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यहोवा के साक्षी

हिंदी

परमेश्वर का राज हुकूमत कर रहा है!

 अध्याय 14

परमेश्वर के लोग सिर्फ उसके राज के वफादार रहते हैं

परमेश्वर के लोग सिर्फ उसके राज के वफादार रहते हैं

अध्याय किस बारे में है

परमेश्वर के लोग उसके राज के वफादार रहते हैं, इसलिए वे दुनिया के भाग नहीं हैं

1, 2. (क) आज तक यीशु के चेले किस सिद्धांत पर चलते हैं? (ख) दुश्मनों ने हम पर जीत हासिल करने के लिए क्या किया है, मगर नतीजा क्या हुआ?

यीशु जब यहूदी राष्ट्र के सबसे बड़े न्यायी पीलातुस के सामने खड़ा था तो उसने कहा, “मेरा राज इस दुनिया का नहीं है। अगर मेरा राज इस दुनिया का होता तो मेरे सेवक लड़ते कि मुझे यहूदियों के हवाले न किया जाए। मगर सच तो यह है कि मेरा राज इस दुनिया का नहीं।” (यूह. 18:36) आज तक यीशु के सच्चे चेले इसी सिद्धांत पर चलते हैं। भले ही पीलातुस ने यीशु को मरवा डाला, मगर दुश्मनों की यह जीत थोड़े ही समय की थी। यीशु को ज़िंदा कर दिया गया। बाद में ताकतवर रोमी साम्राज्य के सम्राटों ने मसीह के चेलों को मिटाने की कोशिश की, मगर वे भी नाकाम रहे। मसीहियों ने उस ज़माने की पूरी दुनिया में राज का संदेश फैला दिया।​—कुलु. 1:23.

2 सन्‌ 1914 में जब राज की शुरूआत हुई तो उसके बाद इतिहास की सबसे ताकतवर सेनाओं ने परमेश्वर के लोगों को मिटाने की कोशिश की। मगर उनमें से कोई भी हम पर जीत हासिल नहीं कर पाया। कई सरकारों और राजनैतिक गुटों ने हमारे साथ ज़बरदस्ती की कि उनके झगड़ों में हम उनका पक्ष लें। लेकिन वे हमारी एकता नहीं तोड़ पाए। आज राज की प्रजा दुनिया के तकरीबन हर देश में रहती है, फिर भी हमारे बीच सच्ची एकता है और हम दुनिया के राजनैतिक मामलों में निष्पक्ष रहते हैं। हमारी एकता एक ज़बरदस्त सबूत है कि परमेश्वर का राज हुकूमत कर रहा है और राजा मसीह अपनी प्रजा को लगातार निर्देश दे रहा है, उनकी सोच सुधार रहा है और उनकी हिफाज़त कर रहा है। आइए देखें कि उसने यह सब कैसे किया है। हम कुछ ऐसे मुकदमों पर भी गौर करेंगे जिनमें राजा ने हमें जीत दिलायी है ताकि हम ‘दुनिया के न हों।’ (यूह. 17:14) ऐसा करने से हमारा विश्वास मज़बूत होगा।

एक अहम मसला

3, 4. (क) राज की शुरूआत के बाद कौन-सी घटनाएँ हुईं? (ख) क्या निष्पक्षता के मसले के बारे में शुरू से ही परमेश्वर के लोगों को सही समझ थी? समझाइए।

3 राज की शुरूआत के बाद स्वर्ग में एक युद्ध हुआ और फिर शैतान को धरती पर फेंक दिया गया। (प्रकाशितवाक्य 12:7-10, 12 पढ़िए।) इसके बाद धरती पर भी एक युद्ध हुआ। वह पहला विश्व युद्ध था। इसमें परमेश्वर के लोगों की वफादारी परखी गयी। उन्होंने ठान लिया था कि वे भी यीशु की तरह दुनिया का भाग नहीं होंगे। मगर शुरू में उन्हें इस बारे में सही समझ नहीं थी कि राजनैतिक मामलों से कैसे पूरी तरह दूर रहना है।

