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यहोवा के साक्षी

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परमेश्वर का पैगाम—आपके नाम

 भाग 4

यहोवा का अब्राहम के साथ करार

यहोवा का अब्राहम के साथ करार

अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास दिखाया और उसकी आज्ञा मानी। परमेश्वर ने उससे वादा किया कि वह उसे आशीष देगा और उसकी संतानों को अनगिनत कर देगा

जलप्रलय के करीब 350 साल बाद, अब्राहम का जन्म ऊर शहर में हुआ। ऊर एक फलता-फूलता शहर था। यह जिस इलाके में था, उसे आज ईराक के नाम से जाना जाता है। अब्राहम का विश्वास बेजोड़ था। पर जल्द ही उसके विश्वास की परख होनेवाली थी।

एक दिन यहोवा ने अब्राहम से कहा कि वह अपनी जन्मभूमि छोड़कर कनान देश चला जाए। यह देश अब्राहम के लिए बिलकुल अनजान था, फिर भी उसने बेझिझक परमेश्वर की बात मानी और वहाँ के लिए रवाना हो गया। वह अपनी पत्नी सारा, अपने भतीजे लूत और कई नौकर-चाकर को भी साथ ले गया। लंबा सफर तय करने के बाद, अब्राहम और उसका परिवार कनान पहुँचा। वहाँ वे तंबुओं में रहने लगे। परमेश्वर ने अब्राहम के साथ एक करार किया कि वह उससे एक बड़ा राष्ट्र बनाएगा। उसने यह भी वादा किया कि अब्राहम के ज़रिए धरती के सारे परिवारों को आशीषें मिलेंगी और कनान देश पर उसकी संतानों का कब्ज़ा होगा।

देखते-ही-देखते अब्राहम और लूत के पास ढेरों भेड़-बकरियाँ और गाय-बैल हो गए। मगर उन्हें चराने के लिए जगह कम पड़ने लगी। इसलिए एक दिन, अब्राहम ने बड़प्पन दिखाते हुए लूत से कहा कि उसे जो इलाका पसंद हो, चुन ले और अपने परिवार और जानवरों को लेकर वहाँ बस जाए। लूत ने यरदन नदी के पास का इलाका चुना, जहाँ की ज़मीन उपजाऊ थी और हरी-हरी घास की कोई कमी नहीं थी। वह अपने परिवार के साथ सदोम शहर के पास रहने लगा। मगर सदोम के लोग बहुत ही बदचलन थे। वे ऐसी नीच और गंदी हरकतें करते थे, जिनसे परमेश्वर को सख्त नफरत थी।

कुछ समय बाद, यहोवा ने अब्राहम को दोबारा यकीन दिलाया कि वह उसकी संतान को आसमान के तारों की तरह अनगिनत कर देगा। अब्राहम ने परमेश्वर के वादे पर विश्वास किया। मगर इसके बाद भी उसकी प्यारी पत्नी सारा की गोद सूनी रही। फिर जब अब्राहम 99 साल का हुआ और सारा 90 की, तब परमेश्वर ने अब्राहम को साफ-साफ बताया कि उनका एक बेटा होगा। परमेश्वर ने जैसा कहा वैसा ही हुआ। सारा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम इसहाक रखा गया। अब्राहम के और भी बच्चे हुए। मगर परमेश्वर ने बताया कि इसहाक के ज़रिए ही वह छुड़ानेवाला आएगा, जिसके बारे में अदन में भविष्यवाणी की गयी थी।

इस बीच लूत और उसका परिवार सदोम शहर में रह रहा था। हालाँकि सदोम के लोग बदचलन थे, मगर लूत उनकी तरह नहीं बन गया। इसके बजाय, वह परमेश्वर की मरज़ी पूरी करता रहा और उसकी आज्ञाएँ मानता रहा। इसलिए जब परमेश्वर ने सदोम को तबाह करने की ठानी, तब उसने अपने स्वर्गदूतों को लूत के पास भेजकर उसे पहले से खबरदार कर दिया। स्वर्गदूतों ने उसे अपने परिवार को लेकर फौरन शहर से भाग जाने के लिए कहा और बताया कि वे किसी भी हाल में पीछे मुड़कर न देखें। जब वे काफी दूर चले गए, तब परमेश्वर ने सदोम पर आग और गंधक बरसायी। सदोम के पासवाले शहर अमोरा को भी भस्म कर दिया और उसमें रहनेवाले सभी लोग जलकर राख हो गए। सिर्फ लूत और उसकी दो बेटियाँ ज़िंदा बचीं। और लूत की पत्नी का क्या हुआ? उसे शायद अपना घर और चीज़ें बहुत प्यारी थीं। इसलिए उसने स्वर्गदूतों की बात नहीं मानी और पीछे मुड़कर देखा। नतीजा, उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। परमेश्वर की आज्ञा तोड़ने का क्या ही बुरा अंजाम!

—यह भाग उत्पत्ति 11:10-19:38 पर आधारित है।