज़ माँगों पर आपका विश्वास और मज़बूत नहीं होता?

“पूरा ज़ोर लगाकर प्रौढ़ता के लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाएँ”

9, 10. (क) प्रौढ़ता क्यों मसीहियों के लिए एक उम्दा लक्ष्य है? (ख) हर बात को परमेश्वर की नज़र से देखनेवाले क्यों खुश रहते हैं?

9 आध्यात्मिक मायने में इमारत बनाने के काम का दूसरा पहलू, इन  ईश्वर-प्रेरित शब्दों से पता चलता है: “आओ हम पूरा ज़ोर लगाकर प्रौढ़ता के लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाएँ।” (इब्रानियों 6:1) प्रौढ़ता तक पहुँचना, हर मसीही के लिए एक उम्दा लक्ष्य है। आज परिपूर्ण बनना इंसान के बस के बाहर है, मगर वह प्रौढ़ता ज़रूर हासिल कर सकता है। और जैसे-जैसे मसीही, प्रौढ़ होते जाते हैं यानी यहोवा की सेवा में तजुरबा हासिल करते हैं, उन्हें और ज़्यादा खुशी मिलती है। ऐसा हम क्यों कहते हैं?

10 एक प्रौढ़ मसीही, परमेश्वर के मार्गदर्शन पर चलनेवाला इंसान होता है। वह हर बात को यहोवा की नज़र से देखता है। (यूहन्ना 4:23) पौलुस ने लिखा, “जो शरीर के मुताबिक जीते हैं वे शरीर की बातों पर ध्यान लगाते हैं, मगर जो पवित्र शक्‍ति के मुताबिक जीते हैं, वे पवित्र शक्‍ति की बातों पर ध्यान लगाते हैं।” (रोमियों 8:5) शरीर की बातों पर मन लगानेवालों के हाथ खुशी नहीं आती क्योंकि ऐसा नज़रिया रखनेवाले सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, सिर्फ आज की सोचते हैं और उनका ध्यान दुनिया की चीज़ों पर होता है। लेकिन हर बात को परमेश्वर की नज़र से देखनेवाले खुश रहते हैं, क्योंकि उनका पूरा ध्यान यहोवा पर लगा होता है, जो “आनंदित परमेश्वर” है। (1 तीमुथियुस 1:11) परमेश्वर के मार्गदर्शन पर चलनेवाला इंसान हमेशा परमेश्वर को खुश करने के लिए बेताब रहता है और आज़माइशों के दौरान भी खुश रहता है। क्यों? क्योंकि  आज़माइशों से उसे शैतान को झूठा साबित करने और अपनी वफादारी साबित करने का मौका मिलता है, जिससे स्वर्ग में रहनेवाला हमारा पिता खुश होता है।—नीतिवचन 27:11; याकूब 1:2, 3 पढ़िए।

11, 12. (क) पौलुस ने एक मसीही की “सोचने-समझने की शक्‍ति” के बारे में क्या कहा? जिस शब्द का अनुवाद “प्रशिक्षित” किया गया है, उसका क्या मतलब है? (ख) शरीर के अंगों के बढ़ने और सधने के लिए किस तरह का प्रशिक्षण ज़रूरी है?

11 परमेश्वर जैसा नज़रिया और प्रौढ़ता हासिल करने के लिए खुद को प्रशिक्षण देने की ज़रूरत है। इस आयत पर गौर कीजिए: “ठोस आहार तो बड़ों के लिए है, जो अपनी सोचने-समझने की शक्‍ति का इस्तेमाल करते-करते, सही-गलत में फर्क करने के लिए इसे प्रशिक्षित कर लेते हैं।” (इब्रानियों 5:14) जब पौलुस ने सोचने-समझने की शक्‍ति को “प्रशिक्षित” करने की बात कही, तो उसने एक ऐसे यूनानी शब्द का इस्तेमाल किया, जो पहली सदी में शायद यूनान की व्यायामशालाओं (जिमनेज़ियम) में काफी इस्तेमाल होता था। इस शब्द का अनुवाद ‘खिलाड़ी (जिमनास्ट) की तरह खुद को प्रशिक्षित करना’ भी किया जा सकता है। ज़रा सोचिए कि इस तरह के प्रशिक्षण में क्या-क्या शामिल है।