 4 मिसाल के लिए, हज़ार वर्षीय राज का उदय (अँग्रेज़ी) किताब के छठे खंड में, जो 1904 में प्रकाशित किया गया था, मसीहियों को सलाह दी गयी कि वे युद्ध में हिस्सा न लें। * मगर किताब में यह भी कहा गया कि अगर किसी मसीही को सेना में भरती किया जाए तो उसे कोई ऐसा काम करना चाहिए जिसमें लड़ना न पड़े। अगर उसे ऐसा काम नहीं दिया जाता बल्कि लड़ाई में भेज दिया जाता है, तो उसे ध्यान रखना चाहिए कि वह किसी की जान न ले। ब्रिटेन के रहनेवाले भाई हर्बर्ट सीनियर ने, जिनका बपतिस्मा 1905 में हुआ था, बताया कि “हमारे भाई उलझन में पड़ गए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि सेना में भरती होकर ऐसा काम करना, जिसमें लड़ना न पड़े, सही होगा या नहीं।”

5. एक सितंबर, 1915 की प्रहरीदुर्ग ने कैसे हमारी समझ में सुधार किया?

5 मगर 1 सितंबर, 1915 की प्रहरीदुर्ग ने इस मसले पर हमारी समझ में थोड़ा सुधार किया। शास्त्र का अध्ययन किताब में दिए सुझाव के बारे में प्रहरीदुर्ग ने कहा, “हमें लगता है कि ऐसा करना मसीही सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है।” लेकिन जब एक मसीही को धमकी दी जाती है कि अगर वह सैनिक की वर्दी पहनने और सेना में भरती होने से इनकार करेगा तो उसे गोली मार दी जाएगी, तो उसे क्या करना चाहिए? लेख ने समझाया, “अगर हम शांति के शासक के वफादार रहें और उसकी आज्ञा मानें तो हमें गोली से मार डाला जाएगा। दूसरी ओर, अगर हम स्वर्ग के उस राजा की शिक्षाओं का उल्लंघन करके पृथ्वी के राजाओं के अधीन काम करें और उनका समर्थन करें तो भी हम [युद्ध में] गोली से मार डाले जाएँगे। इन दोनों में से किस प्रकार की मृत्यु हम पाना चाहेंगे? हम पहले प्रकार की मृत्यु पसंद करेंगे। स्वर्ग के राजा के वफादार रहने के कारण मृत्यु पाना हमें स्वीकार है।” ऐसी दमदार बात कहने के बावजूद, लेख ने आखिर में कहा, “हम यह नहीं कह रहे हैं कि आपको ऐसा ही करना चाहिए। हम मात्र सुझाव दे रहे हैं।”

6. भाई हर्बर्ट सीनियर के अनुभव से आपने क्या सीखा?

6 कुछ भाइयों ने मसले को ठीक-ठीक समझ लिया और अंजाम की परवाह किए बिना फैसला किया कि वे सेना में भरती नहीं होंगे। भाई सीनियर ने, जिनका ज़िक्र पहले किया गया था, कहा: “मेरी दृष्टि में जहाज़ से युद्ध का माल उतारने [यानी ऐसा काम जिसमें लड़ना न पड़े] और बंदूक में गोलियाँ डालकर चलाने में कोई अंतर नहीं है।” (लूका 16:10) भाई सीनियर ने अपने ज़मीर की वजह से सेना में भरती होने से इनकार कर दिया, इसलिए उन्हें जेल हो गयी। वे और चार और भाई उन 16 लोगों में से थे, जिन्होंने अपने ज़मीर की वजह से सेना में जाने से इनकार कर दिया था। उनमें से कुछ लोग दूसरे धर्मों के थे। उन सबने कुछ समय तक ब्रिटेन की रिचमंड जेल में सज़ा काटी थी। इसलिए बाद में वे ‘रिचमंड 16’ के नाम से जाने गए। एक बार भाई सीनियर को और दूसरे लोगों को जहाज़ पर चुपके से फ्रांस में युद्ध के मैदान में भेज दिया गया। वहाँ उन्हें गोली से मार डालने की सज़ा सुनायी गयी। भाई सीनियर और दूसरे कई लोगों को कतार में खड़ा किया गया ताकि उन्हें गोली मार दी जाए। मगर उन्हें नहीं मारा गया। इसके बजाय उन्हें दस साल की जेल की सज़ा सुनायी गयी।

“मैंने इस बात को समझा कि परमेश्वर के लोगों को हर किसी के साथ शांति से रहना चाहिए, यहाँ तक कि युद्ध के समय भी।”​—साइमन क्रेकर (पैराग्राफ 7 देखें)

7. दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होते-होते परमेश्वर के लोग क्या समझ गए थे?

 7 दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होते-होते यहोवा के सभी लोग ठीक-ठीक समझ गए कि निष्पक्ष रहने का क्या मतलब है और वे कैसे यीशु की मिसाल पर चल सकते हैं। (मत्ती 26:51-53; यूह. 17:14-16; 1 पत. 2:21) मिसाल के लिए, 1 नवंबर, 1939 की प्रहरीदुर्ग में एक खास लेख आया जिसका शीर्षक था, “निष्पक्षता।” लेख में कहा गया, “यहोवा के साथ वाचा में बँधे लोगों को अब इस नियम का पालन करना चाहिए कि देशों के बीच होनेवाले युद्ध में वे पूरी तरह निष्पक्ष बने रहें।” उस लेख के बारे में भाई साइमन क्रेकर ने, जिन्होंने बाद में न्यू यॉर्क के ब्रुकलिन के मुख्यालय में सेवा की थी, कहा: “मैंने इस बात को समझा कि परमेश्वर के लोगों को हर किसी के साथ शांति से रहना चाहिए, यहाँ तक कि युद्ध के समय भी।” यह निर्देश समय पर दिए गए खाने जैसा था। इस लेख ने परमेश्वर के लोगों को ऐसी परीक्षाओं का सामना करने के लिए तैयार किया जो उन पर पहले कभी नहीं आयी थीं। बहुत जल्द उनकी परख होनेवाली थी कि वे राज के वफादार रहेंगे या नहीं।

विरोध की “नदी”

8, 9. प्रेषित यूहन्ना की भविष्यवाणी कैसे पूरी हुई?

8 प्रेषित यूहन्ना ने भविष्यवाणी की थी कि 1914 में राज की शुरूआत के बाद, अजगर यानी शैतान उस राज के समर्थकों को मिटाने के लिए अपने मुँह से मानो नदी जैसी पानी की धारा छोड़ेगा। * (प्रकाशितवाक्य 12:9, 15 पढ़िए।)  यह भविष्यवाणी कैसे पूरी हुई? सन्‌ 1920 से परमेश्वर के लोगों पर ज़ुल्मों का दौर शुरू हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उत्तर अमरीका के बहुत-से भाइयों को जेल हो गयी। उनमें से एक थे, भाई क्रेकर जिन्हें परमेश्वर के राज के वफादार रहने की वजह से यह सज़ा दी गयी। युद्ध के दौरान अमरीका में बहुत-से लोगों ने अपने धार्मिक विश्वास की वजह से सेना में जाने से इनकार कर दिया था और उन्हें जेल हो गयी थी। उन कैदियों में दो-तिहाई लोग यहोवा के साक्षी थे।

9 शैतान और उसके कारिंदों ने ठान लिया था कि राज की प्रजा चाहे किसी भी देश में रहती हो, उन पर ऐसा हमला करेंगे कि वे राज के वफादार न रह पाएँ। पूरे अफ्रीका, अमरीका और यूरोप में उन्हें अदालतों में और परोल अधिकारियों के सामने ले जाया गया। निष्पक्ष रहने के अटल इरादे की वजह से उन्हें जेलों में डाला गया, पीटा गया और अपाहिज कर दिया गया। जर्मनी में साक्षियों पर और भी खतरनाक ज़ुल्म ढाए गए क्योंकि उन्होंने हिटलर की सलामी करने या युद्ध का साथ देने से इनकार कर दिया था। नात्ज़ी हुकूमत के दौरान करीब 6,000 साक्षियों को जेलों में डाला गया। जर्मनी और दूसरे देशों के 1,600 से ज़्यादा साक्षियों को तड़पा-तड़पाकर मार डाला गया। फिर भी शैतान उनका ऐसा नुकसान नहीं कर पाया जिसकी भरपाई न की जा सके।​—मर. 8:34, 35.