एक जिमनास्ट अपने शरीर का इस्तेमाल करते-करते इसे प्रशिक्षण देता है

12 जब हम पैदा हुए थे, तो हमारे शरीर के अंग काम करने के लिए सधे हुए नहीं थे। मिसाल के लिए, एक नन्हा-सा शिशु यह समझ नहीं पाता कि उसके हाथ-पैर कहाँ जा रहे हैं। इसलिए वह बेवजह इधर-उधर हाथ-पैर मारता है और कभी-कभी अपने ही मुँह पर मार लेता है, जिससे वह एकदम चौंक जाता है और बाद में रोने लगता है। लेकिन जैसे-जैसे शरीर के अंग इस्तेमाल होने लगते हैं, तो वे सधने लगते हैं। शिशु घुटनों के बल चलता है, फिर धीरे-धीरे खड़ा होकर चलने लगता है और बाद में दौड़ने लगता है। * जब आप एक जिमनास्ट को हवा में उछलते और  एकदम नपे-तुले और सधे हुए अंदाज़ में बड़ी खूबसूरती से कलाबाज़ी खाते हुए देखते हैं, तो आपको पता होता है कि उसने अपने शरीर को साधने के लिए और अपनी माँसपेशियों को इस काम के लिए ढालने में ज़रूर कड़ी मेहनत की होगी। एक जिमनास्ट में यह कला ऐसे ही इत्तफाक से नहीं आ जाती। इसके लिए घंटों खुद को ट्रेनिंग देनी पड़ती है। बाइबल यह कबूल करती है कि इस तरह की शरीर की कसरत “कुछ हद तक फायदेमंद” होती है। लेकिन अपनी सोचने-समझने की शक्‍ति को परमेश्वर की सोच के मुताबिक ढालना इससे कहीं ज़्यादा अहमियत रखता है।—1 तीमुथियुस 4:8.

13. हम अपनी सोचने-समझने की शक्‍ति को कैसे प्रशिक्षित कर सकते हैं?

13 इस किताब में हमने ऐसी बहुत-सी बातों पर चर्चा की है जिनकी मदद से आप अपनी सोचने-समझने की शक्‍ति को प्रशिक्षित कर पाएँगे। इससे आप हर बात को यहोवा की नज़र से देखने के काबिल बनेंगे और उसके वफादार बने रहेंगे। अपनी रोज़मर्रा ज़िंदगी में फैसले लेते वक्‍त परमेश्वर के सिद्धांतों और नियमों पर ध्यान दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि आप उनके मुताबिक फैसला कर पाएँ। जब भी आपको कोई फैसला करना पड़े तो खुद से पूछिए: ‘इस मामले पर बाइबल में कौन-से नियम या सिद्धांत दिए गए हैं? मैं उनको कैसे लागू कर सकता हूँ? क्या करने से मैं अपने पिता यहोवा को खुश कर पाऊँगा?’ (नीतिवचन 3:5, 6; याकूब 1:5 पढ़िए।) इस तरह लिया गया हर फैसला आपकी सोचने-समझने की शक्‍ति को और ज़्यादा प्रशिक्षित करेगा। इस तरह के प्रशिक्षण से आप सही मायनों में ऐसे इंसान बनेंगे जो यहोवा के मार्गदर्शन के मुताबिक चलता है और आगे तक बने रहेंगे।

14. आध्यात्मिक बढ़ोतरी करने के लिए हमें किस किस्म की भूख पैदा करने की ज़रूरत है? साथ ही, हमें क्या एहतियात बरतनी चाहिए?