“नदी” का पानी “पृथ्वी” निगल जाती है

10. (क) “पृथ्वी” का मतलब क्या है? (ख) “पृथ्वी” ने कैसे परमेश्वर के लोगों की मदद की है?

10 प्रेषित यूहन्ना की भविष्यवाणी में बताया गया है कि “पृथ्वी” उस विरोध की “नदी” का पानी निगल लेगी, यानी परमेश्वर के लोगों की मदद करेगी। यहाँ “पृथ्वी” का मतलब दुनिया के ऐसे ताकतवर अधिकारी या समूह हैं जो काफी हद तक लिहाज़दार हैं। भविष्यवाणी की यह बात कैसे पूरी हुई है? दूसरे विश्व युद्ध के बाद के सालों में ऐसे अधिकारियों ने अकसर मसीहा के राज के वफादार समर्थकों की मदद की थी। (प्रकाशितवाक्य 12:16 पढ़िए।) मिसाल के लिए, बहुत-सी बड़ी-बड़ी अदालतों ने यहोवा के साक्षियों के इस अधिकार की रक्षा की थी कि वे सेना में भरती होने और देश-भक्‍ति के कार्यक्रम में भाग लेने से इनकार कर सकते हैं। सबसे पहले गौर कीजिए कि सेना में भरती न होने के मसले को लेकर जब यहोवा के लोगों को मुकदमे लड़ने पड़े तो यहोवा ने कैसे उन्हें कई बार शानदार जीत दिलायी।​—भज. 68:20.

11, 12. (क) भाई सिकरेला और थ्लीमेनोस के सामने कौन-सी मुश्किलें खड़ी हुईं? (ख) नतीजा क्या हुआ?

11 अमरीका: ऐंथनी सिकरेला के पाँच भाई-बहन थे और उनके माता-पिता साक्षी थे। भाई सिकरेला ने 15 साल की उम्र में बपतिस्मा लिया था। जब वे 21 के हुए तो उन्होंने सेना-भरती बोर्ड के यहाँ जाकर एक धर्म-सेवक के तौर पर अपना नाम लिखवाया। दो साल बाद 1950 में उन्होंने दोबारा अर्ज़ी भरी कि उनका नाम उन लोगों की सूची में डाला जाए जो अपने ज़मीर की वजह से सेना में भरती नहीं होते। हालाँकि एफ.बी.आई. (फैड्रल ब्यूरो ऑफ इन्वैस्टीगेशन) को उनकी अर्ज़ी से कोई एतराज़ नहीं था, मगर न्याय विभाग ने अर्ज़ी नामंज़ूर कर दी। कई अदालती कार्रवाइयों के बाद अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने  भाई सिकरेला के मामले की सुनवाई की और निचली अदालत का फैसला रद्द करके भाई सिकरेला के पक्ष में फैसला सुनाया। इस फैसले से अमरीका के उन दूसरे नागरिकों को भी फायदा हुआ जो साक्षी नहीं थे, फिर भी उन्होंने अपने ज़मीर की वजह से सेना में जाने से इनकार किया था।

12 ग्रीस: 1983 में जब भाई याकोवॉस थ्लीमेनोस ने सैनिक की वर्दी पहनने से इनकार कर दिया तो उन्हें अधिकारियों की आज्ञा तोड़ने का दोषी ठहराया गया और जेल की सज़ा हो गयी। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अकाउंटेंट की नौकरी के लिए अर्ज़ी भरी, मगर उसे ठुकरा दिया गया क्योंकि जेल जाने की वजह से उनका आपराधिक रिकॉर्ड बन गया था। वे इस मामले को अदालत ले गए, मगर ग्रीस की अदालतों में वे हार गए। फिर उन्होंने ‘मानव अधिकारों की यूरोपीय अदालत’ में अपील की। सन्‌ 2000 में यूरोपीय अदालत के ग्रैंड चैंबर ने, जो 17 जजों से बना था, भाई थ्लीमेनोस के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि उनके साथ इस तरह का भेदभाव न किया जाए। यह मुकदमा इसी तरह के बाकी मामलों के लिए एक मिसाल बन गया। इस फैसले से पहले ग्रीस के 3,500 से ज़्यादा भाइयों का आपराधिक रिकॉर्ड बन गया था, क्योंकि निष्पक्ष रहने की वजह से उन्होंने जेल की सज़ा काटी थी। भाई थ्लीमेनोस के पक्ष में हुए फैसले के बाद ग्रीस ने एक कानून जारी किया कि उन सभी भाइयों का आपराधिक रिकॉर्ड मिटा दिया जाए। आगे चलकर जब ग्रीस के संविधान में सुधार किया गया तब भाई थ्लीमेनोस के पक्ष में हुए फैसले की वजह से एक पुराने कानून को और भी अच्छी तरह समझाकर पुख्ता किया गया, जिसके तहत ग्रीस के सभी नागरिकों को यह अधिकार दिया गया है कि उनमें से जो लोग सेना में नहीं जाना चाहते वे गैर-फौजी लोक-सेवा कर सकते हैं।

“अदालत में जाने से पहले मैंने गिड़गिड़ाकर यहोवा से प्रार्थना की, फिर मैंने महसूस किया कि मेरी घबराहट कम होने लगी।”​—इवायलो स्टेफानोफ (पैराग्राफ 13 देखें)

13, 14. आपको क्या लगता है, भाई स्टेफानोफ और बियाटियान के मुकदमों से हमें क्या सीख मिलती है?

13 बुल्गारिया: 1994 में जब भाई इवायलो स्टेफानोफ 19 साल के थे तो उन्हें सेना में भरती होने का आदेश मिला। उन्होंने सेना में भरती होकर युद्ध करने या सेना से जुड़ा कोई और काम करने से इनकार कर दिया। उन्हें 18 महीनों की जेल की सज़ा सुनायी गयी। उन्होंने अदालत में अपील की क्योंकि उन्हें अपने ज़मीर की वजह से सेना में जाने से इनकार करने का अधिकार था। बाद में उनका मुकदमा यूरोपीय अदालत ले जाया गया। मगर 2001 में मुकदमे की सुनवाई से पहले बुल्गारिया की सरकार ने भाई स्टेफानोफ के साथ समझौता कर लिया। सरकार ने न सिर्फ उस भाई की बल्कि बुल्गारिया के उन सभी नागरिकों की सज़ा माफ कर दी, जो गैर-फौजी लोक-सेवा करने को तैयार थे। *