14 प्रौढ़ता ऐसा लक्ष्य है जिसे हासिल किया जा सकता है, मगर आध्यात्मिक तौर पर बढ़ोतरी करते जाने की कोई सीमा नहीं है। शरीर का बढ़ना खाने पर निर्भर होता है। इसलिए पौलुस ने कहा, “ठोस आहार  तो बड़ों के लिए है।” अपना विश्वास मज़बूत करने का एक खास तरीका है कि आप परमेश्वर के ज्ञान का ठोस आहार लेते रहें। जब आप सीखी हुई बातों पर सही तरह से अमल करते हैं तो आप बुद्धि से काम लेते हैं। और बाइबल कहती है, ‘बुद्धि सबसे ज़रूरी है।’ इसलिए हमें उन अनमोल सच्चाइयों के लिए ज़बरदस्त भूख पैदा करनी चाहिए जो हमारा पिता हमें सिखाता है। (नीतिवचन 4:5-7; 1 पतरस 2:2) बेशक, ज्ञान और परमेश्वर की बुद्धि हासिल करने की वजह से हमें अहंकारी या घमंडी नहीं होना चाहिए। हमें समय-समय पर खुद की जाँच करनी चाहिए ताकि हमारे दिल में घमंड या कोई और कमज़ोरी पैदा न हो। पौलुस ने लिखा, “खुद को जाँचते रहो कि तुम विश्वास में हो या नहीं। तुम क्या हो, इसका सबूत देते रहो।”—2 कुरिंथियों 13:5.

15. परमेश्वर के साथ अपना रिश्ता मज़बूत करने के लिए प्यार क्यों ज़रूरी है?

15 एक घर बनाने का काम भले ही पूरा हो जाए, मगर उसे रख-रखाव और मरम्मत की ज़रूरत होती है। यह भी हो सकता है कि बदलते हालात और ज़रूरत के हिसाब से घर में और कमरे बनाने पड़ें। तो फिर, परमेश्वर की सेवा में प्रौढ़ता हासिल करने और उसके साथ अपना रिश्ता मज़बूत बनाए रखने के लिए हमें किस बात की ज़रूरत है? सबसे बढ़कर प्यार की। यहोवा के लिए और अपने मसीही भाई-बहनों के लिए हमारा प्यार दिनोंदिन बढ़ना चाहिए। अगर हममें प्यार नहीं है, तो हमारा सारा ज्ञान और सारे काम बेकार हैं। ऐसे काम कानों को अखरनेवाले शोरगुल से बढ़कर और कुछ नहीं। (1 कुरिंथियों 13:1-3) अपना प्यार बढ़ाते हुए हम मसीही प्रौढ़ता हासिल कर सकेंगे और परमेश्वर के साथ अपना रिश्ता मज़बूत करते रहेंगे।

 यहोवा जो आशा देता है, उस पर अपना ध्यान लगाए रहिए

16. शैतान किस तरह की सोच को बढ़ावा देता है? यहोवा ने हमारी हिफाज़त के लिए हमें क्या दिया है?

16 आइए अब हम आध्यात्मिक मायने में इमारत बनाने के काम के तीसरे पहलू पर चर्चा करें। अगर आप मसीह के सच्चे चेले बनने में मज़बूती पाना चाहते हैं तो आपको अपने सोचने के ढंग के बारे में खबरदार रहने की ज़रूरत है। इस दुनिया का राजा शैतान, लोगों को गलत सोच का शिकार बनाने में उस्ताद है। वह चाहता है कि हम निराश हो जाएँ और यह सोचने लगें कि हमारे साथ हमेशा बुरा होता है, हम किसी पर भरोसा नहीं कर सकते और आगे कुछ अच्छा नहीं होगा। (इफिसियों 2:2) इस तरह की सोच एक मसीही के लिए उतनी ही खतरनाक है, जितना कि लकड़ी के लिए दीमक। लेकिन खुशी की बात है कि यहोवा ने इस तरह की सोच से हमारी हिफाज़त करने के लिए एक बेहद ज़रूरी औज़ार दिया है। और वह है आशा।

17. परमेश्वर के वचन में आशा की अहमियत दिखाने के लिए किस चीज़ की मिसाल दी गयी है?

17 बाइबल बताती है कि परमेश्वर ने हमें शैतान और इस दुनिया के खिलाफ लड़ने के लिए क्या-क्या हथियार दिए हैं। इनमें से एक खास हथियार है, “उद्धार की आशा” जो एक टोप या हेलमट जैसी है। (1 थिस्सलुनीकियों 5:8) बाइबल के ज़माने का एक सैनिक जानता था कि टोप के बिना वह लड़ाई में ज़्यादा देर तक नहीं टिक सकेगा। यह टोप ज़्यादातर धातु का बना होता था और इसे कपड़े या चमड़े की टोपी के ऊपर पहना जाता था। यह टोप सिर पर होनेवाले ज़्यादातर वार झेल सकता है और ज़्यादा चोट नहीं पहुँचने देता। जैसे हेलमट सिर की हिफाज़त करता है, वैसे ही आशा हमारे दिमाग और सोच की हिफाज़त कर सकती है।

18, 19. यीशु ने अपनी आशा को बरकरार रखने में कैसी मिसाल रखी? हम कैसे उसकी मिसाल पर चल सकते हैं?

18 अपनी आशा को बरकरार रखने में यीशु ने सबसे बेहतरीन मिसाल कायम की। याद कीजिए कि धरती पर अपनी ज़िंदगी की आखिरी रात  उसने क्या-क्या सहा। उसके एक करीबी दोस्त ने पैसे के लालच में उसके साथ विश्वासघात किया और उसे पकड़वा दिया। दूसरे ने तो उसे जानने से ही इनकार कर दिया। बाकी उसे छोड़कर भाग गए। उसके अपने ही वतन के लोग उसके खिलाफ हो गए और चिल्ला-चिल्लाकर यह माँग करने लगे कि रोम के सैनिक उसे काठ पर लटकाकर मार डालें। यह कहना गलत न होगा कि यीशु ने इतनी भारी परीक्षाएँ झेलीं जितनी हममें से किसी को कभी नहीं झेलनी पड़ेंगी। किस बात ने यह सब सहने में उसकी मदद की? इब्रानियों 12:2 में इसका जवाब मिलता है: “उसने उस खुशी के लिए जो उसके सामने थी, यातना के काठ पर मौत सह ली और शर्मिंदगी की ज़रा भी परवाह नहीं की और अब वह परमेश्वर की राजगद्दी के दायीं तरफ बैठा है।” यीशु ने कभी-भी उस “खुशी” को अपनी आँखों से ओझल नहीं होने दिया “जो उसके सामने थी।”

19 यीशु के सामने कौन-सी खुशी थी? वह जानता था कि धीरज धरते हुए हर दुख-तकलीफ सहने से वह यहोवा के पवित्र नाम पर लगाए गए कलंक को मिटाने में अपना योगदान देगा। वह इस बात का सबसे बड़ा और ज़बरदस्त सबूत देता कि शैतान झूठा है। यह सब कर पाने की आशा से यीशु को जितनी खुशी मिल सकती थी, वह किसी और बात से नहीं मिलती! वह यह भी जानता था कि यहोवा आखिर तक उसके वफादार रहने का उसे दिल खोलकर इनाम देगा। बुरे-से-बुरे वक्‍त में भी यीशु इस खुशी के बारे में सोचता रहा कि बस थोड़े ही वक्‍त के बाद वह वापस अपने पिता के साथ होगा। वह वक्‍त कितना लाजवाब होगा! हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। हमारे सामने भी एक खुशी रखी है। यहोवा ने हममें से हरेक को यह सम्मान दिया है कि हम उसके महान नाम पर लगाया गया कलंक मिटाने में अपना योगदान दें। अगर हम यहोवा को अपना राजा और मालिक मानें और लाख मुसीबतों और परीक्षाओं के बावजूद खुद को अपने पिता के प्यार के लायक बनाए रखें, तो हम भी शैतान को झूठा साबित कर सकते हैं।

20. सही सोच बनाए रखने और अपनी आशा पर ध्यान लगाए रखने में क्या बात आपकी मदद कर सकती है?