14 आर्मीनिया: 2001 में भाई वाहान बियाटियान की सेना में भरती होने की उम्र हो गयी थी। * उन्होंने अपने ज़मीर की वजह से सेना में जाने से इनकार कर दिया और इस बारे में कई क्षेत्रीय अदालतों में अपील की। मगर उनकी हर अपील रद्द कर दी गयी। उन्हें ढाई साल के लिए जेल हो गयी। सितंबर 2002 से वे सज़ा काटने लगे, मगर करीब 11 महीने बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जेल में रहते वक्‍त उन्होंने यूरोपीय अदालत में अपील की और उनके मुकदमे की सुनवाई हुई। मगर 27 अक्टूबर, 2009 को उस अदालत ने भी  उनके खिलाफ फैसला सुनाया। ऐसा लग रहा था कि आर्मीनिया के उन भाइयों के लिए अब कोई उम्मीद नहीं बची, जो इसी मसले का सामना कर रहे थे। मगर फिर यूरोपीय अदालत के ग्रैंड चैंबर ने उस फैसले पर दोबारा विचार किया। अदालत ने 7 जुलाई, 2011 को भाई बियाटियान के पक्ष में फैसला सुनाया। पहली बार यूरोपीय अदालत ने माना कि एक व्यक्‍ति को अपने धार्मिक विश्वास की वजह से सेना में जाने से इनकार करने का अधिकार है क्योंकि हर किसी को अपने विचार रखने, अपने ज़मीर के मुताबिक फैसले लेने और अपना धर्म मानने की आज़ादी है। उस फैसले से न सिर्फ यहोवा के साक्षियों के बल्कि उन सभी देशों के लाखों लोगों के अधिकारों की रक्षा हुई है जो यूरोपीय परिषद्‌ के सदस्य हैं। *

जब यूरोपीय अदालत ने आर्मीनिया के भाइयों के पक्ष में फैसला सुनाया तो उन्हें जेल से रिहा किया गया

देश-भक्‍ति के कार्यक्रमों का मसला

15. यहोवा के लोग देश-भक्‍ति के कार्यक्रमों में क्यों हिस्सा नहीं लेते?

15 यहोवा के लोग मसीहा के राज के वफादार रहने के लिए न सिर्फ सेना में भरती होने से इनकार करते हैं बल्कि वे देश-भक्‍ति के कार्यक्रमों में भी हिस्सा  नहीं लेते। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दुनिया में देश-भक्‍ति की भावना ज़ोर पकड़ने लगी। कई देशों के नागरिकों से माँग की गयी है कि वे एक शपथ दोहराकर, राष्ट्र-गान गाकर या देश के झंडे की सलामी करके अपने वतन का वफादार रहने की कसम खाएँ। लेकिन हम यहोवा को छोड़ किसी और की भक्‍ति नहीं करते। (निर्ग. 20:4, 5) इसलिए हम पर ज़ुल्मों की बाढ़ आ गयी। मगर यहोवा ने इस बाढ़ के पानी को भी निगलने के लिए “पृथ्वी” का इस्तेमाल किया। उसने मसीह के ज़रिए इस मामले में हुए मुकदमों में कई बार अनोखी जीत दिलायी है। (भज. 3:8) कुछ मुकदमों पर गौर कीजिए।

16, 17. (क) लिलियन और विलियम गोबाइटस ने किस मसले का सामना किया? (ख) उनके मुकदमे से आपने क्या सीखा?

16 अमरीका: 12 साल की लिलियन गोबाइटस और उसका 10 साल का भाई विलियम यहोवा के वफादार रहना चाहते थे, इसलिए उन्होंने झंडे की सलामी करने और शपथ दोहराने से इनकार कर दिया था। इस वजह से उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। उनका मामला सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया। उनके मुकदमे का नाम है माइनर्ज़विल ज़िला स्कूल बनाम गोबाइटस। सन्‌ 1940 में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों में से 1 ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और 8 ने उनके विरोध में। अदालत ने कहा कि स्कूल ने जो कदम उठाया वह “देश की एकता” के हित में है, इसलिए यह संविधान के मुताबिक सही है। इस फैसले ने ज़ुल्मों की एक ज़बरदस्त आग भड़का दी। साक्षियों के और भी कई बच्चों को स्कूल से निकाल दिया गया, कई साक्षियों की नौकरी छूट गयी और बहुत-से साक्षी भीड़ के खतरनाक हमलों का शिकार हुए। हमारे देश की शोभा (अँग्रेज़ी) नाम की किताब कहती है, “1941 से 1943 तक साक्षियों पर हुई हिंसा, 20वीं सदी के अमरीका में धार्मिक असहनशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण है।”