20 यहोवा अपने वफादार सेवकों को इनाम देने की न सिर्फ इच्छा  रखता है, बल्कि वह ऐसा करने के लिए बेताब है। (यशायाह 30:18; मलाकी 3:10 पढ़िए।) जब उसके सेवक उसकी मरज़ी के मुताबिक कुछ पाने की बिनती करते हैं, तो उनके दिल की मुरादें पूरी करने में उसे बड़ी खुशी मिलती है। (भजन 37:4) इसलिए जो आशा आपके सामने रखी है, उसी पर अपना ध्यान लगाए रखिए। शैतान की इस पुरानी दुनिया की बुरी, घटिया और बिगड़ी हुई सोच के शिकार मत बनिए। अगर आपको लगता है कि दुनिया की फितरत धीरे-धीरे आपके दिलो-दिमाग पर असर करने लगी है, तो यहोवा से वह “शांति” पाने के लिए गिड़गिड़ाकर बिनती कीजिए, “जो समझ से परे है।” यह शांति जो परमेश्वर देता है, आपके दिल और आपके सोचने-समझने की ताकत की हिफाज़त करेगी।—फिलिप्पियों 4:6, 7.

21, 22. (क) “बड़ी भीड़” के लोग किस शानदार आशा को दिल में संजोए हुए हैं? (ख) मसीहियों को जिन बातों के होने की आशा है, आपको उनमें सबसे ज़्यादा कौन-सी बात अच्छी लगती है? आपने क्या फैसला किया है?

21 वाकई, हमारे आगे क्या ही शानदार आशा है! अगर आप उस “बड़ी भीड़” का हिस्सा हैं जो “महा-संकट से निकलकर” आएगी, तो सोचिए कि आपके आगे कितनी शानदार ज़िंदगी होगी। (प्रकाशितवाक्य 7:9, 14) शैतान और उसके दुष्ट स्वर्गदूतों के न होने से आप ऐसी राहत महसूस करेंगे जिसकी आज कल्पना करना भी मुश्किल है। आज  हममें से कौन ऐसा है जिसने अपनी ज़िंदगी में शैतान के बुरे असर का दबाव न महसूस किया हो? जब यह दबाव नहीं रहेगा, तब यीशु और उसके 1,44,000 संगी राजाओं के निर्देशन में हम इस धरती को फिरदौस यानी एक खूबसूरत बाग बनाने के काम में कितनी खुशी पाएँगे! यह सोचकर ही हमारा रोम-रोम खिल उठता है कि हर किस्म की बीमारी और कमज़ोरी मिटा दी जाएगी और हमारे जो प्यारे मौत की नींद सो गए हैं, वे ज़िंदा होंगे, हमसे मिलेंगे और हम उन्हें अपनी बाँहों में भर लेंगे। तब ज़िंदगी बिलकुल वैसी ही होगी जैसी परमेश्वर ने इंसान के लिए शुरू में चाही थी। धीरे-धीरे जब हम परिपूर्ण होते जाएँगे तो इससे भी बड़ा एक और इनाम हमारे सामने रखा होगा जिसे हम पाना चाहेंगे। इस इनाम के बारे में रोमियों 8:21 में बताया गया है, “परमेश्वर के बच्चे होने की शानदार आज़ादी।”

22 यहोवा चाहता है कि आप उस पैमाने पर आज़ादी हासिल करें जिसकी आज कल्पना करना भी मुश्किल है। इस आज़ादी को पाने का एक ही रास्ता है, हम परमेश्वर की आज्ञाएँ मानें। ऐसी आज़ादी पाने के लिए, क्या हमें हर दिन यहोवा की बात मानने में कोई कसर बाकी छोड़नी चाहिए? तो फिर आइए हम अपने पवित्र विश्वास की बुनियाद पर खुद को मज़बूत करते रहें, ताकि हम हमेशा-हमेशा तक परमेश्वर के प्यार के लायक बने रहें!

^ पैरा. 12 वैज्ञानिक कहते हैं कि हम जैसे-जैसे बड़े होते हैं, हमारे अंदर एक खास किस्म की चेतना पैदा होती है, जिससे हमारे शरीर को अपने उठने-बैठने का और अंगों के बीच सही ताल-मेल रखने का एहसास होता है। मिसाल के लिए, इस चेतना की वजह से आप अपनी आँखें बंद करके भी ताली बजा सकते हैं। जब एक औरत यह चेतना खो बैठी तो वह न खड़ी हो पाती थी, न चल पाती थी और न सीधे बैठ पाती थी।