17 परमेश्वर के दुश्मनों की यह जीत कुछ समय के लिए थी। सन्‌ 1943 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और मुकदमे की सुनवाई की जो गोबाइटस मुकदमे जैसा ही था। उस मुकदमे का नाम है, वैस्ट वर्जिनिया राज्य का शिक्षा मंडल बनाम बार्नैट। इस बार सुप्रीम कोर्ट में साक्षियों की जीत हुई। अमरीका के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने इतने कम समय में अपना ही फैसला बदल दिया। फैसले के बाद अमरीका में यहोवा के लोगों पर सरेआम होनेवाले ज़ुल्म कम हो गए। उस दौरान अमरीका के सभी नागरिकों के अधिकारों को पुख्ता किया गया।

18, 19. (क) पाब्लो बारोस कैसे अटल रह पाया? (ख) यहोवा के दूसरे सेवक उससे क्या सीख सकते हैं?

18 अर्जेंटीना: 1976 में पाब्लो और हूगो बारोस को, जो 8 और 7 साल के थे, स्कूल से निकाल दिया गया क्योंकि उन्होंने झंडा फहराने के समारोह में हिस्सा नहीं लिया। जब उन्होंने इनकार किया तो प्रधान अध्यापिका ने पाब्लो को धक्का दिया और उसके सिर पर मारा। उसने स्कूल के बाद दोनों लड़कों को एक घंटे तक रोक लिया और देश-भक्‍ति के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए उनके साथ ज़बरदस्ती की। उस मुश्किल घड़ी को याद करते हुए पाब्लो कहता है, “यहोवा की मदद से ही मैं उस दबाव का सामना कर पाया और वफादार रहा।”

19 जब पाब्लो और हूगो का मामला अदालत ले जाया गया तो जज ने कहा कि स्कूल ने उन दोनों को निकालकर सही किया। फिर उनका मामला अर्जेंटीना  के सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया। सन्‌ 1979 में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया और कहा, “यह सज़ा [स्कूल से निकालना] संविधान के खिलाफ है क्योंकि संविधान के मुताबिक, बच्चों को शिक्षा पाने का अधिकार है (धारा 14) और सबको बुनियादी शिक्षा देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। (धारा 5)” इस जीत से साक्षियों के करीब 1,000 बच्चों को फायदा हुआ। कुछ बच्चों को स्कूल से निकालने की कार्रवाई बीच में ही रोक दी गयी और पाब्लो और हूगो जैसे दूसरे बच्चों को वापस स्कूल में ले लिया गया।

साक्षियों के कई बच्चे मुश्किल हालात में भी वफादार रहे हैं

20, 21. रोएल और ऐमिली एमब्रालिनाग के मुकदमे से आपका विश्वास कैसे मज़बूत हुआ है?

20 फिलीपींस: 1990 में रोएल ऐमब्रालिनाग और उसकी बहन ऐमिली को, जिनकी उम्र 9 और 10 थी, साथ ही साक्षियों के 66 और बच्चों को स्कूल से निकाल दिया गया क्योंकि उन्होंने झंडे को सलाम नहीं किया। रोएल और ऐमिली के पिता लेयोनार्डो ने स्कूल के अधिकारियों को समझाने की कोशिश की, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। जब मामला बिगड़ गया तो लेयोनार्डो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। लेयोनार्डो के पास न तो पैसा था, न ही कोई वकील। उस परिवार ने यहोवा से मार्गदर्शन पाने के लिए गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की। इस दौरान  बच्चों का बहुत मज़ाक उड़ाया गया। लेयोनार्डो को लगा कि वह मुकदमा नहीं जीत सकता क्योंकि उसे मुकदमे लड़ने का कोई तजुरबा नहीं था।

21 बाद में फैलीनो गैनल नाम के एक वकील ने उस परिवार का मुकदमा लड़ा। फैलीनो पहले फिलीपींस की एक नामी कानून कंपनी में काम करता था। इस मुकदमे के दौरान उसने वह नौकरी छोड़ दी थी और यहोवा का एक साक्षी बन गया था। जब मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया तो सभी जजों ने एकमत होकर साक्षियों के पक्ष में फैसला सुनाया और बच्चों को स्कूल से निकालने का आदेश रद्द कर दिया। एक बार फिर परमेश्वर के दुश्मन नाकाम हो गए और उसके लोगों के वफादार रहने का इरादा तोड़ नहीं पाए।

निष्पक्षता से एकता बढ़ती है

22, 23. (क) हम अदालत में बड़े-बड़े मुकदमे कैसे जीत पाए? (ख) दुनिया-भर में हम भाई-बहनों के बीच जो शांति और एकता है, वह किस बात का सबूत है?

22 यहोवा के लोग इतने बड़े-बड़े मुकदमे कैसे जीत पाए? राजनैतिक हस्तियों से हमारी कोई दोस्ती नहीं है कि वे हमारी मदद करें। फिर भी कई देशों और अदालतों में न्याय का साथ देनेवाले जजों ने हमें कट्टर दुश्मनों के हमलों से बचाया है और ऐसे फैसले सुनाए हैं जिनसे उन देशों के कुछ बुनियादी कानूनों में फेरबदल हुआ तो कुछ कानूनों को लागू करने का तरीका बदल दिया गया। इसमें कोई शक नहीं कि हमारी जीत के पीछे मसीह का हाथ था। (प्रकाशितवाक्य 6:2 पढ़िए।) हम क्यों ऐसी कानूनी लड़ाइयाँ लड़ते हैं? इसलिए नहीं कि हम किसी देश का कानून सुधारना चाहते हैं। हम बस इतना चाहते हैं कि बिना रोक-टोक के अपने राजा यीशु की सेवा करते रहें।​—प्रेषि. 4:29.

23 राजनैतिक झगड़ों की वजह से दुनिया में हर कहीं फूट पड़ी है और लोगों में इतनी नफरत भरी है कि उनकी सोच बिगड़ गयी है। मगर ऐसी दुनिया में रहते हुए भी परमेश्वर के लोग निष्पक्ष बने हुए हैं क्योंकि उनका राजा मसीह उनकी मदद कर रहा है। शैतान ने हममें फूट डालने की कोशिश की है, मगर वह नाकाम रहा है। परमेश्वर के राज ने ऐसे लाखों लोगों को इकट्ठा किया है जिन्होंने ठान लिया है कि वे ‘युद्ध करना नहीं सीखेंगे।’ पूरी दुनिया में हम भाई-बहनों के बीच जो एकता और शांति है वह किसी चमत्कार से कम नहीं! यह इस बात का ठोस सबूत है कि परमेश्वर का राज हुकूमत कर रहा है!​—यशा. 2:4.

^ पैरा. 4 यह खंड नयी सृष्टि नाम से भी जाना जाता है। बाद में हज़ार वर्षीय राज का उदय किताब के सभी खंडों को मिलाकर शास्त्र का अध्ययन नाम दिया गया।

^ पैरा. 8 इस भविष्यवाणी के बारे में ज़्यादा जानने के लिए प्रकाशितवाक्य—इसकी शानदार पूर्ति जल्द ही! (अँग्रेज़ी) किताब के अध्याय 27 के पेज 184-186 देखें।

^ पैरा. 13 इस समझौते की वजह से बुल्गारिया की सरकार से यह माँग भी की गयी कि वह उन सभी लोगों को नागरिक प्रशासन के तहत गैर-फौजी लोक-सेवा करने का मौका दे जो अपने ज़मीर की वजह से सेना में नहीं जाते।

^ पैरा. 14 इस मुकदमे की पूरी जानकारी पाने के लिए 1 नवंबर, 2012 की प्रहरीदुर्ग में यह लेख देखें: “ज़मीर की वजह से सेना में जाने से इनकार—यूरोपीय अदालत ने किया इस अधिकार का समर्थन।”

^ पैरा. 14 आर्मीनिया की सरकार ने 20 साल के दौरान 450 से ज़्यादा जवान साक्षियों को जेल में डाल दिया। इनमें से बचे हुओं को नवंबर 2013 में जेल से रिहा किया गया।